ध्यान के समान कोई तीर्थ नहीं - विवेकानंद


स्वामी : प्रेरक संस्मरण
 
> जी को पढ़ने का खूब शौक था। एक बार वे मेरठ आए। अपने पढ़ने के शौक को पूरा करने के लिए वे अपने शिष्य अखंडानंद द्वारा पुस्तकालय से पुस्तकें पढ़ने के लिए मंगवाते थे।> केवल एक ही दिन में पुस्तक पढ़कर वापस करने के कारण ग्रंथपाल क्रोधित हो गया। उसने ग्रंथपाल से कहा कि रोज-रोज पुस्तकें बदलने में मुझे तकलीफ होती है। आप यह पुस्तक पढ़ते हैं कि केवल पन्ने ही बदलते हैं?

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