सिंहासन बत्तीसी : उन्‍नीसवीं पुतली रूपरेखा की कहानी

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रूपरेखा नामक उन्नीसवीं पुतली ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है-

राजा विक्रमादित्य के दरबार में लोग अपनी समस्याएं लेकर न्याय के लिए तो आते ही थे कभी-कभी उन प्रश्नों को लेकर भी उपस्थित होते थे जिनका कोई समाधान उन्हें नहीं सूझता था। विक्रम उन प्रश्नों का ऐसा सटीक हल निकालते थे कि प्रश्नकर्ता पूर्ण सन्तुष्ट हो जाता था।
ऐसे ही एक टेढ़े प्रश्न को लेकर एक दिन दो तपस्वी दरबार में आए और उन्होंने विक्रम से अपने प्रश्न का उत्तर देने की विनती की।

उनमें से एक का मानना था कि मनुष्य का मन ही उसके सारे क्रिया-कलाप पर नियंत्रण रखता है और मनुष्य कभी भी अपने मन के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकता है। दूसरा उसके मत से सहमत नहीं था।
उसका कहना था कि मनुष्य का ज्ञान उसके सारे क्रियाकलाप नियंत्रित करता है। मन भी ज्ञान का दास है और वह भी ज्ञान द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करने को बाध्य है।

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