जब भगवान शंकर ने अर्जुन को दिया पाशुपत अस्त्र


युद्ध के दौरान भगवान ने से कहा तुम शंकरजी के पास जाओ। शंकरजी के पास पाशुपत नामक एक दिव्य सनातन अस्त्र है। जिससे उन्होंने पूर्वकाल में सारे दैत्यों का संहार किया था। यदि तुम्हें उस अस्त्र का ज्ञान हो तो अवश्य ही कल जयद्रथ का वध कर सकोगे।
Widgets Magazine


उसके बाद अर्जुन ने ध्यान की अवस्था में अपने आप को कृष्ण का हाथ पकड़े देखा। कृष्ण के साथ वे उड़ने लगे और सफेद बर्फ से ढके कैलाश पर्वत पर पहुंचे। वहां जटाधारी शंकर विराजमान थे। दोनों ने उन्हें प्रणाम किया।

शंकरजी ने कहा वीरवर, तुम दोनों का स्वागत है। बताओ तुम्हारी क्या इच्छा है। भगवान शिव की यह बात सुनकर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों हाथ जोड़े खड़े हो गए और उनकी स्तुति करने लगे।

अर्जुन ने शंकरजी से कहा भगवन मैं आपका दिव्य अस्त्र चाहता हूं। यह सुनकर भगवान शंकर मुस्कुराए और कहा यहां से पास ही एक दिव्य सरोवर है मैंने वहां धनुष और बाण रख दिए हैं।

दोनों उस सरोवर के पास पहुंचे वहां जाकर देखा तो दो नाग थे। दोनों नाग धनुष और बाण में बदल गए। इसके बाद धनुष और बाण लेकर कृष्ण-अर्जुन दोनों शंकर भगवान के पास आ गए और उन्हें अर्पण कर दिए।
शंकर भगवान की माया से एक ब्रह्मचारी उत्पन्न हुआ जिसने मंत्र-जप के साथ धनुष चढ़ाया। वह मंत्र अर्जुन ने तुरंत याद कर लिया। शंकरजी ने प्रसन्न होकर वह शस्त्र अर्जुन को दे दिया। यह सब अर्जुन ने स्वप्न में ही देखा था लेकिन उन्हें वह वास्तव में मिला था।

सावन सोमवार की पवित्र और पौराणिक कथा (देखें वीडियो)





वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।
Widgets Magazine


Widgets Magazine

और भी पढ़ें :