सांई बाबा का बचपन, जानिए एक सच्ची कहानी

सांईं बाबा (28 सितंबर 1830 से 15 अक्टूबर 1918)

जैसे पर्वतों में हिमालय श्रेष्ठ है वैसे ही संतों में श्रेष्ठ हैं सांई। सांई नाम के आगे 'थे' लगाना उचित नहीं, क्योंकि सांई आज भी हमारे बीच हैं। बस, एक बार उनकी शरण में होना जरूरी है, तब वे आपके आसपास होंगे। यह अनुभूत सत्य है।

सांई बाबा के बारे में बहुत भ्रम फैला है। वे हिन्दू थे या मुसलमान? क्या वे कबीर, नामदेव, पांडुरंग आदि के अवतार थे। कुछ लोग कहते हैं कि वे शिव के अंश हैं और कुछ को उनमें दत्तात्रेय का अंश नजर आता है। अन्य लोग कहते हैं कि वे अक्कलकोट महाराज के अंश हैं।


कट्टर धार्मिक युग में व्यक्ति हर संत को धर्म के आईने में देखना चाहता है। कट्टरपंथी हिन्दू भी जानना चाहते हैं कि वे हिन्दू थे या मुसलमान? यदि मुसलमान थे तो फिर हम उनकी पूजा क्यों करें? मुसलमान भी जानना चाहते हैं कि अगर यदि वे हिन्दू थे तो फिर हम उनकी समाधि पर जाकर दुआ क्यों करें?

सांई बाबा के बारे में अधिकांश जानकारी श्रीगोविंदराव रघुनाथ दाभोलकर द्वारा लिखित 'श्री सांई सच्चरित्र' से मिलती है। मराठी में लिखित इस मूल ग्रंथ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। यह सांई सच्चरित्र सांई बाबा के जिंदा रहते ही 1910 से लिखना शुरू किया। 1918 के समाधिस्थ होने तक इसका लेखन चला।


लेकिन अब सवाल यह उठता है कि कितने हैं, जो 'सबका मालिक एक' की घोषणा करते हैं। यह देखा गया है कि सांई को मानने वाले भी ज्योतिषी, तथाकथित बाबा और अन्य लोगों के चक्कर में भटकते रहते हैं। इससे पता चलता है कि वे सब भ्रमित हैं व उन्हें सांई पर भरोसा नहीं है।

सांई बाबा का मिशन था- लोगों में एकेश्वरवाद के प्रति विश्वास पैदा करना। उन्हें कर्मकांड, ज्योतिष आदि से दूर रखना और उनके दुख-दर्द को दूर करना साथ ही समाज में भाईचारा कायम करना।

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