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पैसा कमाना है तो आँख-कान खुले रखें

कमल शर्मा|
आर्थिक मोर्चे पर जीवन में नीचा देखना पड़े, तो इसके लिए आपकी दुविधा जिम्मेदार होती है। अनिश्चित मन से किए गए निर्णय जिम्मेदार होते हैं। दुविधा में आदमी जिंदगी में बडे़-बडे़ दाँव लगाता है और कहता है कि जो होगा देखा जाएगा। इस दुविधा से बचें तो बेडा़ पार है।

न तो आपकी निवेश की नाव का माँझी है, न ही पथ-प्रदर्शक। ब्रोकर को पायलट सीट पर मत बैठाइए। पायलट सीट खुद संभालिए। ब्रोकर न आपका दोस्त है, न दुश्मन। आप अपने आर्थिक लक्ष्य पूरे करने में उसकी मदद कितनी ले पाते हैं, यह आपकी योग्यता पर निर्भर है। या हर्षद मेहता कोई नाम नहीं, उस तिकड़मी मानसिकता के भूत-प्रेत हैं, जो लोगों की अनिश्चित और अनाप-शनाप वाली मानसिकता का लाभ उठाते हैं। निवेश नैया उनकी डूबी, जो अपनी पूँजी और प्रतिभूतियों को ब्रोकर के हवाले करके खुद रेस्ट सीट पर लंबी तानकर सो गए।

  कम रेट वाला ब्रोकर ढूँढ़ रहे हैं, तो उसके द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं के स्तर पर गौर जरूर फरमा लें। उसके बुनियादी ढाँचे को बारीकी से देख लें और पुराने ग्राहकों में कोई विशेष परिचित हो, तो उसके अनुभव जरूर ले लें      
एक होता है ब्रोकर और एक होता है सब-ब्रोकर। दोनों में फर्क यह है कि सब-ब्रोकर, ब्रोकर का स्थानीय एजेंट मात्र होता है, जो सारी कार्यवाही ब्रोकर के बिहाफ पर करता है जिस तरह और आपके बीच ब्रोकर एक मध्यस्थ है, उसी तरह ब्रोकर और आपके बीच सब-ब्रोकर एक पुल है। सब-ब्रोकर अपनी तरफ से कोई नियम-कानून-गारंटी-आश्वासन-शर्त आदि आप पर लागू नहीं करता। किसी भी लेन-देन, भुगतान, शेयर ट्रांसफर आदि की पूरी जिम्मेदारी ब्रोकर की ही होती है, सब-ब्रोकर की नहीं।

अगर कोई गड़बडी़ होती है, तो दावा निपटान के लिए दी गई छह माह की समय-सीमा के बाद आप अदालत की शरण में जा सकते हैं, जो एक थकाऊ और कष्टभरी प्रक्रिया है। शेयर बाजार में दावा निबटान की समय-सीमा चार माह है। ब्रोकर के खाते के अलावा किसी भी अन्य खाते से अगर आपने शेयरों या धन का कोई लेन-देन किया, तो उसका उत्तरदायी ब्रोकर नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए हमेशा आपकी सारी कार्यवाही ब्रोकर के नाम से होनी चाहिए, न कि सब-ब्रोकर या किसी अन्य टाइप के एजेंट के नाम से।

निवेशक प्राय: टिप चाहते हैं कि कौन-सा शेयर कब खरीद लें, कब बेच दें। जैसा कि हमने पिछले एक पीरियड में बात की कि अब सारे बडे ब्रोकर, कंपनियों के रूप में हैं, जिनके पास हर सेक्टर के स्पेशलिस्ट शोध-विश्लेषकों की पूरी टीम होती है। देखिए कि ब्रोकर से आपके पास सलाहें किस तरह आती हैं। क्या यह केवल बाजार के रुख की सूचना है, कयास है, अंदाजा है, अफवाह है या इसके पीछे सटीक सूचनाओं पर आधारित पुख्ता होमवर्क करके राय तैयार की गई है?

100 में से तकरीबन 90-95 सलाहें खरीदने की होती हैं या होल्ड रखने की। बेचने की सलाह बिरली ही होती है। इसलिए बेचने का फैसला बहुत बार आपका निजी होता है। प्राय: ब्रोकर यह जान भी नहीं पाता कि उसकी ओर से आपको जो एसएमएस पर राय या इंटरनेट या डाक से रिपोर्ट मिली, उस पर आपने अमल किया भी या नहीं?

अगर ब्रोकर को ही आपने अपना पोर्टफोलियो प्रबंधक भी बना रखा है, तब जिम्मेदारियाँ जुदा होती हैं। सेबी द्वारा निर्धारित सीमा के अनुसार पोर्टफोलियो मैनेजर, पाँच लाख से बडे़ पोर्टफोलियो को ही मैनेज करते हैं और इस सेवा के लिए अलग से धनराशि लेते हैं। अब यह उनका दायित्व हो जाता है कि वे आपको पोर्टफोलियो को ऐसा मैनेज करें, कि वह बढ़ता जाए, बढ़ता जाए। लेकिन कई बार पोर्टफोलियो मैनेजर, अपने ग्राहकों को अंधेरे में रखकर उनके शेयरों की खरीद-फरोख्त करते देखे गए हैं।

ब्रोकर से मिलने वाली खरीद-फरोख्त की सलाह, चाहे वे मुफ्त में मिलें, या इसके लिए आपसे पैसे लिए जाएँ, सबके साथ डिस्क्लेमर जुड़े होते हैं, कि सलाह पर अमल करने पर संभावित नुकसान के लिए आप किसी को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। दरअसल, आपको, आपके सैट-अप को, आपकी जोखिम-क्षमता, लक्ष्य और सपनों को आपसे बेहतर कोई नहीं समझता।

ब्रोकर की सलाह सामूहिक होती है, आप देखें कि वह आपको सूट करेगी या नहीं? आप कितना पैसा एक, दो या पाँच साल के लिए लगाना चाहते हैं, किस सेक्टर में कितना एक्सपोजर और उसके अनुपात में किस फंड के कितने यूनिट अपने पोर्टफोलियो में रखते हुए कितना पैसा उच्च-जोखिम, उच्च-लाभ वाले शेयरों में लगाना चाहते हैं यह सब खुद तय करें।

ऐसी मानसिकता रखने के बाद ब्रोकर चुनने निकलिए, कभी धोखा नहीं होगा। अपनी और ब्रोकर की सीमाएँ जानकर आप मैदान में उतरेंगे, तो ब्रोकर या उसके नाम पर कोई आदमी आपको थोथे वादों या सब्जबागों से बहला नहीं सकेगा। टिप पर आधारित निवेश में जोखिम सर्वाधिक है। कीमतों से छेड़छाड़ करने वाले तिकड़मी लोग टिप्स उछालते हैं।

शेयर कीमतों में उछाल देखने पर निवेशक टिप को भरोसेमंद मान बैठते हैं और टिप के पीछे दौड़ पड़ते हैं। ब्रोकर भी टिप जारी करता है, लेकिन दी गई टिप को उसके अपने हितों के परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए। ब्रोकर हर राय के साथ यह घोषणा जरूर जारी करता है कि इससे उसका कोई निजी निवेश या दूसरा हित नहीं जुड़ा हुआ है। यह मात्र औपचारिकता है।

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने समय-समय पर निवेशकों के हित सुरक्षित करने के लिए तमाम नियम-कायदे लागू किए हैं। जिस ब्रोकर को आप चुनना चाहते हैं, उसके बारे में सेबी और शेयर बाजारों की अपनी वेबसाइटों से जानकारी जरूर कर लें। संबंधित ब्रोकर के खिलाफ हुई किसी कार्रवाई, किसी चेतावनी, किसी गैर मामूली टिप्पणी आदि का संज्ञान जरूर लें। सेबी और शेयर बाजार की जिम्‍मेदारी है कि वे समय-समय पर ब्रोकरों का परीक्षण करें कि वे निवेशकों को निर्धारित मानक के न्यूनतम स्तर के मुताबिक सुविधाएँ मुहैया करा रहे हैं, अथवा नहीं।

अच्छी सलाह के अलावा, सहज कारोबार के लिए अपने ग्राहकों को एक भरोसेमंद प्लेटफार्म मुहैया कराना भी ब्रोकर की जिम्मेदारी है। शेयर-बाजारों, डिपॉजिटरी कंपनियों, ब्रोकर के मुख्यालय और आपकी लोकेशन के दरम्यान तेज गति वाली इलेक्ट्रॉनिक संचार व्यवस्था, कंप्‍यूटर सिस्टम्स और नेटवर्किंग प्रणालियाँ, सूचना-तकनीकी की उच्च गुणवत्तायुक्त व्यवस्था, सहज और तीव्र लेन-देन के लिए जरूरी है। इसमें जरा भी गड़बड़ी, लोगों के लिए भारी नुकसान का कारण बनती है।

बैंक से लेन-देन संबंधी सुचारू कनेक्टिविटी, ब्रोकर के बैक-ऑफिस से 24 घंटे सातों दिन इंटरनेट सुविधा, व्यापार सूचनाओं, सौदा-निबटान, कन्फर्मेशन, निवेश पर घाटा और मुनाफा, वित्तीय स्टेटमेंट और डिपॉजिटरी होल्डिंग संबंधी सूचनाओं के समय पर सटीकता के साथ मिलने की व्यवस्था आदि ऐसी चीजें हैं, जिनमें अधूरापन आपके और लक्ष्यों के बीच बाधा की तरह काम करेगा। लिहाजा ब्रोकर ऐसा हो, जिसके द्वारा स्थापित किए गए सूचना तंत्र में किसी ग्राहक को कोई शिकायत न होती हो।

कुछ लोग ब्रोकरों के द्वारा ली जाने वाली ब्रोकरेज उर्फ कमीशन के रेट पर ज्यादा ध्यान देते हैं। याद रखिए, यहाँ कोई चैरिटी करने के लिए नहीं बैठा हुआ। अच्छे ब्रोकरों के रेट आपस में प्रतिस्पर्धी होने के बावजूद उनका अपना एक लेवल होता है। औसत निवेशक के लिए ब्रोकर की फीस, उसके कुल निवेश का बहुत मामूली हिस्सा होती है, लेकिन इस पर पूरे निवेश की सुरक्षा और कई मायनों में सफलता निर्भर रहती है। आप जितनी जल्दी-जल्दी खरीद-फरोख्त करेंगे, आपसे हर अन्तरण पर ब्रोकर उतना ही ज्यादा कमीशन कमाएगा।

कम रेट वाला ब्रोकर ढूँढ़ रहे हैं, तो उसके द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं के स्तर पर गौर जरूर फरमा लें। उसके बुनियादी ढाँचे को बारीकी से देख लें और पुराने ग्राहकों में कोई विशेष परिचित हो, तो उसके अनुभव जरूर ले लें।

एक सोच यह है कि जिन आर्थिक संस्थाओं में आप कारोबार करते हैं (शेयर बाजार या कमोडिटी एक्सचेंज) और जिन संस्थाओं पर निगरानी का जिम्मा है (सेबी) उनके नजदीक हम नहीं, बल्कि हमारा ब्रोकर होता है। हम तो बहुत दूर हैं, और शेयर-बाजारों एवं अन्य प्रमुख संस्थाओं की नस-नस से वाकिफ ब्रोकर से हम कैसे पार पा सकते हैं।

यहाँ ध्यान यह रखना चाहिए कि ठोंक-पीटकर ब्रोकर चुनने और बाद में भी उस पर अंधविश्वास करने के बजाय, अपने विवेक से काम करने का मतलब यह नहीं, कि ब्रोकर से आपका कोई मुकाबला है। ब्रोकर ही नहीं, कोई भी व्यक्ति किसी को भी धोखा दे सकता है, अगर वह उसकी लालच की अतिवादी मानसिकता को पहचान ले और उसे उसके लालच के चलते ही धोखा देने की ठान ले। कॉमन-सेंस बडी चीज है। एक्स्ट्रा समझदारी भी यहां काम नहीं आती। बस, आंख-कान खुले रखिए और दिमाग सचेत, इतना ही काफी है।
*यह लेखक की निजी राय है। किसी भी प्रकार की जोखिम की जवाबदारी वेबदुनिया की नहीं होगी।
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