परमेश्वर नहीं है देवी और देवता

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
ऐसी मान्यता है कि हिंदू देवी-देवताओं की संख्या 33 या 36 करोंड़ है। ऐसी मान्यता किस आधार पर है यह तो नहीं मालूम, लेकिन वेद और पुराण में इतने करोड़ देवी-देवताओं के नामों का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।
हाँ यदि हम वैदिक देवताओं की गिनती करें तो निश्चित तौर पर उनका आँकड़ा तैतीस आता है। जैसे- बारह आदित्य, आठ वसु, ग्यारह रुद्र और इंद्र व प्रजापति को मिलाकर कुल तैतीस द्विव्य शक्तियों का उल्लेख मिलता है।

इसके अलावा उन्पचास मरुदगण, उषा, सविता, सूर्य, चंद्र, पर्जन्य, वरुण आदि सहित अनेक अन्य प्राकृतिक शक्तियों की गणना भी की कई है जिनका उल्लेख वेदों में मिलता है।

जो ऋषि कुमार (सनक, सनन्दन, सनातन और सनतकुमार), और 14 मनुओं आदि की बात कही गई है वे सब धरती पर जन्मे ब्रह्म पुरुष है ऐसा माना जाता है। वैदिक ऋषि उस एक परमेश्वर के अलावा परमेश्वर की प्रकृति में स्थित शक्तियों को देव कहते थे जिसे वह क्रमश: इस प्रकार मानने थे-
1. स्व: (स्वर्ग) लोक- के देवता- सूर्य, वरुण, मित्र
2. भूव: (अंतरिक्ष) लोक- लोक के देवता- पर्जन्य, वायु, इंद्र और मरुत
3. भू: (धरती) लोक- पृथ्वी, उषा, अग्नि और सोम आदि।

जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि का उल्लेख है उनके विषय में पुराण और वेदों में अलग-अलग मान्यता है। जो आदित्य है उन्हीं में एक विष्णु। जो रुद्र है उन्हीं में एक शिव है और जो प्रजापति है वही ब्रह्मा है। पुराणिकों ने इन देवताओं की अनेकानेक श्रांगारिक कथाएँ लिखी।
‍चूँकि उक्त देवताओं को पुराणों में अनेकों नामों से संबोधित किया गया है इस कारण भ्रम की स्थिति निर्मित होती है। वेदों में हमें बहुत से देवताओं की स्तुति और प्रार्थना के मंत्र मिलते हैं। इनमें मुख्य-मुख्य देवता ये हैं :

प्राकृतिक शक्तियाँ : अग्नि, वायु, इंद्र, वरुण, मित्र, मरुत त्वष्टा, सोम, ऋभुः, द्यौः, पृथ्वी, सूर्य (आदित्य), बृहस्पति, वाक, काल, अन्न, वनस्पति, पर्वत, पर्जन्य, धेनु, पूषा, आपः सविता, उषा, औषधि, अरण्य, ऋतु त्वष्टा, श्रद्धा।
दिव्य शक्तियाँ : ब्रह्मा (प्रजापति), विष्णु (नारायण), शिव (रुद्र), अश्विनीकुमार, आदित्य, यम, पितृ, मृत्यु, श्रद्धा, शचि, दिति, अदिति, हिरण्यगर्भ, विश्वकर्मा, सीता, सरस्वती, पार्वती, लक्ष्मी, आत्मा, बृहस्पति, शुक्राचार्य आदि।

उक्त सबसे उपर हैं 'ईश्वर' यह ध्यान रखा जाना चाहिए, क्योंकि वही एकमात्र पूज्जनीय, वंदनीय और प्रार्थनीय है।

अंतत: कभी तो हम शरीर को मनुष्य कहते हैं, कभी उसकी आत्मा को। उसी तरह वैदिक ऋषि भी दो रूपों में देवताओं की प्रार्थना करते थे। कभी जड़ पदार्थ के रूप में, कभी उस जड़ के भीतर रहने वाले चेतन के रूप में।
जैसे- 'सूर्य' शब्द से कभी उनका आशय होता था उस तेज चमकते हुए गोले से, जिसे हम 'सूर्य' कहकर पुकारते हैं। कभी 'सूर्य' से उनका आशय होता था, सूर्य के रूप में प्रकाशमान आदित्य से। आदित्य एक ब्रह्म पुरुष का नाम है।

ऋषियों का ऐसा विश्वास था कि एक ही महान सत्ता नाना देवताओं के रूप में बिखरी है। उसी की वे स्तुति करते थे, उसी की प्रार्थना। उस ही की वे उपासना करते थे। उसी को प्रसन्न करने के लिए वे यज्ञ करते थे। लेकिन वह भालिभाति जानते थे कि परमात्मा, प्रकृति और आत्मा तीन की ही सत्ता है। इसमें भी आत्मा प्रकृति से बद्ध है। मुक्त होने पर वह ब्रह्मलीन हो जाती है।
मनुष्य शरीर में आत्मा का वास है वह आत्मा जब देह छोड़ती है तो नई देह मिलने तक वह पितर कही जाती है। यदि ध्यान-कर्म किया है तो देवता हो जाती है, और यदि मुमुक्ष होकर कठोर तप किया है तो मोक्ष प्राप्त करने के बाद भगवान कहलाती है। अंतत: वह ब्रह्मलीन हो जाती है।

क्या आप इस क्रम को मानते हैं : मानव, पितर, देवी-देवता, भगवान और ईश्वर।

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