क्या प्रारब्ध की धारणा से व्यक्ति अकर्मण्य बनता है?

ऐसा अक्सर कहा जाता है कि आज हम जो भी फल भोग रहे हैं वह हमारे पूर्वजन्म के कर्म के कारण है लेकिन यह बात पूर्णत: सत्य नहीं है। इसका मतलब यह कि इसमें कुछ तो सच है। अक्सर समाज में ऐसी धारणाएं प्रचलित हो जाती है और इस धारणा के चलते हिन्दू धर्म को भाग्यवादियों का धर्म मान लिया जाता है। इस धारणा के चलते यह भी मान लिया जाता है कि फिर तो हमें कोई कर्म करना ही नहीं चाहिए जब सबकुछ पूर्वजन्म से ही तय और निश्चित है तो।... लेकिन ऐसी धारणा का प्रचलन समाज में इसलिए होता है क्योंकि अधिकांश लोग कर्म के सिद्धांत को पूर्णत: समझते नहीं है।

धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्रों में कहा गया है कि कर्म के बगैर गति नहीं। सनातन धर्म भाग्यवादियों का धर्म नहीं है। कर्म से ही का जन्म होता है। वेद, उपनिषद और गीता- तीनों ही कर्म को कर्तव्य मानते हुए इसके महत्व को बताते हैं। यही पुरुषार्थ है। श्रेष्ठ और निरंतर कर्म किए जाने या सही दिशा में सक्रिय बने रहने से ही पुरुषार्थ फलित होता है। वेदों में कहा गया है कि समय तुमको बदले इससे पूर्व तुम ही स्वयं या समय को बदल लो- यही कर्म का मूल सिद्धांत है। अन्यथा फिर तुम्हें प्रकृति या दूसरों के अनुसार ही जीवन जीना होगा।

व्यक्ति निरंतर कर्म करता रहता है। सोया हुआ व्यक्ति भी कर्म कर रहा है। कर्म का संबंध हमारे शरीर, मन, मस्तिष्क और चित्त की गति से है। गति कभी भी रुकती नहीं है। रुकने में भी एक गति है। इस कर्म गति से ही अगले कर्म की गति निर्मित होती है। कुछ ऐसा कर्म होते हैं जिनका फल चमत्कार की तरह प्रस्तुत होता है।

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धर्म शास्त्रों में मुख्‍यत: छह तरह के कर्म का उल्लेख मिलता है- 1.नित्य कर्म (दैनिक कार्य), 2.नैमित्य कर्म (नियमशील कार्य), 3.काम्य कर्म (किसी मकसद से किया हुआ कार्य), 4.निश्काम्य कर्म (बिना किसी स्वार्थ के किया हुआ कार्य), 5.(प्रारब्ध से सहेजे हुए कर्म) और 6.निषिद्ध कर्म (नहीं करने योग्य कर्म)। वर्तमान में जो कर्म किया जाता है वही क्रियामाण कर्म कहा जाता है। अक्सर लोग प्रारब्ध कर्म की बुराई करते हुए कहते हैं कि यह तो हिन्दू धर्म की भाग्यवादी और अकर्मण्यता की विचारधारा से उपजा विचार है। यह लोगों को निकम्मा बनाता है। इसके जवाब में पहले यह जान लेते हैं कि प्रारब्ध कर्म क्या है?

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क्या होता है प्रारब्ध कर्म?
हम जोभी कर रहे हैं जैसे सोचना, देखना, सुनना, समझना, रोना, हंसना और अन्य कर्म करना। उनमें से कुछ हमारी आदतें बनकर संचित होने लगते हैं। संचित अर्थात संग्रहित, संग्रहित अर्थात स्टोर। वह कर्म जो स्टोर हो रहे हैं वह संचित कर्म कहे जाते हैं। बार-बार एक ही कर्म या कार्य करने से वह कर्म या कार्य स्टोर हो जाता है। मरने के समय इस स्टोर कर्म का कुछ भाग हमारे साथ अगले जन्म में भी चला जाता है। वही भाग प्रारब्ध कहलाता है।

जैसे किसी व्यक्ति की पिछले जन्म में एक टांग टूटी थी। और उसने यदि अपने पिछले जीवन का लगभग 10 साल एक टांग पर ही गुजारा है तो वह इस जीवन में अपनी एक टांग को लेकर अजीब ही स्थिति में रहेगा। उसके अवचेतन मन में यह बात है कि मेरी एक टांग ही है। हलांकि उसका चेतन मन यह नहीं जानता। लेकिन आदत वष उसकी एक टांग ज्यादा सक्रिय रहती है जबकि दूसरी टांग नहीं। यह अहसास अजीब होता है। दूसरा उदाहरण यह कि यदि किसी व्यक्ति की पिछले जन्म में उसकी किसी घटना, दुर्घटना आदि में समय से पूर्व मौत हो गई है तो निश्चित ही वह वैसी परिस्थिति से अक्सर डरा हुआ रहेगा जिस परिस्थिति में उसकी मौत हुई थी।


तीसरा उदाहरण यदि किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार का रोग हुआ है तो वह उसके द्वारा किए गए पूर्व कर्म का ही परिणाम है। कैसे? उसने निश्चित ही अपने शरीर का ध्यान नहीं रखा, अनावश्यक खाद्य पदार्थों का सेवन किया होगा या कोई संक्रमित भोजन व पानी को ग्रहण किया होगा। हालांकि आप पूछ सकते हैं कि किसी व्यक्ति के सिर पर अचानक कहीं से पत्‍थर आकर लगे तो यह उसने कौन-सा कर्म किया होगा जो पत्‍थर लगा? पहली बात तो यह कि उसका वहां खड़ा होना ही उसका प्रथम कर्म है। बाकी इसे समझने के लिए कर्म सिद्धांत के विस्तार में जाना होगा।

हिंदू दर्शन के अनुसार, मृत्यु के बाद मात्र यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है। यह सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक या संग्राहक होता है।

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पुनर्जन्म और कर्मों का सिद्धांत : यहूदी और उनसे निकले धर्म पुनर्जन्म की धारणा को नहीं मानते। मरने के बाद सभी कयामत के दिन जगाए जाएंगे अर्थात तब उनके अच्छे और बुरे कर्मों पर न्याय होगा। इब्राहीमी धर्मों की मान्यता है कि मरणोपरांत आत्मा कब्र में विश्राम करती है और आखिरी दिन ईश्‍वर के हुक्म से उठाई जाएगी और फिर उनका फैसला होगा, लेकिन हिन्दू धर्म के अनुसार ऐसा नहीं है।

हिन्दू धर्म पुनर्जन्म में विश्वास रखता है। इसका अर्थ है कि आत्मा जन्म एवं मृत्यु के निरंतर पुनरावर्तन की शिक्षात्मक प्रक्रिया से गुजरती हुई अपने पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है। जन्म और मत्यु का यह चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक कि आत्मा मोक्ष प्राप्त नहीं कर लेती।


मोक्ष प्राप्ति का रास्ता कठिन है। वेद और उपनिषद कहते हैं कि शरीर छोड़ने के बाद भी तुम्हारे वे सारे कर्मों के क्रम जारी रहेंगे, जो तुम यहां रहते हुए करते रहे हों और जब अगला शरीर मिलेगा तो यदि तुमने दु:ख, चिंता, क्रोध और उत्तेजना को संचित किया है तो अगले जन्म में भी तुम्हें वही मिलेगा, क्यों‍कि यह आदत तुम्हारा स्वभाव बन गई है।

श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के 22वें श्लोक में कहा गया है- 'जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार यह जीवात्मा भी पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करता है।' चौथे अध्याय के 5वें श्लोक में कहा गया है- 'हे अर्जुन, मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म बीत गए हैं। बस फर्क यह है कि मैं उन सबको जानता हूं, परंतु हे परंतप! तू उसे नहीं जानता।'


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जन्म चक्र : पुराणों के अनुसार व्यक्ति की आत्मा प्रारंभ में अधोगति होकर पेड़-पौधे, कीट-पतंगे, पशु-पक्षी योनियों में विचरण कर ऊपर उठती जाती है और अंत में वह मनुष्य वर्ग में प्रवेश करती है। मनुष्य अपने प्रयासों से देव या दैत्य वर्ग में स्थान प्राप्त कर सकता है। वहां से पतन होने के बाद वह फिर से मनुष्य वर्ग में गिर जाता है। यह क्रम चलता रहता है।

प्रारब्ध : यही कारण है कि व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार जीवन मिलता है और वह अपने कर्मों का फल भोगता रहता है। यही कर्मफल का सिद्धांत है। 'प्रारब्ध' का अर्थ ही है कि पूर्व जन्म अथवा पूर्वकाल में किए हुए अच्छे और बुरे कर्म जिसका वर्तमान में फल भोगा जा रहा हो। विशेषतया इसके 2 मुख्य भेद हैं कि संचित प्रारब्ध, जो पूर्व जन्मों के कर्मों के फलस्वरूप होता है और क्रियमान प्रारब्ध, जो इस जन्म में किए हुए कर्मों के फलस्वरूप होता है। इसके अलावा अनिच्छा प्रारब्ध, परेच्छा प्रारब्ध और स्वेच्छा प्रारब्ध नाम के 3 गौण भेद भी हैं। प्रारब्ध कर्मों के परिणाम को ही कुछ लोग भाग्य और किस्मत का नाम दे देते हैं। पूर्व जन्म और कर्मों के सिद्धांत को समझना जरूरी है।

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संस्कार क्या होते हैं?
संस्कार अर्थात हमने जो भी अच्छे और बुरे कर्म किए हैं वे सभी और हमारी आदतें। ये संस्कार मनुष्य के पूर्वजन्मों से ही नहीं आते, अपितु माता-पिता के संस्कार भी रज और वीर्य के माध्यम से उसमें (सूक्ष्म शरीर में) प्रविष्ट होते हैं, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व इन दोनों से ही प्रभावित होता है। बालक के गर्भधारण की परिस्थितियां भी इन पर प्रभाव डालती हैं। ये कर्म 'संस्कार' ही प्रत्येक जन्म में संगृहीत (एकत्र) होते चले जाते हैं, जिससे कर्मों (अच्छे-बुरे दोनों) का एक विशाल भंडार बनता जाता है। इसे 'संचित कर्म' कहते हैं।

इन संचित कर्मों का कुछ भाग एक जीवन में भोगने के लिए उपस्थित रहता है और यही जीवन प्रेरणा का कार्य करता है। अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में प्रेरणा का कार्य करता है। अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में अच्छे-बुरे कर्म करता है। फिर इन कर्मों से अच्छे-बुरे नए संस्कार बनते रहते हैं तथा इन संस्कारों की एक अंतहीन श्रृंखला बनती चली जाती है, जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

दरअसल, इन संचित कर्मों में से एक छोटा हिस्सा हमें नए जन्म में भोगने के लिए मिल जाता है। इसे प्रारब्ध कहते हैं। ये प्रारब्ध कर्म ही नए होने वाले जन्म की योनि व उसमें मिलने वाले भोग को निर्धारित करते हैं। फिर इस जन्म में किए गए कर्म, जिनको क्रियमाण कहा जाता है, वह भी संचित संस्कारों में जाकर जमा होते रहते हैं।


जिस तरह से चोर को मदद करने के जुर्म में साथी को भी सजा होती है ठीक उसी तरह काम्य कर्म और संचित कर्म में हमें अपनों के किए हुए कार्य का भी फल भोगना पड़ता है और इसीलिए कहा जाता है कि अच्छे लोगों का साथ करो ताकि कर्म की किताब साफ रहे। जिस बालक को बचपन से ही अच्छे संस्कार मिले हैं उसका कर्म भी अच्छा ही होगा और फिर उसके संचित कर्म भी अच्छे ही होंगे। अलगे जन्म में उसे अच्छा प्रारब्ध ही मिलेगा।

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