हिन्दू कुल : गोत्र और प्रवर क्या है, जानिए-1

धरती के मूल मनुष्य तो आज भी वानर, चिंपाजी और वनमानुष की श्रेणी में आते हैं? माना जाता है कि उनमें से भी कई जातियां तो लुप्त हो गई हैं जो अर्धमान जैसी थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जिस तरह देवी-देवताओं को एक खास तरह से रचा गया था, उसी तरह मनुष्यों को भी रचा गया है। लेकिन वे मनुष्‍य कौन हैं? उपनाम में छुपा है पूरा इतिहास> >
कहते हैं कि उन्हीं विशेष रंग और रूप के मनुष्यों ने अपनी शुद्धता को बरकरार रखने के लिए दूसरे मनुष्यों से रोटी-बेटी के कभी संबंध नहीं बनाए। यह संबंध नहीं बनाना ही समाज में फर्क पैदा कर गया। इस तरह समाज दो भागों में विभक्त हो गया। फिर जिन मनुष्यों ने अपने समूह से निकलकर दूसरे समूह से संबंध बनाए, उनको समाज और क्षेत्र से बहिष्कृत कर दिया गया। इस तरह समाज में तीन भाग हो गए। इससे समाज में फर्क बढ़ता रहा तो संघर्ष भी बढ़ता रहा।
एक तरफ वे लोग थे, जो खुद को श्रेष्ठ मानते थे और दूसरी तरफ वे लोग थे, जो खुद को अश्रेष्ठ मानने वालों के खिलाफ लड़ते थे और तीसरी ओर वे लोग थे जिन्होंने श्रेष्ठ और अश्रेष्ठ की दीवार को तोड़कर एक नए समाज की रचना की और इस तरह क्षेत्र विशेष में तीन तरह की सत्ता अस्तित्व में आई। मजेदार बात यह कि जिन्होंने दीवार को तोड़कर एक नए समाज की रचना की थी उन्होंने भी अपने नियम बनाए कि वे समाज से बाहर जाकर कोई तथाकथित किसी श्रेष्ठ या अश्रेष्ठ से संबंध न बनाएं। बस, इसी तरह 3 से 30 और फिर 300 होते गए। ऐसे समय में शुद्धता के प्रति समाजों में और कट्टरता बढ़ने लगी। लेकिन इन सबके बीच एक नियम काम करता था और वह था 'गोत्र' देखना।

गोत्र रखने का पहला कारण : गोत्र पहले सामाजिक एकता का आधार था, लेकिन अब नहीं। गोत्र क्यों जरूरी था? वह इसलिए कि एक ही कुल से कोई ब्राह्मण होता था तो कोई क्षत्रिय, तो कोई वैश्य और कोई शूद्र कर्म करता था। ऐसे में गोत्र से ही उसकी पहचान होती थी। अब आप ही इसकी खोज कीजिए कि क्या कौरव और पांडव क्षत्रिय थे? क्या वाल्मीकि ब्राह्मण थे? वर्तमान युग के हिसाब से कृष्ण कौन थे? यह पक्के तौर पर कहा जा सकता है कि हमारे ऋषि-मुनि वर्तमान में प्रचलित किसी भी वर्ण या जाति के नहीं थे। पुराण तब लिखे गए जबकि जाति और वर्ण का बोलबाला था। पुराण बौद्धकाल में लिखे गए थे।

पहले तो ऐसा था कि क्षत्रिय और ब्राह्मण आपस में विवाह करते थे, लेकिन गोत्र देखकर। और यदि क्षत्रिय का गोत्र भी भारद्वाज और ब्राह्मण का गोत्र भी भारद्वाज होता था तो यह विवाह नहीं होता था, क्योंकि ये दोनों ही भारद्वाज ऋषि की संतानें हैं। पहले ये चार वर्ण रंग पर आधारित थे फिर कर्म पर और बौद्धकाल में ये जाति पर आधारित हो गए। जब से ये जाति पर आधारित हुए हैं हिन्दू समाज का पतन होना शुरू हो गया।

गोत्र रखने का दूसरा कारण : गोत्र को शुरुआत से ही बहुत महत्व दिया जाता रहा है। बहुत से समाज ऐसे हैं, जो गोत्र देखकर ही विवाह करते हैं। आपने विज्ञान में पढ़ा होगा गुणसूत्र (Chromosome) के बारे में। गुणसूत्र का अर्थ है वह सूत्र जैसी संरचना, जो संतति में माता-पिता के गुण पहुंचाने का कार्य करती है।

गुणसूत्र की संरचना में दो पदार्थ विशेषत: संमिलित रहते हैं- (1) डिआक्सीरिबोन्यूक्लीइक अम्ल (Deoxryibonucleic acid) या डीएनए (DNA), तथा (2) हिस्टोन (Histone) नामक एक प्रकार का प्रोटीन। इसकी व्याख्या बहुत विस्तृत है। खैर..

प्रत्येक जोड़े में एक गुणसूत्र माता से तथा एक गुणसूत्र पिता से आता है। इस तरह प्रत्येक कोशिका में कुल 46 गुणसूत्र होते हैं जिसमें 23 माता व 23 पिता से आते हैं। जैसा कि कुल जोड़े 23 है। इन 23 में से एक जोड़ा लिंग गुणसूत्र कहलाता है। यह होने वाली संतान का लिंग निर्धारण करता है अर्थात पुत्र होगा या पुत्री।

यदि इस एक जोड़े में गुणसूत्र xx हो तो संतान पुत्री होगी और यदि xy हो तो संतान पुत्र होगी। परंतु दोनों में x समान है, जो माता द्वारा मिलता है और शेष रहा वो पिता से मिलता है। अब यदि पिता से प्राप्त गुणसूत्र x हो तो xx मिलकर स्त्रीलिंग निर्धारित करेंगे और यदि पिता से प्राप्त y हो तो पुल्लिंग निर्धारित करेंगे। इस प्रकार x पुत्री के लिए व y पुत्र के लिए होता है। इस प्रकार पुत्र-पुत्री का उत्पन्न होना माता पर नहीं, पूर्णतया पिता से प्राप्त होने वाले x अथवा y गुणसूत्र पर निर्भर होता है।

तो महत्वपूर्ण y गुणसूत्र हुआ, क्योंकि y गुणसूत्र के विषय में हम निश्चिंत हैं‍ कि यह पुत्र में केवल पिता से ही आया है। बस इसी y गुणसूत्र का पता लगाना ही गौत्र प्रणाली का एकमात्र उदेश्य था, जो हमारे ऋषियों ने जान लिया था। यह पूर्णत: एक वैज्ञानिक पद्धति थी। वैज्ञानिक कहते हैं कि गुणसूत्रों के बदलावा से कई तरह की बीमारियों का विकास होता है। इसलिए विवाह के दौरान जहां गोत्र देखा जाता है वहीं ज्योतिष पद्धति अनुसार गुणों का मिलान भी होता है।

वर्तमान के वैज्ञानिक गुणसूत्रों को बदलने का प्रयोग कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए पहले पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों के गुणसूत्रों में बदलावा करके एक नई जाति बनाने का प्रयास किया है। मनुष्य के गुण सूत्रों के हेर-फेर से जो परिणाम सामने आए उनसे स्पष्ट है कि बिगाड़ने में अधिक और बनाने में कम सफलता मिली है। जारी...

प्रस्तुति : अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'

 

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