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नगरवधू कौन होती थी, जानिए...

Last Updated: शुक्रवार, 10 मार्च 2017 (15:50 IST)
नगरवधू का अर्थ होता है संपूर्ण नगरवासियों की पत्नी। नगर के प्रतिष्ठित लोगों द्वारा चुनी गई वह सुन्दर स्त्री जो नाच-गाने द्वारा लोगों का मन बहलाया करती थी। इसका मुख्य काम राजाओं, मंत्रियों और बड़े लोगों को खुश रखना होता था। हालांकि नगरवधू बनने के बाद ही किसी महिला को यह पता चलता था किस यह काम कितना मुश्किल और खतरे भरा है। यह खतरा ही उसे साहसी और राजनतिज्ञ बनाता था। उक्त काल में राज नर्तकी, नगरवधू, गणिका, रूपाजीवा, देवदासी हुआ करती थी। सभी के कार्य अलग-अलग हुआ करते थे। 
1.नगरवधू : कहते हैं कि उक्त काल में शहर की सभी खूबसूरत लड़कियों को एक प्रतियोगिता में भाग लेने को कहा जाता था, जो लड़की इस प्रतियोगिता को जीतती थी उसे नगरवधू बना दिया जाता था। इसके बाद उसे फूलों से भरा बहुत बड़ा बगीचा और सभी तरह की सुविधाओं से युक्त महल मिलता था।
2.रूपजीवा : रूपजीवाओं के तहत नटी वेश्याएं थीं, जो गीत नृत्य से अपना जीवन यापन करती थीं।
3.गणिकाएं : गणिकाओं में दो तरह की स्त्रियां होती थीं, कोठे पर रहने वाली और निजी घरों में रहने वाली। गणिकाओं को उच्चवर्गीय शिक्षित तथा गुणी वेश्याओं के तौर पर समझा जाता था। गणिकाओं का यद्यपि सामंत, जमींदारों, उच्चवर्गीय कुलीनों के बीच सम्मान जरूर था, लेकिन ‘घर-बाहर’ के दायरे में वे बाहर की प्रतिनिधि थीं, जो स्त्रियों के लिए सम्मानजनक नहीं माना जाता था।
4.देवदासी : उक्त तरह की महिलाएं किसी धर्म के कार्य के लिए अपना जीनन अर्पित कर देती थी। 
 
नगरवधू शब्द का चलन खासकर उस क्षेत्र में ज्यादा प्राचलित था जहां बौद्ध संघ का प्रभाव था। वैशाली की नगरवधू के बारे में पढ़ने को मिलता है। आचार्य चतुरसेन ने आम्रपाली नामक एक नगरवधू पर उपन्यास लिखा है। इसी तरह देवदासी प्राथा पर देवांगना नाम का एक उपन्यास पढ़ने को मिलता है। आम्रपाली के भिक्षुणी हो जाने के बाद उसके महल और उपवनों को चातुर्मास में सभी भिक्षुओं के रहने के लिए उपयोग में लिया जाने लगा था। आगे चलकर वह बुद्ध के संघ में सबसे प्रतिष्ठित भिक्षुणियों में से एक बनीं।
 
इस नगरवधू के पास उसकी कई दासियां, कर्मचारी और सुरक्षाकर्मी होते थे। नगरवधू का देवियों की तरह सम्मान किया जाता था। यह भी कहा जाता है कि इस नगरवधू के साथ रात गुजारने की कीमत इतनी ज्यादा होती थी कि शाही परिवार के अलावा कोई अन्य इसे जुटाने की सामर्थ्य नहीं कर पाता था। लेकिन यह भी सत्य है कि यहां इसके अलावा नृत्य और सूरापान की विशेष व्यवस्था होती थी, जहां कुछ कीमत चुकाकर उसका लाभ उठाया जा सकता था। हालांकि इन नगरवधुओं के महल नगर क्षेत्र से बाहर होते थे और नगर में किसी भी प्राकार के अवैधानिक कार्य नहीं होने दिए जाते थे। उक्त काल में इस तरह की व्यवस्था को आज के कालानुसार वैश्यावृत्ति का वैधानिक और व्यवस्थित तरीका माना जा सकता है।
 
दुनिया की महान संस्कृतियों में से एक हिन्दू, बौद्ध, रोमन और ग्रीक सभ्यता में सेक्स को ले कर भिन्न भिन्न मान्यताएं थे लेकिन यह विषय उतना वर्जित नहीं था जितना की मध्यकाल में माना जाने लगा। हालांकि उस काल के लोग इसे आम सामाजिक जीवन से दूर रखकर वैधानिक दर्जा देकर इसे समाज में फैलने से रोकने की युक्ति भी जरूर मानते थे।
 
प्राचीन काल में वैश्या को उतना बुरा नहीं माना जाता था जितना की आज। उक्त काल में ये महिलाएं ऐसे लोगों की सेक्स इच्‍छा दूर करती थी जो किसी सैन्य अभियान पर है या जिसने धर्म-संस्कृति आदि के महत्वपूर्ण कार्य के लिए गृहस्थ जीवन त्याग दिया है। इसके अलावा तंत्र मार्ग हेतु भी इस तरह की महिलाएं बहुत सहयोग करती थी। इसके अलावा ऐसी महिलाएं धनवान और राज परिवार के लोगों को संतुष्ट करने और उनके लिए जासूसी का कार्य करने का काम भी करती थी। 
 
विश्व की विकसित सभ्यताओं में से एक ग्रीक सभ्यता के साइप्रस (Cyprus), सिसिली (Sicily), किंगडम ऑफ पोंटस (Kingdom of Pontus) और कप्पादोकिया (Cappadocia) शहर में उपरोक्त प्रथा बड़े पैमाने पर प्रचलित थी। जबकि जेरूशलम में वह मंदिर था, जहां कामुक गतिविधियों को अंजाम दिया जाता था। दरअसल, यह उस काल में विकसित कहे जाने वाले हर नगर में प्रचलित थी।
 
जब इस प्रथा का विकृत रूप सामने आने लगा तो इसका विरोध भी होने लगा और अंतत: इस प्राथा को खत्म कर दिया गया। भारत में सतीत्व, पत्नीत्व को आदर देने की सामाजिक सांस्कृतिक व्यवस्था रूढ़ थी। इस तरह इनका एक अलग संसार बनता गया, जो सामान्य लोगों के बीच यथार्थ से ज्यादा किस्से कहानियों की तरह उपस्थित थीं। ऐसे में नगरवधुओं के लिए कोई जगह नहीं थी। ऐसे व्यवस्थाएं वहां ज्यादा देखने को मिलती है जहां गणतंत्र या गणराज्या का जोर था। 
 
अगले पन्ने पर वैशाली की नगरवधू आम्रपाली की कहानी...
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