खुलासा, इन पांच में से इस स्त्री के कारण हुआ था महाभारत का युद्ध?

अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: मंगलवार, 12 जून 2018 (16:29 IST)
मूलत: किस कारण हुआ यह बताना मुश्किल है, लेकिन यह आम धारणा है कि जर, जोरू और जमीन के लिए ही युद्ध होते रहे हैं। महाभारत में भूमि बंटवारा युद्ध का सबसे बड़ा कारण था। लेकिन दूसरे लोग मानते हैं कि बंटवारा शांतिपूर्वक हो सकता था लेकिन कुछ महिलाओं की जिद के कारण कौरवों और पांडवों के बीच कटुता बढ़ गई जिसके परिणामस्वरूप युद्ध हुआ। आओ जानते हैं कि वे कौन महिलाएं थी और कैसे उनके कारण महाभारत का युद्ध हुआ।

1.सत्यवती : महाभारत की शुरुआत राजा शांतनु से होती है। राजा शांतनु ने गंगा से विवाह कर एक पुत्र पाया था जिसका नाम देवव्रत (भीष्म) था। गंगा के चले जाने के बाद शांतनु ने एक निषाद कन्या सत्यवती से विवाह कर लिया। सत्यवती ने विवाह की शर्त यह रखी कि उनका पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी होगा।
यह बात सुनकर शांतनु महल लौट आए और उदास तथा चुप--चुप रहने लगे। जब भीष्म को यह पता चला तो उन्होंने अपने पिता के खातिर सत्यवती को वचन दिया की मैं आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा और आपना पुत्र ही राज्य का उत्तराधिकारी होगा।

सत्यवती ही एक प्रमुख कारण थी जिसके चलते हस्तिनापुर की गद्दी से कुरुवंश नष्ट हो गया। यदि भीष्म सौगंध नहीं खाते तो वेदव्यास के 3 पुत्र पांडु, धृतराष्ट्र और विदुर हस्तिनापुर के शासक नहीं होते या यह कहें कि उनका जन्म ही नहीं होता। तब इतिहास ही कुछ और होता। धृतराष्ट्र और पांडु की माताएं अम्बिका और अम्बालिका काशी नरेन्द्र की पुत्रियां थी। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी और पांडु की पत्नी कुंती का जीवन बहुत ही संघर्षों से भरा रहा है, लेकिन इन सबसे पहले अम्बिका और अम्बालिका के पति विचित्रवीर्य की माता सत्यवती का ही राजपाट और महल में दखल अधिक था। वही सारे फैसले लेती थी और भीष्म को उनकी बातें सुनना होती थी। उसके जाने के बाद सत्ता का केंद्र बदल गया।
2.कुंती : भीष्म की प्रतिज्ञा के बाद कुरुवंश का इतिहास बदल गया। महाभारत के अनुसार पांडु अम्बालिका और ऋषि वेदव्यास के पुत्र थे। वे पांडवों के धर्मपिता और धृतराष्ट्र के छोटे भाई थे। धृतराष्ट्र के अंधे होने के कारण पांडु को हस्तिनापुर का शासक बनाया गया।

एक बार राजा पांडु अपनी दोनों रानियों कुंती और माद्री के साथ आखेट कर रहे थे कि तभी उन्होंने मृग होने के भ्रम में बाण चला दिया, जो एक ऋषि को जाकर लगा। उस समय वह ऋषि अपनी पत्नी के साथ सहवास कर रहे थे और उसी अवस्था में उन्हें बाण लग गया इसलिए उन्होंने पांडु को श्राप दे दिया कि जिस अवस्था में उनकी मृत्यु हो रही है उसी प्रकार जब भी पांडु अपनी पत्नियों के साथ सहवासरत होंगे तो उनकी भी मृत्यु हो जाएगी। उस समय पांडु की कोई संतान नहीं थी। पांडु ने इस शाप के डर से अपनी पत्नी कुंती और माद्री से कभी सहवास नहीं किया। ऐसे में कुंति ने दुर्वासा से मिले वरदान का उपयोग किया। इस वरदान से कुंती किसी भी देवता का आवाहन कर उन्हें बुलाकर उनके साथ 'नियोग' कर सकती थी। विवाह पूर्व उन्होंने सूर्यदेव का आवाहन किया था जिसके चलते 'कर्ण' का जन्म हुआ था लेकिन कुंती ने लोक-लज्जा के कारण उसे नदी में बहा दिया था। कुंती ने इस वरदान के बारे में पांडु को बताया और पांडु मान गए। तब कुंती ने एक-एक कर कई देवताओं का आवाहन किया। इस प्रकार माद्री ने भी देवताओं का आवाहन किया। तब कुंती को तीन और माद्री को दो पुत्र प्राप्त हुए जिनमें युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ थे। कुंती के अन्य पुत्र थे भीम और अर्जुन तथा माद्री के पुत्र थे नकुल व सहदेव। कुंती ने धर्मराज, वायु एवं इंद्र देवता का आवाहन किया था तो माद्री ने अश्विन कुमारों का।

पांडु को माद्री की मृत्यु के बाद कुंति ने अपने पुत्रों को राज्याधिकार दिलाने के लिए हस्तिनापुर का रूख किया। हस्तिनापुर में रहने वाले ऋषि-मुनि सभी पांडवों को राजा पांडु का पुत्र मानते थे तो वे सभी मिलकर पांडवों को राजमहल छोड़कर आ गए। कुंती के कहने पर सभी ने पांडवों को पांडु का पुत्र मान लिया और उनका स्वागत किया। राजमहल में कुंती का सामना गांधारी से भी हुआ। कुंती और गांधारी में अपने अपने पुत्रों को राज्य का पूर्ण अधिकार दिलाने की अप्रत्यक्ष जंग शुरू हो गई और इस जंग का परिणाम हुआ महाभारत का युद्ध।
3.गांधारी : धृतराष्ट्र को आंखों से नहीं, मन से भी अंधों की भांति व्यवहार करते थे इसलिए गांधारी और शकुनि को अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता संभालनी पड़ी। गांधारी को यह चिंता सताने लगी थी कि कहीं कुंती के पुत्र सिंहासनारूढ़ न हो जाए। ऐसे में शकुनि ने दुर्योधन के भीतर बाल्यकाल से ही पांडवों के प्रति घृणा का भाव भर दिया था। गांधारी और धृतराष्ट्र ने कभी भी यह स्वीकार नहीं किया कि पांडुओं को पांच गांव देकर युद्ध को टाला जाए।

4.द्रौपदी : पांडवों की पत्नी द्रौपदी को इस युद्ध का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। महाभारत के अनुसार जब दुर्योधन इंद्रप्रस्थ को देखने गया तो एक जगह उसने रंगोली बनी देखी और उसने समझा कि यह कितना सुंदर फर्श है लेकिन असल में वह जल से भरा ताल था। दुर्योधन उसमें गिर पड़ा। भ्रमवश उसके गिरने पर द्रौपदी जोर से हंसने लगी और उसके मुंह से निकल गया- 'अंधे का पुत्र भी अंधा।'


बस यही बात दुर्योधन के दिल में तीर की तरह धंस गई। हालांकि बाद में द्रौपदी को अपनी गलती का अहसास भी हुआ था, लेकिन व्यंग्य में कहे गए शब्द का जो असर होना चाहिए थे वह हो चुका था। दुर्योधन ने अपने इस अपमान का बदला लेने की ठान ली थी। शकुनि ने इस अपमान का बदला लेने की एक तरकीब बतलाई। उसने दुर्योधन से कहा कि पांडवों को द्यूतकीड़ा खेलने के लिए आमंत्रित किया जाए। उन्होंने कहा कि राज्य बंटवारे का निर्णय अब इस खेल के माध्यम से ही होगा।
द्यूतक्रीड़ा (जुआ) न खेली गई होती तो युद्ध तो शायद युद्ध भी नहीं होता। पांडवों ने दुर्योधन के आमंत्रण को स्वीकार कर लिया। उन्होंने अपने भाग्य का निर्णय द्यूत के खेल पर छोड़ दिया। लेकिन पांडव तो इस खेल में माहिर नहीं थे फिर कैसे वे यह खेल खेलने के लिए तैयार हो गए। उनका मानना था कि यह खेल भाग्य पर निर्भर है न कि चाल, छल या कपट पर। भगवान कृष्ण ने इस खेल का विरोध किया था, लेकिन पांडव नहीं माने। श्रीकृष्ण ने कहा कि फिर इस बुरे खेल में मैं साथ नहीं दूंगा। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा भी है कि सबसे बुरे खेल में द्यूतक्रीड़ा है।

पांडव खेल में एक के बाद एक राज्य हारते गए। फिर उन्होंने उनके पास की वस्तुएं भी दांव पर लगा दीं। अंत में उन्होंने द्रौपदी को दांव पर लगा दिया। बस, यहीं से युद्ध की नींव रख दी गई। द्रौपदी का चीरहरण होते हुए सबसे देखा। लेकिन भगवान कृष्ण ने अंत में पहुंचकर द्रौपदी की लाज बचाई। यह महाभारत का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था।
5. सुभद्रा : सुभद्रा तो कृष्ण की बहन थी जिसने कृष्ण के मित्र अर्जुन से विवाह किया था, जबकि बलराम चाहते थे कि सुभद्रा का विवाह कौरव कुल में हो। बलराम के हठ के चलते ही तो कृष्ण ने सुभद्रा का अर्जुन के हाथों हरण करवा दिया था। बाद में द्वारका में सुभद्रा के साथ अर्जुन का विवाह विधिपूर्वक संपन्न हुआ। विवाह के बाद वे एक वर्ष तक द्वारका में रहे और शेष समय पुष्कर क्षेत्र में व्यतीत किया। 12 वर्ष पूरे होने पर वे सुभद्रा के साथ इंदप्रस्थ लौट आए।

6.लक्ष्मणा : श्रीकृष्ण की 8 पत्नियों में एक जाम्बवती थीं। जाम्बवती-कृष्ण के पुत्र का नाम साम्ब था। साम्ब का दिल दुर्योधन-भानुमती की पुत्री लक्ष्मणा पर आ गया था और वे दोनों प्रेम करने लगे थे। दुर्योधन के पुत्र का नाम लक्ष्मण था और पुत्री का नाम लक्ष्मणा। दुर्योधन अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के पुत्र ने नहीं करना चाहता था। भानुमती सुदक्षिण की बहन और दुर्योधन की पत्नी थी। इसलिए एक दिन साम्ब ने लक्ष्मणा से प्रेम विवाह कर लिया और लक्ष्मणा को अपने रथ में बैठाकर द्वारिका ले जाने लगा। जब यह बात कौरवों को पता चली तो कौरव अपनी पूरी सेना लेकर साम्ब से युद्घ करने आ पहुंचे।

कौरवों ने साम्ब को बंदी बना लिया। इसके बाद जब श्रीकृष्ण और बलराम को पता चला, तब बलराम हस्तिनापुर पहुंच गए। बलराम ने कौरवों से निवेदनपूर्वक कहा कि साम्ब को मुक्त कर उसे लक्ष्मणा के साथ विदा कर दें, लेकिन कौरवों ने बलराम की बात नहीं मानी। तब बलराम ने अपना रौद्र रूप प्रकट कर दिया। वे अपने हल से ही हस्तिनापुर की संपूर्ण धरती को खींचकर गंगा में डुबोने चल पड़े। यह देखकर कौरव भयभीत हो गए। संपूर्ण हस्तिनापुर में हाहाकार मच गया। सभी ने बलराम से माफी मांगी और तब साम्ब को लक्ष्मणा के साथ विदा कर दिया। द्वारिका में साम्ब और लक्ष्मणा का वैदिक रीति से विवाह संपन्न हुआ।

निष्कर्ष : सभी जानकार कहते हैं कि महाभारत के युद्ध कारण कुंति और गांधारी के बीच की लड़ाई का परिणाम था जिसमें आग में घी डालने का काम द्रौपदी ने किया था। हालांकि न कौरव कौरव थे और ना ही पांडव पांडव थे। कौरव जहां वेद व्यास के पुत्र थे वहीं पांडव अलग अलग देवताओं के पुत्र थे। देवताओं के पुत्रों को राज्य का उत्तराधिकारी बनाने के लिए यह युद्ध लड़ा गया जिसकी सबसे विचित्र बात यह थी कि वेद व्यास अपने पुत्रों की ओर से कभी पक्षकार नहीं रहे।

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