शून्य का आविष्कार, जानिए सचाई क्या है...

Last Updated: गुरुवार, 19 मार्च 2015 (11:26 IST)
से पहले दुनियाभर में कई तरह की अंक प्रणालियां विकसित थीं। शून्य का आविष्कार हो गया तब भी ये प्राचीन प्रणालियां प्रचलित थीं। कोई ऐसा स्थान था, जहां 5 में ही काम किया जाता था, तो कहीं पर 12 अंक प्रचलित थे। कहीं पर 24 अंक हुआ करते थे तो कहीं पर 2 से ही काम चला लिया जाता था। माया सभ्यता में अंकों का आधार 20 था तो सिंधु घाटी की सभ्यता में 9। ज्यादातर जगहों पर 1 से 9 तक गिनती को मान्यता मिलने लगी तब अंकों की तरफ लोगों का ध्यान जाने लगा। पहले लोग 9 के बाद 11 लिख देते या मान लेते थे, लेकिन शोधकर्ताओं उत्तर वैदिक काल में शून्य के आविष्कार के बाद गणित में एक क्रांति हो गई।
अंकों के मामले में विश्व भारत का ऋणी है। भारत ने अंकों के अलावा शून्य की खोज की। शून्य कहने को तो शून्य है, परंतु शून्य का ही चमत्कार है कि यह एक से दस, दस से हजार, हजार से लाख, करोड़ कुछ भी बना सकता है। शून्य की विशेषता है कि इसे किसी संख्या से गुणा करो अथवा भाग दो, फल शून्य ही रहेगा। शून्य की लंबाई, चौड़ाई या गहराई नहीं होती।
 
 
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