प्राचीन भारत के ये 6 लोग थे सबसे ज्यादा विवादित और भयंकर

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में ऐसे कई लोग थे जिन्होंने बड़े-बड़े विवाद खड़े कर दिए थे और इन्हीं विवादों या उनके विवादित रहने के कारण ही उन्हें जाना जाता है। तो जानते हैं ऐसे कई लोगों में से छह लोगों के बारे में संक्षिप्त जानकारी।

1.: इन्द्र को सभी देवताओं का राजा माना जाता है। इन्द्र किसी भी साधु और राजा को अपने से शक्तिशाली नहीं बनने देता था इसलिए वह कभी विश्वामित्र जैसे तपस्वियों को अप्सराओं से मोहित कर पथभ्रष्ट कर देता है, तो कभी राजाओं के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े चुरा लेता है। साम, दाम, दंड और भेद सभी तरीके से वह अपने सिंहासन को बचाने का प्रयास तो करता ही है, साथ ही वह इस प्रयास के दौरान कभी-कभी ऐसा भी कार्य कर जाता है, जो देवताओं को शोभा नहीं देता जिसके कारण देवताओं को बहुत बदनामी झेलना पड़ी।


राजा बलि की सहायता से ही देवराज इन्द्र ने समुद्र मंथन किया था। समुद्र मंथन के दौरान इन्द्र ने असुरों के साथ हर जगह छल किया। जो 14 रत्न प्राप्त हुए उनका बंटवारा भी छलपूर्ण तरीके से ही संपन्न हुआ।
शास्त्रों के अनुसार शचिपति इन्द्र ने गौतम की पत्नी अहिल्या के साथ छल से सहवास किया था। इंद्र ने कर्ण से भी छलपूर्वक कवच और कुंडल ले लिए थे। इंद्र ने ही बाल हनुमान की तोड़ दी थी ठुड्डी।


2.: कहते हैं कि इंद्र का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी वृत्रासुर ही था। यह सतयुग की बात है जब कालकेय नाम के एक राक्षस का संपूर्ण धरती पर आतंक था। वह वत्रासुर के अधीन रहता था। दोनों से त्रस्त होकर सभी देवताओं ने मिलकर सोचा वृत्रासुर का वध करना अब जरूरी हो गया। इस वृत्तासुर के वध के लिए ही दधीचि ऋषि की हड्डियों से एक हथियार बनाया जिसका नाम वज्र था। वृत्रासुर एक शक्तिशाली असुर था जिसने आर्यों के नगरों पर कई बार आक्रमण करके उनकी नाक में दम कर रखा था। अंत में इन्द्र ने मोर्चा संभाला और उससे उनका घोर युद्ध हुआ जिसमें वृत्रासुर का वध हुआ। इन्द्र के इस वीरतापूर्ण कार्य के कारण चारों ओर उनकी जय-जयकार और प्रशंसा होने लगी थी।


शोधकर्ता मानते हैं कि वृत्रासुर का मूल नाम वृत्र ही था, जो संभवतः असीरिया का अधिपति था। पारसियों की अवेस्ता में भी उसका उल्लेख मिलता है। वृत्र ने आर्यों पर आक्रमण किया था तथा उन्हें पराजित करने के लिए उसने अद्विशूर नामक देवी की उपासना की थी। इन्द्र और वृत्रासुर के इस युद्ध का सभी संस्कृतियों और सभ्यताओं पर गहरा असर पड़ा था। तभी तो होमर के इलियड के ट्राय-युद्ध और यूनान के जियॅस और अपोलो नामक देवताओं की कथाएं इससे मिलती-जुलती हैं। इससे पता चलता है कि तत्कालीन विश्व पर इन्द्र-वृत्र युद्ध का कितना व्यापक प्रभाव पड़ा था।


3.: रावण इंद्रजाल, तंत्र, सम्मोहन और तरह-तरह के जादू और सभी शास्त्रों का ज्ञाता था। लेकिन उसने ऐसे कई कार्य किए जिसके चलते वह विवादों में रहा। उसने अपने सौतेले भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर की पत्नी अप्सरा रंभा पर बुरी नजर डाली। उसने शिव के गण नंदीजी का मजाक उड़ाया। उसने वेदवती नामक तपस्विनी के साथ जबरदस्ती की थी। उसने अपनी बहन शूर्पणखा के पति विद्युतजिव्ह का वध कर दिया था। उसने अपनी पत्नी मंदोदरी की बड़ी बहन पर भी वासनायुक्त नजर डाली थी। अंत में उसने प्रभु श्रीराम की पत्नी सीता का अपहरण करके सारी हदें पा कर दी थी।


रावण ने इसके अलावा और भी कई कार्य किए थे जिसके चलते वह विवादों में रहा। जैसे उसने स्वर्ग तक सीढ़ी बनाने का प्रयास किया। शनि सहित सभी ग्रहों के देवताओं को बंदी बना लिया था। रावण का रंग काला था और वह गौरे लोगों से नफरत करता था। वह खुद को ईश्‍वर मानता था और चाहता था कि सभी उसकी पूजा करें। इसी के चलते रावण ने शिव, सहस्रबाहु और बाली से भी युद्ध किया था।
चापलूस पसंद रावण चाहता था कि शराब से दुर्गंध समाप्त कर उसका राज्य में प्रचार किया जाए। रावण चाहता था कि दुनिया के सभी सोने पर मेरा कब्जा और स्वर्ण में से सुगंध पैदा हो। ताकि यह आसानी से पता चल सके कि सोना कहां छिपा है। रावण की एक अजीब इच्छा थी वह यह कि वह चाहता था कि खून का रंग लाल की जगह सफेद हो। इस तरह रावण ने अपनी इच्छा और कार्यों से खुद को विवादित बना लिया था।


4.: हिरण्याक्ष भयंकर दैत्य था। वह तीनों लोकों पर अपना अधिकार चाहता था। हिरण्याक्ष का दक्षिण भारत पर राज था। ब्रह्मा से युद्ध में अजेय और अमरता का वर मिलने के कारण उसका धरती पर आतंक हो चला था। हिरण्याक्ष भगवान वराहरूपी विष्णु के पीछे लग गया था और वह उनके धरती निर्माण के कार्य की खिल्ली उड़ाकर उनको युद्ध के लिए ललकारता था। वराह भगवान ने जब रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया, तब उनका ध्यान हिरण्याक्ष पर गया।


आदि वराह के साथ भी महाप्रबल वराह सेना थी। उन्होंने अपनी सेना को लेकर हिरण्याक्ष के क्षे‍त्र पर चढ़ाई कर दी और विंध्यगिरि के पाद प्रसूत जल समुद्र को पार कर उन्होंने हिरण्याक्ष के नगर को घेर लिया। संगमनेर में महासंग्राम हुआ और अंतत: हिरण्याक्ष का अंत हुआ। आज भी दक्षिण भारत में हिंगोली, हिंगनघाट, हींगना नदी तथा हिरण्याक्षगण हैंगड़े नामों से कई स्थान हैं। उल्लेखनीय है कि सबसे पहले भगवान विष्णु ने नील वराह का अवतार लिया फिर आदि वराह बनकर हिरण्याक्ष का वध किया इसके बाद श्‍वेत वराह का अवतार नृसिंह अवतार के बाद लिया था। हिरण्याक्ष को मारने के बाद ही स्वायंभूव मनु को धरती का साम्राज्य मिला था।


5.महाबली : महाबली बाली अजर-अमर है। कहते हैं कि वो आज भी धरती पर रहकर देवताओं के विरुद्ध कार्य में लिप्त है। पहले उसका स्थान दक्षिण भारत के महाबलीपुरम में था लेकिन मान्यता अनुसार अब मरुभूमि अरब में है जिसे प्राचीनकाल में पाताल लोक कहा जाता था। अहिरावण भी वहीं रहता था। समुद्र मंथन में उसे घोड़ा प्राप्त हुआ था जबकि इंद्र को हाथी। उल्लेखनीय है कि अरब में घोड़ों की तादाद ज्यादा थी और भारत में हाथियों की।


शिवभक्त असुरों के राजा बाली की चर्चा पुराणों में बहुत होती है। वह अपार शक्तियों का स्वामी लेकिन धर्मात्मा था। वह मानता था कि देवताओं और विष्णु ने उसके साथ छल किया। हालांकि बाली विष्णु का भी भक्त था। भगवान विष्णु ने उसे अजर-अमर होने का वरदान दिया था। हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। प्रह्लाद के कुल में विरोचन के पुत्र राजा बाली का जन्म हुआ। बाली जानता था कि मेरे पूर्वज विष्णु भक्त थे, लेकिन वह यह भी जानता था कि मेरे पूर्वजों को विष्णु ने ही मारा था इसलिए बाली के मन में देवताओं के प्रति द्वेष था। उसने शुक्राचार्य के सान्निध्य में रहकर स्वर्ग पर आक्रमण करके देवताओं को खदेड़ दिया था। वह तीनों लोकों का स्वामी बन बैठा था। बाली से भारत के एक नए इतिहास की शुरुआत होती है।


6.: भगवान कृष्ण के मामा कंस अपने पूर्वजन्म में 'कालनेमि' नामक असुर था जिसे भगवान विष्णु ने मारा था। कंस का श्वसुर मगथ का सम्राट जरासंध था। महाभारत काल में जरासंध सबसे शक्तिशाली राजा था। श्रीकृष्ण द्वारा कंस का वध करने के बाद भगवान श्रीकृष्ण को सबसे ज्यादा यदि किसी ने परेशान किया तो वह था जरासंध।


जरासंध बृहद्रथ नाम के राजा का पुत्र था और जन्म के समय दो टुकड़ों में विभक्त था। जरा नाम की राक्षसी ने उसे जोड़ा था तभी उसका नाम जरासंध पड़ा। महाभारत युद्ध में जरासंध कौरवों के साथ था। जरासंध अत्यन्त क्रूर एवं साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का शासक था। हरिवंश पुराण अनुसार उसने काशी, कोशल, चेदि, मालवा, विदेह, अंग, वंग, कलिंग, पांडय, सौबिर, मद्र, काश्मीर और गांधार के राजाओं को परास्त कर सभी को अपने अधीन बना लिया था। इसी कारण पुराणों में जरासंध की बहुत चर्चा मिलती है। जरासंध का मित्र था कालयवन। भीम ने जरासंध के शरीर को दो हिस्सों में विभक्त कर उसका वध कर दिया था। जरासंध के कई किस्से हैं जिसके चलते वह विवादों में रहा।


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