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इन तीन लोगों के सिर धड़ से अलग हो गए थे लेकिन जोड़ दिए गए, जानिए प्राचीन रहस्य

प्राचीन भारत में चिकित्सा और सर्जरी के कई किस्से पुराणों में पढ़ने को मिलते हैं। हालांकि आज यह सोच पाना संभव नहीं है कि क्या उस काल में भी ऐसा होता था? इसे कपोल-कल्पना माना जा सकता है, क्योंकि वर्तमान समय में कोई भी डॉक्टर किसी के कटे हुए सिर को फिर से धड़ से जोड़कर मनुष्य को जिंदा नहीं कर सकता। हालांकि वैज्ञानिक यह जरूर कहते हैं कि मनुष्य का मस्तिष्क जब तक जिंदा है तब तक मृत्यु नहीं होती और यदि मस्तिष्क जलाया या दफनाया नहीं जाए तो वह ज्यादा से ज्यादा 3 दिन तक सक्रिय रह सकता है।

हम आपको बताएंगे पौराणिक काल के ऐसे 3 किस्से जिसमें 3 ऐसे लोग हुए हैं जिनके शीश को काट देने के बाद पुन: जोड़ दिया गया। हालांकि ऐसा किस चिकित्सा के चलते संभव हुआ यह कहना असंभव है। हो सकता है कि भविष्य का विज्ञान भी ऐसा करने में सक्षम हो। वर्तमान का विज्ञान कटे हाथ या पैर तो जोड़ सकता है, लेकिन शीश नहीं।


दधिची का सिर : वैदिक काल में दो महान चिकित्सक 'नासत्य' और 'दस्त्र' थे। इन दोनों को अश्विनी कुमार कहा जाता था। इनकी गणना 33 देवताओं में की जाती है। ये मूल रूप से चिकित्सक थे। उल्लेखनीय है कि कुंती ने माद्री को जो गुप्त मंत्र दिया था उससे माद्री ने इन 2 अश्‍विनी कुमारों का ही आह्वान किया था। 5 पांडवों में नकुल और सहदेव इन दोनों के पुत्र हैं। इन्हें सूर्य का औरस पुत्र भी कहा जाता है। सूर्यदेव की दूसरी पत्नी संज्ञा इनकी माता थी। संज्ञा से सूर्य को नासत्य, दस्त्र और रैवत नामक पुत्रों की प्राप्ति हुई। नासत्य और दस्त्र अश्विनीकुमार के नाम से प्रसिद्ध हुए। एक अन्य कथा के अनुसार अश्विनी कुमार त्वष्टा की पुत्री प्रभा नाम की स्त्री से उत्पन्न सूर्य के 2 पुत्र हैं।

दोनों कुमारों ने राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या के पतिव्रत से प्रसन्न होकर महर्षि च्यवन का वृद्धावस्था में ही कायाकल्प कर उन्हें चिर-यौवन प्रदान किया था। महान चिकित्सक अश्विनी कुमार सभी तरह की चिकित्सा जानते थे लेकिन वे कटे हुए शीश को जोड़ने की विद्या मधु-विद्या को नहीं जानते थे। जब इन्द्र को पता चला कि दोनों कुमार ये विद्या सीखने का प्रयत्न कर रहे हैं तो उन्होंने घोषणा कर दी की कि जो कोई भी उन्हें यह विद्या सिखाएगा उसका सिर काट दिया जाएगा।

यह विद्या ऋषि दधीचि जानते थे इसीलिए दोनों कुमार उनके आश्रम पहुंचे। ऋषि दधीचि ने उन्हें यह विद्या सिखाई। ऋषि और दोनों कुमारों को पता था कि इन्द्र को जब यह पता चलेगा तो वह ऋषिवर का सिर काट देगा। ऐसे में दोनों ने ऋषि दधीचि का सिर काटकर उसे कहीं दूर सुरक्षित रख दिया और ऋषि के धड़ पर घोड़े का सिर जोड़ दिया। इन्द्र जब ऋषि दधीचि का सिर काटने आए तो उन्होंने देखा कि ऋषि के धड़ पर तो घोड़ा का सिर लगा है। उन्होंने वही सिर काट दिया और वहां से लौट गए। इन्द्र के जाने के बाद अश्‍विनी कुमारों ने ऋषि दधिची का सुरक्षित रखा सिर पुन: उनके धड़ से जोड़ दिया। इस तरह दोनों कुमारों की शिक्षा पूर्ण हुई। अश्‍विनी कुमार चिकित्सक के अलावा खगोल और भूगोल विज्ञान के भी ज्ञाता थे। वे सदा आसमान में विचरण करते रहते थे। कहते हैं कि बरमूडा ट्राइंगल का निर्माण भी इन दोनों अश्‍विनी कुमारों ने किया था।

दक्ष का सिर : दक्ष प्रजापति की पुत्री सती ने महादेव से विवाह किया था, जो कि उन्हें मंजूर नहीं था। एक बार दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन रखा जिसमें उन्होंने शिव और पार्वती को नहीं बुलाया। एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे। उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल की ओर जाते हुए दिखाई पड़े। सती ने उन विमानों को देखकर भगवान शिव से पूछा, 'प्रभो! ये सभी विमान किसके हैं और कहां जा रहे हैं?' भगवान शंकर ने उत्तर दिया कि 'आपके पिता ने बड़े यज्ञ का आयोजन किया है। समस्त देवता और देवांगनाएं इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं।'
यह सुनकर सती भी वहां चलने की जिद करने लगीं यह जानते हुए कि उनके पति और उन्हें यज्ञ में नहीं बुलाया गया है। लेकिन सती सोच रही थी कि मुझे मेरे पिता के यहां जाने के लिए किसी निमंत्रण की जरूरत नहीं और फिर वहां मेरी बहनें भी आई होंगी। मन ही मन सती विचारों से भर गईं। फिर वे अकेली ही वहां जाने का हठ करने लगीं। उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी। उनके साथ अपना एक गण भी साथ में भेज दिया और उस गण का नाम वीरभद्र था। सती वीरभद्र के साथ अपने पिता के घर गईं।
राजा दक्ष ने अपनी पुत्री सती को आता देख उसकी उपेक्षा की। घर में सती से किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया। दक्ष ने उन्हें देखकर कहा कि तुम क्या यहां मेरा अपमान कराने आई हों? अपनी बहनों को तो देखो कि वे किस प्रकार भांति-भांति के अलंकारों और सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित हैं। तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघंबर है। तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक है। वह तुम्हें बाघंबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता है? दक्ष के कथन से सती के हृदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा। वे सोचने लगीं कि उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीं किया। भगवान ठीक ही कह रहे थे कि बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए। पर अब क्या हो सकता है? अब तो आ ही गई हूं।

पिता के कटु और अपमानजनक शब्द सुनकर भी सती मौन रहीं। लेकिन जब यज्ञ में सभी देवताओं की आहुतियां दी गई, परंतु शिव के नाम की नहीं तब सती क्रोध में लाल हो गईं। वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं, पितृश्रेष्ठ! यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं किंतु कैलाशपति का भाग नहीं है। आपने उनका भाग क्यों नहीं रखा? दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया कि मैं तुम्हारे पति शिव को देवता नहीं समझता। वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला है। वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं है। उसे कौन भाग देगा?
सती के नेत्र लाल हो उठे। उनका मुखमंडल प्रलय के सूर्य की भांति तेजोदीप्त हो उठा। उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा, ओह! मैं इन शब्दों को कैसे सुन रही हूं? मुझे धिक्कार है। देवताओं, तुम्हें भी धिक्कार है! तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो, जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षणमात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं। वे मेरे स्वामी हैं। नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता है। जो नारी अपने पति के लिए अपमानजनक शब्दों को सुनती है, उसे नरक में जाना पड़ता है। पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो! मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया है। मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती। सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुंड में कूद पड़ीं। जलती हुई आहुतियों के साथ उनका शरीर भी जलने लगा।

यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया। देवता उठकर खड़े हो गए। वीरभद्र क्रोध से कांप उठे। वे उछ्ल-उछलकर यज्ञ का विध्वंस करने लगे। यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई। देवता और ॠषि-मुनि भाग खड़े हुए। वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक दिया। शिव ने सती का शव जलते हुए यज्ञ से निकाला और उसे लेकर वे चल दिए। जहां-जहां सती के शव के टुकड़े, वस्त्र, आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ निर्मित हो गए। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर तुष्ट होकर भगवान शंकर ने सद्योजात प्राणी के सिर से दक्ष को जीवन का वरदान दिया। बकरे का मस्तक ही तत्काल मिल सका, इसके बाद उनके धड़ पर यह सिर लगा दिया। तबसे 'अजमुख' हो गए।

श्री गणेशजी का सिर :
शिवपुराण के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल से बालक का पुतला बनाकर उसमें प्राण फूंक दिए। उस बच्‍चे को किसी को भी अंदर न आने देने का आदेश देते हुए वे स्नान करने चली गईं। कुछ देर बाद वहां भगवान शंकर आए और पार्वती के भवन में जाने लगे। बाल गणेश ने महादेव को अंदर जाने से रोक दिया। शिवजी के समझाने पर भी गणेश नहीं माने, तब क्रोधित शिव त्रिशूल से बालक का सिर धड़ से अलग कर भीतर चले गए। पार्वती को जब गणेश के वध के बारे में पता चला ते वे क्रोधित होकर विलाप करने लगीं और सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब पार्वती को प्रसन्न करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया।

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