श्राद्ध पक्ष : मरने के बाद आत्मा की गति और दुर्गति?

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|

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''न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥
यान्ति देवव्रता देवान् पितृन्यान्ति पितृव्रताः।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपिमाम्।।
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्‌ ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥''- गीता

भावार्थ : माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते।...भूत प्रेत, मूर्दा (खुला या दफनाया हुआ अर्थात् कब्र अथवा समाधि) को सकामभाव से पूजने वाले स्वयं मरने के बाद भूत-प्रेत ही बनते हैं।...परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।


मरने के बाद कौन पहुंचता है देवलोक

हिंदू धर्म ग्रंथों में आत्मा की अनंत यात्रा का विवरण कई तरह से मिलता है। वेद और ‍गीता के अलावा भागवत पुराण, महाभारत, गरूड़ पुराण, कठोपनिषद, विष्णु पुराण, अग्रिपुराण जैसे ग्रंथों में इन बातों का बहुत जानकारी परक विवरण मिलता है। ऐसे नहीं है किस सभी में अलग-अलग विवरण मिलता है। सभी की बातों में थोड़ी बहुत भिन्नता के बाद समानता ही है। असमानता का कारण उसके प्रस्तुति करण है।

हिंदू, जैन और बौद्ध धर्मग्रंथों के अनुसार मरने के बाद मृत आत्मा का अस्तित्व विद्यामान रहता है। उक्त सभी धर्म आत्मा को अजर और अमर मानते हैं। यह आत्मा कर्मों अनुसार अपनी अपनी गति को प्राप्त करती है और फिर पुन: मृत्युलोक में आकर दूसरा जन्म ग्रहण करती है। जन्म और मृत्यु का यह चक्र तब तक चलता रहता है जब तक की आत्मा मोक्ष प्राप्त नहीं कर लेती। मोक्ष प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को यम-नियम का पालन करते हुए धारणा-ध्यान द्वारा समाधि को प्राप्त करना होता है।

अगले पन्ने पर, मरने के बाद आत्मा की गतियों को जानिए...


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