वैसे तो कहने को है कबाड़खाना, लेकिन ऐसा कबाड़ कि वहाँ घंटों रहने को जी चाहे। पेप्पोर, रद्दी पेप्पोर की गुहार लगाते ढेरों कबाड़ी हैं, इस कबाड़खाने में, और कबाड़ भी इतना उम्दा कि क्या कहने।
इस कबाड़ के बीच कहीं ट्रेसी चैपमैनहैं, तो कहीं विन्सेंट वैन गॉग। कहीं फर्नांदो पैसोआ की कविताएँ हैं तो कहीं शुन्तारो तानिकावा की बूढ़ी स्त्री की डायरी। बहुत कमाल का संगीत है, कविताएँ हैं, संस्मरण हैं, अद्भुत रेखाचित्र और तस्वीरें हैं और कुछ वीडियो भी।
ब्लॉग-चर्चा में आज हम बात कर रहे हैं, अशोक पांडे और उनके साथियों के ब्लॉग कबाड़खाना के बारे में। लस्ट फॉर लाइफ और जैसे चॉकलेट के लिए पानी के शानदार अनुवाद का काम करने वाले अशोक पांडे लेखक, कवि और अनुवादक हैं। पाब्लो नेरुदा, यहूदा अमीखाई और फर्नांदो पैसोआ समेत विश्व के तमाम महत्वपूर्ण कवियों की कविताओं का अनुवाद उन्होंने किया है। अपनी तारीफ में अशोक कहते हैं कि वे पैदाइशी कबाड़ी हैं। उन्होंने अपने कुछ और कबाड़ी साथियों के साथ मिलकर कबाड़खाना की शुरुआत की, जहाँ उनकी अब तक की इकट्ठा की गई कबाड़ सामग्री से पाठकों के विचार और मन समृद्ध हो रहे हैं।
जुलाई, 2007 में कुछ दोस्तों के कहने पर अशोक ने ब्लॉग शुरू किया, लेकिन शुरू-शुरू में उसे लेकर बहुत गंभीर नहीं थे। सोचा तो था कि गप्पबाजी का अड्डा भर होगा ब्लॉग, लेकिन यह उससे भी बढ़कर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बनता जा रहा है, कला, साहित्य और संगीत का। कबाड़खाना एक सामूहिक ब्लॉग है, जिस पर प्रसिद्ध लेखक इरफान और कवि वीरेन डंगवाल समेत कई सारे लेखक और ब्लॉगर, जो कि मूलत: कबाड़ी हैं, अपना योगदान देते हैं।
ढेरों कबाड़ के बीच एकाएक पाब्लो नेरुदा की पद्यात्मक आत्मकथा की ये पंक्तियाँ हमसे मुखातिब होती हैं :
उनके बग़ैर जहाज़ लड़खड़ा रहे थे मीनारों ने कुछ नहीं किया अपना भय छिपाने को यात्री उलझा हुआ था अपने ही पैरों पर - उफ़ यह मानवता‚ खोती हुई अपनी दिशा !
मृत व्यक्ति चीखता है सारा कुछ यहीं छोड़ जाने पर‚ लालच की क्रूरता के लिए छोड़ जाने पर‚ जबकि हमारा नियंत्रण ढँका हुआ है एक गुस्से से ताकि हम वापस पा सकें तर्क का रास्ता।
आज फिर यहाँ हूँ मैं कॉमरेड‚ फल से भी अधिक मीठे एक स्वप्न के साथ जो बँधा हुआ है तुम से‚ तुम्हारे भाग्य से‚ तुम्हारी यंत्रणा से।
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