मानसून का भविष्य ज्येष्ठ मास में लगने वाली रोहिणी में पड़ने वाली गर्मी पर निर्भर करता है ऐसी हमारी प्राचीन मान्यता है। रोहिणी 25 मई से लगी थी इस नक्षत्र की बिदाई 7 जून को है। इसी नक्षत्र में नौ दिन तपने वाला नवतपा भी 2 जून को अपनी अवधि पूर्ण कर बगैर तीखे तेवर दिखाए समाप्त हो गया।
बदलते मौसम एवं ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम भी भुल-भुलैया की डगर पर जा रहा है। यह भी माना जाता है कि रोहिणी गलना नहीं चाहिए, यदि गल जाए तो उस वर्ष वर्षा का अभाव रहता है। परंतु पिछले सौ वर्ष के मौसम के रिकॉर्ड को देखें तो पता चलता है यह एक भ्रांति है, रोहणी गलने के वर्ष भी अच्छी बारिश हुई है।
इस वर्ष रोहिणी गली नहीं बल्कि बह निकली जो ज्योतिष शास्त्रों के अनुसार शुभ है और अच्छी वर्षा का सूचक है। रोहिणी का स्थान इस वर्ष समुद्र है, उस मान से इस वर्ष उत्तम वर्षा के आसार माने गए हैं। रोहिणी नक्षत्र 25 मई से लगा था ठीक एक दिन पूर्व यानी 24 मई को मंगल का मेष राशि में प्रवेश हुआ था और मंगल में बादलों का होना, बूंदाबाँदी एवं गर्मी अधिक आदि होती है।
8 जून से आषाढ़ लग रहा है जो 7 जुलाई तक रहेगा यह वर्षा ऋतु के प्रारंभ का समय है तथा सूर्य का पर्जन्य नक्षत्र आर्द्रा में प्रवेश 22 जून को होगा। इस मान से बारिश के अच्छे आसार हैं ऐसा प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित आनंदशंकर व्यास का मानना है। इस वर्ष सूर्य के तेवरों ने पारे की तेजी को थामे रखा और पारा 40.3 डिग्री से. से ज्यादा आगे नहीं जाने दिया। 1 जून को न्यूनतम तापमान भी 36.6 डिग्री से. तक पहुँच गया था। इस तरह नवतपा भी नो तपा रहा। पिछले डेढ़ दशक के रिकॉर्ड से पता चलता है कि रोहिणी एवं नवतपा का बारिश से कोई सामंजस्य नहीं है यह एक धारणा मात्र है।