हिंदी साहित्य के दिव्यमान नक्षत्र 'डॉ. प्रभाकर माचवे जन्मशती' समारोह

Last Updated: सोमवार, 18 दिसंबर 2017 (21:24 IST)
इंदौर। ने अपने नाम को सार्थक करते हुए हिंदी साहित्य जगत के दिव्यमान नक्षत्र 'डॉ. प्रभाकर माचवे जन्मशती' समारोह
पूर्ण गरिमा के साथ मनाया गया। इस मौके पर मराठी भाषी होने के बावजूद हिंदी के दिव्य नक्षत्र को पूरी शिद्दत के साथ याद किया और श्रोताओं ने भी पूरे समय अपने को माचवे प्रभाव में डूबा पाया। यह आयोजन मध्यप्रदेश मराठी अकादमी द्वारा किया गया था।

दीप प्रज्जवलन, मां शारदा व प्रभाकर माचवे जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के बाद कार्यक्रम की शुरुआत अशोक सोमानी द्वारा माचवे जी की कविता 'अग्निशिखा' के वाचन व नियती सप्रे व सुषमा अवधूत के द्वारा माचवे जी के प्रकाशित प्रसिद्ध संपादकीय वाचन से अच्छी शुरुआत हुई, जिससे ये समझ आया कि उनकी विश्व साहित्य की नब्ज पर कितनी विलक्षण पकड़ थी।

वेबदुनिया डॉट कॉम के संपादक ने स्वीकार किया कि माचवे जी का सानिध्य तो वे नहीं पा सके परन्तु अपने कॉलेज के दिनों में वे वाद-विवाद और निबंध प्रतियोगिता के दौरान उनके लिखे संपादकीय का गहन अध्ययन अवश्य करते थे।

कर्णिक ने कहा कि माचवे जी महात्मा गांधी के आश्रम के ऐसे विरले लाड़ले अनुयायी थे, जिनकी पत्नी के विवाह के अवसर पर स्वयं गांधी जी ने चरखे पर काती हुई साड़ी भेंट की थी। गांधी जी के हाथ से बुनी दूसरी साड़ी पाने ली सौभाग्यशाली श्रीमती इं‍दिरा गांधी थी। गांधी जी ने ही अपने आश्रम में माचवे जी का विवाह करवाया था।

उन्होंने आव्हान किया कि डॉ. प्रभाकर माचवे का प्रकाशित सा‍हित्य जहां कहीं भी किसी के पास उपलब्ध है तो वे उन्हें जरूर देंवे, जिससे वे वेबदुनिया के माध्यम से विश्व के कोने-कोने में बैठे साहित्य साधकों तक डॉ. प्रभाकर माचवे जी को पहुंचा सकें।

वरिष्ठ साहित्यकार शरद पगारे ने कहा माचवे जी और ख्यात साहित्यकार गजानंद माधव मुक्तिबोध ने उस समय के कई बड़े बड़े साहित्यकारों के बीच अपने साहित्य का लोहा मजबूत के साथ मनवाया और अपना विशिष्ट स्थान दर्ज किया।

डॉ. प्रभाकर माचवे पर शोध लिखने वाली उनकी अन्यन्य शिष्या व साहित्य की उद्‍भट लेखिका डॉ. संध्या भराडे ने अपने उद्बोधन में अपने गुरु, अपने काका को स्मरण करते हुए कहा 'उन्होंने सदैव मुझे सस्ती लोकप्रियता से बचते हुए साहित्य के उच्च मानदंडों के अनुसार अपने को ढालने की ओर प्रवर्त किया।

उन्होंने उद्‍घृत करते हुए कहा कि जिस तरह पंडित नेहरू जी के आग्रह पर साहित्य अकादमी में सचिव के रूप में कार्य करने को राजी हुए उसे रोपा, पल्लवित किया व कालांतर में उसकी नीतियों से असंतोष जताते हुए उससे बिलग भी हो गए।

माचवे जी की सादगी ऐसी कि पंडित जवाहर लाल नेहरू से मिलने सहज भाव से चले गए। घर आकर पत्नी को बताया कि मिल आए हैं नेहरू जी से! तब पत्नी ने विस्मित होते हुए पूछा सच में! तो वे बोले हां सचमुच, तब पत्नी ने सिर पीटते हुए बोली - 'हे भगवान कुर्ता तो उलटा ही पहन गए थे।'



कार्यक्रम में पत्रकार व 'समाज चिंतन' के संपादक अनिल कुमार धड़वईवाले ने भी शिरकत की और अकादमी के कार्यां की प्रशंसा की। अतिथियों स्वागत मध्यप्रदेश मराठी अकादमी के अध्यक्ष मधुकर निरखीवाले, उपाध्यक्ष अरविंद जवड़ेकर, कोषाध्यक्ष अनिल दामले, सहसचिव कीर्तिश धामारीकर, प्रधान सचिव मिलिंद देशपांडे ने किया। अतिथि परिचय अरविंद जवड़ेकरने दिया।

संस्था की संक्षिप्त जानकारी देते हए मधुकर निरखीवाले ने कहा 'व पत्र-लेखन' स्पर्धा का यह आठवां वर्ष है तथा इस वर्ष से मध्यप्रदेश के साथ बाहरी प्रदेश गुजरात के अमदाबाद में भी यह स्पर्धा आयोजित हुई। वैसे ही अटलांटा और लंदन में भी परीक्षा आयोजित हुई है, जो इसके दिनों-दिन विस्तार का द्योतक है।


वेबदुनिया के संपादक जयदीप कर्णिक ने कहा कि वे अब अभिनव वाचक और पत्र-लेखन स्पर्धा को वेबदुनिया के माध्यम से पूरी दुनिया के सुधि साहित्यकों को अवगत कराएंगे। कार्यक्रम का संचालन मिलिंद देशपांडे ने किया। आभार प्रदर्शन करते हुए कीर्तिश धामारीकर ने कहा ‍वे प्रभाकर माचवे के साहित्य को और अधिक प्रसारित करने का प्रयास करेंगे।


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