कान्हा में बारहसिंघों की संख्या 66 से बढ़कर 600 हुई

भोपाल| Last Updated: शनिवार, 21 मार्च 2015 (15:21 IST)
भोपाल। विश्व की सबसे ज्यादा संकट में आईं वन्यप्राणी प्रजातियों में से एक हार्डग्राउंड बारहसिंघा का सफल पुनर्स्थापन कर ने वैश्विक वन्य प्राणी संरक्षण जगत में सफलता की नई इबारत लिख दी है।
एक सरकारी विज्ञप्ति के अनुसार विशेषज्ञों, चिकित्सकों और तकनीशियनों की टीम के साथ कान्हा प्रबंधन ने पहली बार बिना ट्रेन्क्यूलाइजर की मदद के 7 जनवरी 2015 को वनविहार राष्ट्रीय उद्यान, को 7 बारहसिंघा और 4 एवं 15 मार्च 2015 को 8-8 हार्डग्राउंड बारहसिंघा सतपुड़ा टाइगर रिजर्व भेजे थे। ये वन्यप्राणी जो आज न केवल जीवित और सुरक्षित हैं, बल्कि नए वातावरण में रच-बस भी गए हैं।> > विश्व में कान्हा टाइगर रिजर्व ही एकमात्र स्थान है, जहां हार्डग्राउंड बारहसिंघा (सर्वस ड्यूवाउसेली ब्रेंडरी) बचे हैं। अन्यत्र भी इनकी आबादी बढ़ाने और कभी किसी महामारी के चलते इनके अस्तित्व पर कोई संकट न आए, इस उद्देश्य से मध्यप्रदेश वन विभाग ने यह शिफ्टिंग की है।
विश्व में बारहसिंघा की कुल 3 उपप्रजातियां भारत एवं नेपाल में पाई जाती हैं। भारत में ये कान्हा टाइगर रिजर्व, दुधवा एवं काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान एवं मनास राष्ट्रीय उद्यान तक सीमित हो गई हैं। बढ़ती कृषि भूमि और शिकारियों के कारण इनकी संख्या में तेजी से कमी हो गई थी।

वर्ष 1938 में कान्हा राष्ट्रीय उद्यान और आसपास लगभग 3,000 बारहसिंघा थे। इनके बाद इनकी संख्या में लगातार कमी आती गई। वर्ष 1953 के आकलन में 551 और 1970 में मात्र 66 बारहसिंघा टाइगर रिजर्व में बचे थे।

कान्हा प्रबंधन के अथक प्रयासों से आज यहां लगभग 600 बारहसिंघा हो गए हैं और अपेक्षाकृत रूप से सुरक्षित भी हैं। स्माल पॉपुलेशन बायोलॉजी के अनुसार छोटी जैव-संख्या पर अनेक प्रकार के प्रतिकूल जेनेटिक एवं पर्यावरणीय कारक कार्य करते रहते हैं अत: इनका लगातार प्रभावकारी प्रबंधन जरूरी है।

विज्ञप्ति के मुताबिक कान्हा प्रबंधन द्वारा बारहसिंघा संरक्षण के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इनमें एन्क्लोजर का निर्माण, आवास स्थलों का लगातार विकास कार्य, जल विकास, दलदली क्षेत्रों का निर्माण आदि शामिल हैं। (भाषा)

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