महालक्ष्मी व्रत कथा 2 : जब राजा ने गंधर्व को शूकर योनि से किया मुक्त...

Widgets Magazine
* श्री महालक्ष्‍मी व्रत : द्वितीय कथा... 
धन-धान्य, यश-कीर्ति देता है महालक्ष्मी व्रत, पढ़ें प्रामाणिक व्रतकथा... 


 
श्री गणेशाय नम:।
 
एक समय महाराज युधिष्ठिर श्रीकृष्ण भगवान से बोले- 'हे पुरुषोत्तम! नष्ट हुए अपने स्थान की पुन: प्राप्ति कराने वाले और पुत्र, आयु, ऐश्वर्य तथा मनोवांछित फल देने वाले किसी एक व्रत को मुझसे कहिए।

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा- सतयुग के प्रारंभ में जिस समय दैत्यराज वृत्रासुर ने देवताओं के स्वर्गलोक में प्रवेश किया था, उस समय इन्द्र ने यही प्रश्न नारद से किया था।

नारदजी ने कहा- 'हे इन्द्र! पूर्व समय में अत्यंत रमणीक पुरन्दपुर नामक नगर था। वह नगर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का उत्पत्ति स्थल होने के कारण संसार का भूषण रूप था। उस नगर में नाम का राजा राज्य करता था। उसकी दो रानियां थीं। एक का नाम चिल्लदेवी तथा दूसरी का नाम चोलदेवी था।

एक समय राजा मंगल रानी चोलदेवी के साथ महल के शिखर पर बैठा था। वहां से उसकी दृष्टि समुद्र के जल से घिरे हुए एक स्थान पर पड़ी। उसे देखकर अति प्रसन्न चित राजा ने हंसकर चोलदेवी से कहा- हे चंचलाक्षि! मैं तुम्हारे लिए नंदन वन को भी लजाने वाला एक बगीचा बनवा दूंगा।

राजा के वाक्य को सुनकर रानी ने कहा- 'हे कान्त! ऐसा ही करिए। तदनुसार राजा ने उस स्थान पर एक बगीचा बनवा दिया। थोड़े ही समय में वह बगीचा अनेक वृक्षों, लता, फूलों तथा पक्षियों से संपन्न हो गया। 
 
एक समय उस उद्यान में एक विकराल शरीर वाला मेघतुल्य आ गया। उसने वहां आकर अनेक वृक्षों को तोड़ डाला तथा उस उद्यान को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। कालतुल्य उस शूकर ने कई रखवालों को भी मार डाला। तब उद्यान के रक्षक भयभीत होकर राजा के पास गए और सब हाल कह सुनाया।

यह बात सुनकर राजा ने अपनी सेना को आज्ञा दी कि शीघ्र जाकर उस शूकर को मार डालो। तदंतर राजा भी एक मतवाले हाथी पर सवार होकर उद्यान की ओर चल पड़ा। सेना ने शूकर को चारों ओर से घेर लिया तब राजा ने उच्च घोष करके कहा- जिसके रास्ते से यह शूकराधम निकल जाएगा, उस सिपाही का सिर शत्रु की भांति काट डालूंगा। लेकिन वह शूकर उसी मार्ग से निकल गया, जिस मार्ग में राजा खड़ा तथा।

उस घोर वन में राजा एकाग्रचित होकर उस शूकर को ढूंढ रहा था। एकाएक शूकर से सामना हो गया। तब राजा ने बाण ने उसे घायल कर दिया। बाण के लगते ही शूकर अपने अधम शरीर को छोड़कर दिव्य गंधर्व स्वरूप को धारण कर विमान पर जा बैठा। 
 
गंधर्व बोला- हे महिपाल! आपका कल्याण हो। आपने मुझे शूकर योनि से छुड़ाया, सो बड़ी कृपा हो। अब मेरा हाल सुनिए। एक समय ब्रह्माजी देवताओं से घिरे बैठे थे और मैं उनको तरह-तरह के गुणों से युक्त गीत सुना रहा था। गाते-गाते में ताल-स्वर से भटक गया। इसी कारण ब्रह्माजी ने मुझ चित्ररथ गंधर्व को शाप दे दिया कि तू पृथ्‍वी पर जाकर शूकर होगा।

जिस समय राजाओं का राजा मंगल तुझे अपने हाथों से मारेगा, उस समय तू शूकर योनि से छूटकर फिर इस गंधर्व योनि को प्राप्त होगा। अतएव हे महिपति! मैं इस योनि में आया था। आज आपके हाथ से मरकर मैं शूकर योनि से छुटकारा पा गया।
 
 
वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।
Widgets Magazine