प्रवासी साहित्य : इश्क कभी भी लफ्जों का...


- अर्चना पंडा
 
नर्मी है एहसासों की, आवाज नहीं है
कभी भी लफ्जों का मोहताज नहीं है
 
प्रीज सजे सब रंगों में
मोनालीसा मुस्काए
प्रीत सजे जब पत्थर पर तो
खजुराहो कहलाए
बिना प्यार के ताजमहल भी ताज नहीं है
इश्क कभी भी लफ्जों का मोहताज नहीं है
 
खामोशी में हूक प्यार की
कितना शोर मचाए
गीत-गजल, मैं लिखूं डायरी
मेरी भर-भर जाए
क्या होगा अंजाम, पता आगाज नहीं है
इश्क कभी भी लफ्जों का मोहताज नहीं है
 
होंठ नहीं खुलते नैनों से
बातचीत हो जाए
डर है कुछ कह दूं तो शायद
प्यार कहीं खो जाए
वैसे बिन बोले भी हम में कोई राज नहीं है
इश्क कभी भी लफ्जों का मोहताज नहीं है।   
साभार- गर्भनाल > >  

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