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प्रवासी साहित्य : किस्से डोनाल्ड ट्रम्प के...

शुक्रवार,नवंबर 17, 2017
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दुनिया के तमाम देशों में बसे सभी हिन्दुस्तानी भाई-बहनों को दीपावली की अनेकानेक शुभकामनाएं। आने वाला नया वर्ष आप सबके ...
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कुछ तो खास उल्लास था उस दिन में, त्योहार का दिन, रस्मों को निभाने का दिन। आडंबर पीछे छोड़ हुआ नई रस्म का उद्घोष, बदलकर ...
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हम मालवी मालवा की खूबसूरत मिट्टी में रचे-बसे, वहां की खूबसूरत वादियों में बड़े हुए। बेहतर जलवायु, हर तरह के खाने का ...
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बात आज की नहीं न जाने कितने दशक पुरानी है, दुश्मन चीन की फितरत में तो भरी हुई बेईमानी है। कहते थे बरसों पहले तुम हैं ...
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लबों पर आ गए अल्फ़ाज़ दरिया की मौजें देखकर ख़याल थे विशाल समंदर की गहराइयों की तरह ऐसा लगा कि पहुंच गए हम अगले जनम तक और ...
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नियति की नाटकी प्रवृति !

शनिवार,जुलाई 8, 2017
नियति की नाटकी प्रवृति, निवृत्ति से ही तो आई है, प्रकृति वह ही बनाई है, प्रगति जग वही लाई है !
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छोड़ कर जगत के बंधन !

गुरुवार,जुलाई 6, 2017
छोड़ कर जगत के बंधन, परम गति ले के चल देंगे, एक दिन धरा से फुरके, महत आयाम छू लेंगे !
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खिले कंवल से, लदे ताल पर, मंडराता मधुकर, मधु का लोभी। गुंजित पुरवाई, बहती प्रति क्षण, चपल लहर, हंस, संग-संग हो ली।
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न उलझ जाऊं इस जहां के आडंबरों में, जब हो कभी मन की चंचलता, न कर बैठूं कोई अपराध जब मन की हो अधीरता। न जाऊं आड़े-टेढ़े ...
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उमड़-घुमड़कर बरसे, तृप्त हुई, हरी-भरी, शुष्क धरा। बागों में खिले कंवल-दल, कलियों ने ली मीठी अंगड़ाई। फैला बादल दल, गगन ...
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वह बरसाती रात शहर की, वह चौड़ी सड़कें गीली, बिजली की रोशनी बिखरती थी जिन पर सोनापीली। दूर सुनाई देती थी वह सरपट टापों ...
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एक अनजान राह पर चल पड़े मुसाफिर, चलना था, बस चलना ही था इस राह पर। आगे क्या होने वाला है, ये पता नहीं था, अपने सब हैं, ...
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क्या तुम्हें एहसास है अनगिनत उन आंसुओं का? क्या तुम्हें एहसास है सड़ते हुए नरकंकालों का? क्या तुम्हें आती नहीं आवाज, ...
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अगर आप योग दिवस के अवसर पर भी सिर्फ इसलिए योग नहीं कर रहे कि पता नहीं इससे कोई फायदा होगा या नहीं, तो अब आपकी शंका का ...
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मेरा भी एक घर था मेरे मन का बसेरा, मेरे अंदर का सागर मेरा उन्माद, जो हरकत लेता और बदले में देता वजहें, मैं हंस पड़ती ...
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सत रंग चूनर नव रंग पाग मधुर मिलन त्योहार गगन में। मेघ सजल बिजली में आग...सत रंग चूनर नव रंग पाग। पावस ऋतु नारी, नर ...
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वह कौन सा गीत गाऊं, कौन से शब्द दोहराऊं, जिसमें मैं अपने पापा का वर्णन सुनाऊं! मुझे ऐसा लगे हर सुबह का सूरज आप हैं, ...
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मैं अधजागा, अधसोया क्यों हूं? मैं अब भी भूखा-प्यासा क्यों हूं? क्या भारत मेरा देश नहीं है? क्या मैं भारत का लाल नहीं ...
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कुहासे से ढंक गया सूरज, आज दिन, ख्वाबों में गुजरेगा। तन्हाइयों में बातें होंगी, शाखें सुनेंगी, नगमे, गम के, गुलों के ...
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