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हिन्दी कविता : नारी जगत का आधार है...

मंगलवार,मार्च 5, 2019
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स्वच्छ नीला आकाश, चिलचिलाती धूप, देखता ही रह गया, शिशिर का यह रूप। मन मचला कि क्यूं ना, बाहर घूम आऊं, तापमान ऋण तीस, ...
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घास की सख्ती जाती सिमटती आई नमी अब वातावरण में नन्ही ओंस की बूंदें धूप में चांदनी-सी चमके-दमके।
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यह कैसी बसंत ऋतु दिल पर छाई, जब कोमल विचारों की बयार बहती आई। सपनों की पंखुड़ियों पर दस्तक दी निंदिया ने, नीले आकाश तले ...
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मैंने मंदिर देखा, मस्जिद देखी, चर्च देखा और देखा गुरुद्वारा, मैंने मेरे प्रभु से पूछा, समझा दो क्या है सारा माजरा। तू ...
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आना-जाना लगा हुआ है, यह है मुसाफिरखाना, थोड़ी देर यहां रुकना है, फिर है सबको जाना। गठरी रखकर सीधा कर लूं, थोड़ा अपना ...
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आई खिचारहाई कहीं देश के एक कोने में कहते लोग इसे खिचारहाई, कहीं कहते मकर संक्रांति तो कहीं पतंगबाजी के लिए होती इसमें ...
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रह गए हैं अब कुछ पल, इस साल के अंत के, होने वाली है नई सुबह, सपनों के संसार की।
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कुछ ही लोगों से सभी का नाता होता है नाता आदर्शों का, प्रेरणा का, सेवाभाव का, देशप्रेम के जज्बे का एक सार्वजनिक नाता, उन ...
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काले घिरे से बादलों को, हवा के तूफानों ने जुदा किया। जो बरसने को थे तैयार उन्हें, आंधी के थपेड़ों ने सुखा दिया।
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जिंदगी की रफ़्तार को कुछ आगे बढ़ाओ, खेलो खतरों से नया कुछ कर दिखाओ। जो बीत गया वह था ही बीतने के लिए, उसे भूल सारा ...
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चन्द्रमा के दर्शन पर, इफ्तार के आमंत्रण पर। तज़रीद के आवरण में, ज़ुहाद के वातावरण में।
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पुरुषोत्तम मास के देवता श्रीहरि विष्णु हैं। अत: जिन कार्यों के कोई देवता नहीं है तो उनका दान भगवान विष्‍णु को देवता ...
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एफिल टॉवर को निहारती नजरें। पर खुद में ही खोई हुई हाथों में पेन और डायरी, शायद कुछ लिखने के प्रयास में। पार्क में अकेली ...
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मुझे होने लगा है शब्दों से प्यार तुम करो या न करो मेरा ऐतबार। शब्दों की कलियां खिलने लगी हैं
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क्या कभी मैंने तुमसे कहा कितनी तन्हा हूं मैं माला जपी राम मिला फिर भी तन्हा हूं मैं।
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प्रवासी अपनी जड़ों से दूर बरगद की भांति फैलते हैं और उन जड़ों को सींचते हैं भारत के संस्कारों के पानी से।
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हम आजाद भारत के बाशिंदे हैं, अंग्रेजों को गए कई दशक बीत गए, पर अंग्रेजी अब भी जिंदा है...
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ले लिया नोट दे दिया वोट, पी ली दारू हो गए मस्त, चुन लिए महान पूजनीय नेता, शुरू हुई फिर पंचवर्षीय परियोजना।
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चल पड़े थे कई विचारों के मंथन संग, बह गए थे अनजान एक बहाव से हम। न आसमां दिख रहा, न जमीं दिख रही थी, न ही एहसास कोई, न ...
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