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कविता : ईद पर गले मिलते हिन्दी-उर्दू

शुक्रवार,जून 22, 2018
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पुरुषोत्तम मास के देवता श्रीहरि विष्णु हैं। अत: जिन कार्यों के कोई देवता नहीं है तो उनका दान भगवान विष्‍णु को देवता ...
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एफिल टॉवर को निहारती नजरें। पर खुद में ही खोई हुई हाथों में पेन और डायरी, शायद कुछ लिखने के प्रयास में। पार्क में अकेली ...
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मुझे होने लगा है शब्दों से प्यार तुम करो या न करो मेरा ऐतबार। शब्दों की कलियां खिलने लगी हैं
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क्या कभी मैंने तुमसे कहा कितनी तन्हा हूं मैं माला जपी राम मिला फिर भी तन्हा हूं मैं।
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प्रवासी अपनी जड़ों से दूर बरगद की भांति फैलते हैं और उन जड़ों को सींचते हैं भारत के संस्कारों के पानी से।
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हम आजाद भारत के बाशिंदे हैं, अंग्रेजों को गए कई दशक बीत गए, पर अंग्रेजी अब भी जिंदा है...
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ले लिया नोट दे दिया वोट, पी ली दारू हो गए मस्त, चुन लिए महान पूजनीय नेता, शुरू हुई फिर पंचवर्षीय परियोजना।
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चल पड़े थे कई विचारों के मंथन संग, बह गए थे अनजान एक बहाव से हम। न आसमां दिख रहा, न जमीं दिख रही थी, न ही एहसास कोई, न ...
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पढ़-पढ़ के खबरें ट्रम्प के, हम हो गए निकम्मे, 'ट्रम्प डॉसिए' के हम, पढ़ चुके हैं पन्ने-पन्ने। ट्रम्प स्कैंडल के सिवा, ...
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दुनिया के तमाम देशों में बसे सभी हिन्दुस्तानी भाई-बहनों को दीपावली की अनेकानेक शुभकामनाएं। आने वाला नया वर्ष आप सबके ...
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कुछ तो खास उल्लास था उस दिन में, त्योहार का दिन, रस्मों को निभाने का दिन। आडंबर पीछे छोड़ हुआ नई रस्म का उद्घोष, बदलकर ...
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हम मालवी मालवा की खूबसूरत मिट्टी में रचे-बसे, वहां की खूबसूरत वादियों में बड़े हुए। बेहतर जलवायु, हर तरह के खाने का ...
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बात आज की नहीं न जाने कितने दशक पुरानी है, दुश्मन चीन की फितरत में तो भरी हुई बेईमानी है। कहते थे बरसों पहले तुम हैं ...
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लबों पर आ गए अल्फ़ाज़ दरिया की मौजें देखकर ख़याल थे विशाल समंदर की गहराइयों की तरह ऐसा लगा कि पहुंच गए हम अगले जनम तक और ...
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नियति की नाटकी प्रवृति !

शनिवार,जुलाई 8, 2017
नियति की नाटकी प्रवृति, निवृत्ति से ही तो आई है, प्रकृति वह ही बनाई है, प्रगति जग वही लाई है !
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छोड़ कर जगत के बंधन !

गुरुवार,जुलाई 6, 2017
छोड़ कर जगत के बंधन, परम गति ले के चल देंगे, एक दिन धरा से फुरके, महत आयाम छू लेंगे !
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खिले कंवल से, लदे ताल पर, मंडराता मधुकर, मधु का लोभी। गुंजित पुरवाई, बहती प्रति क्षण, चपल लहर, हंस, संग-संग हो ली।
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न उलझ जाऊं इस जहां के आडंबरों में, जब हो कभी मन की चंचलता, न कर बैठूं कोई अपराध जब मन की हो अधीरता। न जाऊं आड़े-टेढ़े ...
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उमड़-घुमड़कर बरसे, तृप्त हुई, हरी-भरी, शुष्क धरा। बागों में खिले कंवल-दल, कलियों ने ली मीठी अंगड़ाई। फैला बादल दल, गगन ...
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