कविता : पुरवैया से बातें...


नील गगन तले निहार समंदर
मन की बांछें खिल-खिल गईं
दूर गगन में पंछी संग बन पांखी
मैं तो उड़ती चली गई।
उड़ती ऊंचे आकाश से देखूं
धरती को और मन ही मन ये
सोचते चली गई।

आजादी इतनी प्यारी क्यूं कहलाती
और मन को भाती क्यूं है
खुले आकाश के बीच खुली हवा में
ना कोई बंधन ना कोई क्रंदन

बयार बहती ठंडी-ठंडी-सी कानों में
कुछ कहती सी गई
देख ये है जहां मेरा यहां,
कभी ना मैं दूषित हुई

तेरी धरती ने तो मुझको भी करके काला
मेरा भी है रूप बदल डाला
मैं गर्म और बावली हुई
इधर है सुन्दरता और स्वच्छता जो है सदा से जीवन मेरा
कूड़े-करकट के ढेर लगे हैं
मानवता अब धरती से गई स्वार्थ से भर सब
संगी-साथी तेरे वहां नहीं है

अपना कोई देख जरा इस गगन पथ को मैं और
पंछी मिल गुनगुनाते हैं
हर कोई इस नभ से मेरी सुन्दरता से तेरी
पृथ्वी भी निहाल हुई

सुन-सुन बातें तेरी पुरवैया मैं तेरी
दीवानी हो गई।

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