नरेन्द्र मोदी : क्या कहती है आंखों की चमक

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वर्ष 2004 के मध्य में एक पीआर कंसलटैंट ने एक राष्ट्रीय दैनिक के गुजरात संवाददाता से पूछा कि क्या वह अपने काम के बाद रात में भी काम करने का उत्सुक है, इससे कुछ अतिरिक्त आय भी हो जाएगी।
 
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काम आधी रात के बाद का ‍था जिसके तहत गुजरात से संबंधित समाचारों की इंटरनेट पर निगरानी रखना था। ये खबरें अगले दिन के अखबारों में प्रकाशित होतीं। इस संवाददाता का काम था सभी समाचारों के प्रिंट आउट निकालकर रखना। > > जब संवाददाता ने पीआर कंसलटैंट से पूछा कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इस काम को पूरी रात जागने की बजाय सुबह कर लिया जाए तो उसको बताया गया कि ग्राहक इन प्रिंट आउट को साढ़े छह बजे अखबारों के आने से पहले चाहता था। कंसलटैंट ने कहा कि उनका ग्राहक चाहता है कि वह सारे समाचारों को साढे पांच बजे से पहले पढ़ ले। संवाददाता ने पूछा कि यह विचित्र आदमी कौन है जो कि इतनी जल्दी में रहता है। पीआर कंसलटैंट केवल मुस्करा कर रह गया।
क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह ग्राहक कौन था? यह व्यक्ति थे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जो कि सुबह पांच बजे उठते ही सभी समाचारों की क्लिपिंग्स को देखते और इसके बाद ही उनका दिन योग और तेज चाल से शुरू होता। उसके बाद वे फिर एक बार अखबारों को देखते। इसके बाद उनका हल्का नाश्ता होता। नाश्ते में या तो सादा दक्षिण भारतीय डोसा होता या कोई गुजराती आहार। नरेन्द्र मोदी की यह दिनचर्या आज भी वैसी है जैसी कि पहले थी। चाहे चुनाव का समय हो या नहीं हो।  उनका वॉर रूम एक एजेंसी के टिकर की भांति उन्हें दिनभर की ब्रेकिंग न्यूज से अवगत कराता रहता है।

भले ही वे एक चुनाव रैली को संबोधित कर रहे हों, उनके पास सारी जानकारी एक छोटे से नोट्‍स के आकार में उनके पास लगातार आती रहती है। यह जानकारी ऐसी होती है जिसे वे सेकंडों में देख लेते हैं और इस जानकारी को अपने भाषणों में भी शामिल कर लेते हैं जो कि उनके दिमाग मे दोहराई जाती है।

मोदी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे बिना थके अपना काम लगातार करते रह सकते हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान 63 वर्ष की उम्र में भी उन्होंने एक माह में करीब 150 रैलियां की। 

क्या कहती है नरेन्द्र मोदी की आंखों की चमक... पढ़ें अगले पेज पर...

 


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