लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ कराने का सुझाव उचित

पुनः संशोधित शनिवार, 14 अक्टूबर 2017 (01:07 IST)
नई दिल्ली। लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सुझाव का समर्थन करते हुए ने कहा कि दोनों चुनाव साथ साथ कराने से सरकारी खजाने पर अनावश्यक दबाव और प्रशासनिक बोझ को कम किया जा सकेगा तथा इससे बचाए धन का उपयोग सुशासन और जन कल्याण की योजनाओं के पोषण में हो सकेगा ।
थम्बीदुरई ने ‘लोकसभा एवं राज्य साथ कराने का उपयुक्त समय’ शीर्षक से अपने लेख में कहा, ‘लगातार चुनाव कराने से सरकारी खजाने पर अनावश्यक दबाव पड़ता है तथा सरकार एवं चुनाव आयोग पर प्रशासनिक बोझ पड़ता है। भारत एक विकासशील देश है जहां व्यापक सामाजिक एवं आर्थिक असमानता है और बार बार होने वाले चुनाव में खर्च होने से बचाए गए धन का उपयोग इस असमानता को दूर करने में किया जा सकता है।’

उन्होंने कहा कि बार बार चुनाव कराने में होने वाले वृहद खर्च, सरकार और चुनाव आयोग दोनों पर पड़ने वाले प्रशासनिक बोझ तथा सुशासन के अभाव में जो समस्याएं हमारे सामने पेश आ रही हैं, उससे उचित ढंग से निपटा जा सकता है, बशर्ते हम उस पुरानी चुनाव प्रणाली की ओर लौटें जिसका अनुसरण 1952, 1957, 1962 और 1967 में किया गया था...जब लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ कराए गए थे।

अन्नाद्रमुक सांसद ने कहा कि चुनाव में लोगों की बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी देश की लोकतांत्रिक परंपराओं के प्रति भारतीयों की गहरी आस्था को प्रदर्शित करती है। देश में लगातार चुनाव पर बड़े पैमान पर होने वाले खर्च और इसके कुप्रभावों से लोगों को बोझिल करने की बजाए हमें लोगों की इस शुभेच्छा को सुशासन और जन कल्याण की योजनाओं के जरिए पोषित करना चाहिए।
उन्होंने लिखा कि चुनाव प्रचार के दौरान सामान्य नागरिकों का जीवन प्रभावित होता है। सभाओं में काफी संख्या में लोग जाते हैं जिसमें से खासतौर पर असंगठित क्षेत्र के लोग होते हैं और इसके कारण उनका कामकाज प्रभावित होता है। दूसरे शब्दों में कहें, तो अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है।

थम्बीदुरई ने कहा कि अकसर चुनाव होने से विकास और आर्थिक वृद्धि प्रभावित होती है। ऐसे में लगातार होने वाले चुनाव को कम करने के रास्ते तलाशने की जरूरत है ताकि लोगों और सरकारी तंत्र को राहत मिल सके।
लोकसभा उपाध्यक्ष ने अपने लेख में कहा कि विधि आयोग ने चुनाव कानून सुधार पर 1999 में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि विधानसभाओं के अलग अलग चुनाव कराया जाना ‘अपवाद’ होना चाहिए और इसे नियम नहीं बनाया जाना चाहिए।

थम्बीदुरई ने कहा कि 2009 में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराने का सुझाव दिया था। संसद की स्थायी समिति ने भी इस विषय पर विचार किया था। 30 जनवरी 2017 को संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने एक साथ चुनाव करने के विषय को रखा था।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी कई अवसरों पर इस मुद्दे को उठा चुके हैं। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 83 (2) में लोकसभा के लिए पांच वर्ष की अवधि तय की गई है जब तक कि सदन को भंग नहीं किया जाता है। इसी प्रकार से अनुच्छेद 172 (1) में राज्य विधान सभाओं के लिए पहली बैठक से पांच वर्ष की अवधि निर्धारित की गई है।

लोकसभा उपाध्यक्ष ने कहा कि लेकिन लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का चुनाव साथ कराने के लिए कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। विडंबना यह है कि लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनाव साथ नहीं कराने से हर वर्ष किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। चुनाव आयोग साल भर चुनाव कार्य सम्पन्न कराने में व्यस्त रहता है।
थम्बीदुरई ने सुझाव दिया कि एकसाथ चुनाव कराने का पक्षधर होने के कारण मेरा सुझाव है कि भारत में चुनाव मध्य फरवरी या मध्य मार्च के बीच कराया जाना चाहिए। इस अवधि में अधिक गर्मी या बारिश नहीं रहती है और न ही काफी ठंड रहती है। हमें अमेरिका की तर्ज पर चुनाव का कैलेंडर तैयार करना चाहिए।

उन्होंने देश में लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के संबंध में पेश आनी वाली समस्याओं से निपटने के लिए भी कुछ सुझाव दिए। (भाषा)

Widgets Magazine
वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।



और भी पढ़ें :