लांच हुआ सबसे सस्ता और छोटा वेंटिलेटर

Last Updated: बुधवार, 13 सितम्बर 2017 (18:50 IST)
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से राहतभरी खबर सामने आई है। एम्स में मंगलवार को सबसे सस्ता और छोटा पोर्टेबल लांच हुआ है। यह वेंटिलेटर एक युवा वैज्ञानिक ने स्वदेशी तकनीक से तैयार किया है। ए सेट रोबॉटिक्स के हेड और युवा वैज्ञानिक दिवाकर वैश्य ने स्वदेशी तैयार किया है। इसकी कीमत सिर्फ 15,000 से 20,000 रुपए होगी। 
 

मोबाइल एप से चलने वाले इस वेंटिलेटर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे जेब में रखा जा सकता है। ऑक्सीजन सिलेंडर के बिना काम करने वाला यह दुनिया का पहला वेंटिलेटर है। एम्स में चल रहे किफायती मेडिकल तकनीक सम्मेलन के दूसरे दिन इसे प्रदर्शित किया गया। इसके पेटेंट के लिए भी आवेदन कर दिया गया है। 
 
लॉन्चिंग के मौके पर इसे बनाने वाले दिवाकर ने कहा कि सामान्य वेंटिलेटर व्यक्ति की हाइट के बराबर होता है।   कई उपकरण होते हैं। उसे ट्रेंड डॉक्टर ही चला पाते हैं। पोर्टेबल वेंटिलेटर अपने मॉडल के कारण आम आदमी के लिए सरल है। इसे चलाना भी आसान है। मरीज पोर्टेबल वेंटिलेटर को घर में भी इस्तेमाल कर सकता है। दिवाकर ने बताया कि वेंटिलेटर के जरिए संकट के समय मैसेज भी भेजा जा सकता है। 
 
ये चीजें बना चुके हैं दिवाकर :  दिवाकर इससे पहले माइंड कंट्रोल करने वाली वील चेयर, थ्रीडी प्रिंटेड रोबोट और डांसिंग रोबोट बना चुके हैं। इसमें ऑन-बोर्ड लाइट लगी है जो संभावित समस्या की जानकारी देती है। यह जानकारी वेंटिलेटर निर्माताओं को भी दी जा सकती है। करीबियों को चेतावनी देने के लिए इसमें कई तरह की टोन लगाई गई हैं। इसके बोर्ड पर दो कंप्यूटर हैं। एक खराब हो जाए तो दूसरा काम करने लगता है।  
 
ऐसे करेगा काम : जिन मरीजों को सांस लेने में दिक्कत होती है, उनके गले में एक स्थायी ट्यूब डाली जाती है। इसी ट्यूब को पोर्टेबल वेंटिलेटर से जोड़ दिया जाता है। यह बिजली से चलता है। वेंटिलेटर में लगे प्रेशर सेंसर से मरीज जरूरत के अनुसार सांस लेता और छोड़ता है। 
 
ये होंगी खूबियां : छोटा और सस्ता होने के कारण इसका प्रयोग करना आसान होगा। कम कीमत की वजह से यह आम आदमी के लिए मुफीद। यह बिना ऑक्सीजन सिलिंडर के चलेगा और इसके लिए ट्रेनिंग की आवश्यकता नहीं होगी। इस वेंटिलेटर के लांच होने से कई साल से वेंटिलेटर पर जीवन गुजार रहे मरीजों को अस्पताल से छुट्टी मिल सकती है। उन लोगों की जान बचाने में भी आसानी होगी जिन्हें समय रहते कृत्रिम सांस नहीं मिल पाती। सस्ता होने के कारण छोटे अस्पताल भी इसका प्रयोग ग्रामीण इलाकों को सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा। 
(प्रतीकात्मक चित्र)
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