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विकास के अंतहीन दावे और स्याह अंधेरा


-श्रृष्टि जैन और मृदुला केंटुरा

हम दिल्ली से हैं। दिन-रात विकास की चर्चा सुनते हैं और विकास के नाम पर बने और मेट्रो में घूमते हुए अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं। पढ़-लिखकर जो समझ बनती है वह अपनी जगह है। लेकिन दावों और वादों की हकीकत जानना है, समाज को समझना है तो हमें निकलना तो होगा ही। यह सोचकर नेशनल फाउंडेशन ऑफ इंडिया से इंटर्नशिप की ओर निकल पड़े मध्यप्रदेश।
भोपाल में चारों ओर सरकारी नारों से पटी चमचमाती सड़कें दिल्ली-सा ही अहसास देती हैं। कोई खास फर्क नहीं, न दावों में, न वादों में। यदि इन सड़कों पर घूमते हुए होर्डिंग से विकास को समझें तो साल के 12 महीने आपको सावन ही नजर आएगा। पर राजधानी के आसपास ही जरा नजर डालें तो हमें लगभग दूसरी दुनिया के दर्शन हो जाएंगे। कई बार लगता है कि हम किसी और देश में हैं। ठीक वैसा ही जैसा कि अदम कहते हैं न 'तुम्हारी फाइलों में शहर का मौसम गुलाबी है।'
हम भी इस विकास को समझने पहुंचे मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे सीहोर जिले के बिलकिसगंज विकासखंड के गांव नारकोला में। पंचायत है खामखेड़ा। केवल जानकारी के लिए बता दें कि खामखेड़ा गांव भारत सरकार की विदेश मंत्री और यहां की सांसद सुषमा स्वराज का गोद लिया हुआ गांव है। यह भी एक अबूझ-सी पहेली है कि एक गांव गोद लो और बाकियों को उनके हाल पर छोड़ दो। बहरहाल, इस पर बाद में बात करेंगे, फिलहाल नारकोला। यहां बारेला और कोरकू आदिवासियों के लगभग 70 घर। नारकोला तक कोई उचित पहुंच मार्ग नहीं है। जो है, उसे बरसात के समय तिन्सिल्ला नदी बंद कर देती है।
नारकोला (भूरीघाटी) में 6-14 वर्ष की उम्र के लगभग 60 बच्चे हैं, पर यहां कोई स्कूल नहीं है। 40 से ज्यादा बच्चे आंगनवाड़ी जाने वाली उम्र के हैं, पर जाते नहीं हैं, क्योंकि आंगनवाड़ी भी नहीं है। मन में सहज ही जिज्ञासा आई तो पूछ बैठे कि फिर बच्चों को जीवनरक्षक टीके कैसे लगे? पास ही बैठी सीताबाई सहज भाव में कह देती हैं, नहीं लगे। हमने कहा, नहीं लगे मतलब?, तो उन्होंने सहज भाव कायम रखा और कहा कि नहीं लगे। हम गुणा, भाग और सारे समीकरण लगाते हुए भी यह समझ नहीं पाए कि फिर इन बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली कैसे विकसित हुई होगी?
हमारी तंद्रा तोड़ते हुए जोहर कोरकू बीच में बोलते हैं कि कभी-कभार जब ओनम (यानी एएनएम) बहनजी आ जाती हैं, तो लगा जाती हैं। कब से नहीं आई? तो सब एक-दूसरे से पूछने लगते हैं। लेकिन अंत तक कोई भी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा। जोहर हमसे बात करते हुए बीच-बीच में अपना घर सुधारने लगते हैं। वे बारिश की तैयारी कर रहे हैं। धीरे-धीरे कई लोग जुट गए हैं। अर्जुन से पूछा कि कहां तक पढ़े हैं, कुछ नहीं। सीता, कुछ नहीं। जोहर, कुछ नहीं।
लब्बोलुआब यह कि पिछली पीढ़ी में से कोई भी नहीं पढ़ा और न अभी कोई पढ़ता है, क्योंकि स्कूल ही नहीं है। संविधान में कहा गया है कि इसके लागू होने के 10 वर्ष के भीतर सभी को प्राथमिक स्तर तक की शिक्षा उपलब्ध करा दी जाएगी। इसके बाद शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 (आरटीई) भी आ गया, पर नारकोला में तो कोई भी पीढ़ी अभी तक नहीं पढ़ी है। बातों-बातों में पता चला कि इस गांव के नाम का स्कूल ऊपर बनाया जा रहा है। आरटीई के अनुसार सरकारी कागजों में 1 किलोमीटर के अंदर प्राथमिक स्कूल तो बन रहा है, लेकिन तिन्सिल्ला नदी का जिक्र कहीं नहीं है जिसके चलते बच्चे चाहकर भी स्कूल जा नहीं पाएंगे।
गांव तिन्सिल्ला नदी के चलते टीलों पर बसा है, तो हमने सोचा कि थोड़ा ऊपर चढ़कर देखते हैं। अचानक हमारे एक और साथी ने हमारा ध्यान आकर्षित कराया कि इस गांव में कहीं भी बिजली का खंभा नहीं दिख रहा है। खूब खोजा लेकिन नहीं दिखा। पर मन यह मानने को तैयार ही नहीं था, क्योंकि कुछ दिनों पहले ही तो प्रधानमंत्री मोदी ने 'मन की बात' में कहा था कि अब देश के हर गांव में बिजली पहुंच गई है। हम फिर जोहर के घर की तरफ भागे और पूछा तो पता चला कि साहब बात तो चल रही है बिजली आने की, पर अभी तक आई नहीं है। ये बात कब से चल रही है? तो 55 साल के जोहर कहते हैं कि हम लोग आप जैसे रहे होंगे, तब से। हमें बहुत जोर से दिल्ली की याद आई।
अब तक विकास की इबारतों से पटे पड़े होर्डिंगों की हकीकत हमारे सामने आने लगी थी। हमने पूछा कि यहां पर मनरेगा के अंतर्गत आपको काम तो मिलता ही होगा? मनरेगा, इस नाम पर एक राय नहीं बनी। बाद में समझाने पर 'गिरंटी' (गारंटी) बताया गया। पता चला कि शुरू में तो काम चला था लेकिन पिछले 3 सालों में कोई काम नहीं हुआ। वैसे भी मध्यप्रदेश में गत वर्ष केवल 1 फीसदी लोगों को ही 100 दिन का रोजगार मिला है। आप लोग काम मांगते क्यों नहीं है? इस सवाल पर तो सभी हमारी ओर ही निरीह भाव से देखने लगते हैं, जैसे कह रहे हों कि कितनी बार तो मांगा, पर कोई देता ही नहीं।
हमने बेरोजगारी भत्ते और मुआवजे आदि की बात भी कह डाली, पर वे कुछ नहीं जानते हैं। जोहर, अर्जुन बताते हैं कि हम सभी परिवार सहित काम करने जाते हैं। सोयाबीन और गेहूं की कटाई के समय। दीगर काम के लिए आसपास। सवाल दिमाग में चल रहे थे कि जब टीके लगाने कोई नहीं आता, तो फिर गर्भवती महिलाओं की अनिवार्य 3 जांचें कैसे होती होंगी? पता चला कि पारंपरिक तरीके ही काम आते हैं। अधिकांश प्रसव घर में ही होते हैं। गांव में अधिकांश जनों का जन्म प्रमाण पत्र ही नहीं बना है।
गांव में राशन दुकान भी नहीं है। राशन लेने तो ऊपर बावडिया चौर जाना होता है। इस गांव में कभी कोई ग्रामसभा हुई? नहीं, वो तो पंचायत में होती है। इस गांव में किसी को पेंशन मिलती है? नहीं, यानी इस गांव में समस्त मूलभूत सरकारी सुविधाओं के आगे 'न' लगा है। इस गांव में केवल 1-2 को ही प्रधानमंत्री आवास मिला हुआ है। इस गांव में कोरकू और बारेला आदिवासी हैं और जिन्हें विकास के सबसे ज्यादा अवसरों की जरूरत है, पर वे उन्हें मिलते नहीं हैं। गांव में किसी के यहां भी कोई अखबार नहीं आता है और बाहरी दुनिया से इनकी पहुंच रेडियो से ही होती है, शायद इसलिए भी वे सरकारी वादों की हकीकत नहीं जानते हैं।
विकास के तमाम दावे इस गांव में आकर खोखले लगने लगते हैं। बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य के तमाम सूचकांक यहां आकर दम तोड़ देते हैं। ये अपने प्रयासों से ही जी रहे हैं और इनकी जीवटता ही इन्हें बचाए हुए हैं। हम वापस दिल्ली जा रहे हैं, हमें विकास को करीब से जानने का मौका मिला। हम यह मानते हैं कि भारत के सभी 6 लाख गांव एक से नहीं होंगे, हो भी नहीं सकते।

पर यह भी निर्विवाद सच है कि मौलिक अधिकार सभी को मिलना ही चाहिए, फिर चाहे वे गांवों में बसे हों या शहरों में। इस चुनावी साल में अब हम जब भी जुमले/ नारे सुनेंगे तो हमें एक बार जरूर नारकोला की याद आएगी। हम दिल्ली की रोशनी से नहाई सड़कों पर चल रहे होंगे तब भी हमारे सामने से नारकोला का स्याह चेहरा जरूर होगा। हमें तो खूब 'मन' की 'दिल' की बात सुनाई जा रही है, पर इन आदिजनों के मन/दिल बात कोई सुन ले और उसे समझ जाए तब ही सही मायनों में विकास होगा। (सप्रेस)
(दिल्ली में अध्ययनरत सुश्री श्रृष्टि जैन और मृदुला केंटुरा नेशनल फाउंडेशन ऑफ इंडिया से इंटर्नशिप के लिए एक माह भोपाल में रहकर समाज को जानने-समझने के कार्य में जुटी हैं।)

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