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Written By शरद सिंगी

अमेरिकी दृढ़ आर्थिक नीति के सामने बिखरते राष्ट्र

अमेरिकी दृढ़ आर्थिक नीति के सामने बिखरते राष्ट्र - US strong economic policy
तीन सप्ताह पहले 4 अगस्त के अंक में इस लेखक ने अपने लेख में चीन और अमेरिका के बीच आरंभ हुए आर्थिक युद्ध की वर्तमान स्थिति और परिणामों के बारे में पाठकों को अवगत कराया था। पूर्वानुमान किया था कि इस युद्ध से अनेक देशों की मुद्राएं ध्वस्त हो सकती हैं। ईरान की तो ध्वस्त हो ही चुकी है और अब पिछले 2 सप्ताहों में तुर्की की भी ध्वस्त हो चुकी है। वेनेजुएला की कतार में है।
 
तुर्की, नाटो के सहयोगी देशों में से एक होने के बावजूद कुछ वर्षों से अमेरिकी हितों को चुनौती दे रहा था और उसकी चेतावनियों को अनदेखा कर रहा था जिसको लेकर अमेरिका नाराज तो था ही, ऊपर से अमेरिका के एक पादरी को तुर्की द्वारा घर में नजरबंद करने के पश्चात स्थिति बिगड़ गई। तुर्की का आरोप है कि 2 वर्षों पूर्व हुए राष्ट्रपति एर्डोगन के तख्तापलट के असफल प्रयास की साजिश में ये पादरी भी शामिल था।
 
अमेरिका ने इस आरोप को खारिज करते हुए तुर्की से आयात होने वाले स्टील और एल्युमीनियम पर आयात शुल्क लगा दिया जिससे तुर्की की मुद्रा लीरा धड़ाम से नीचे गिर पड़ी। डॉलर के मुकाबले लीरा 1 ही दिन में 20 प्रतिशत गिर गई और इस वर्ष के आरंभ से लगभग 50 प्रतिशत तक नीचे गिर चुकी है। 
 
राष्ट्रपति ट्रंप अपने पादरी को हर सूरत में तुर्की से छुड़ाना चाहते हैं, क्योंकि उन पर अमेरिकी जनता का भारी दबाव है। ट्रंप ने बताया कि राष्ट्रपति एर्डोगन के कहने पर उन्होंने तुर्की की एक महिला नागरिक को इसराइल की कैद से छुड़वाया था और एर्डोगन से उम्मीद थी कि वे भी उसके एवज में जेल में बंद अमेरिकी नागरिकों को छोड़ेंगे किंतु ऐसा नहीं हुआ। अत: उन्होंने तुर्की को चेतावनी देते हुए कहा कि अब अमेरिका से भलाई करने की एकतरफा उम्मीद नहीं रखी जा सकती। पादरी को छोड़ने के लिए तुर्की ने अपनी एक बैंक पर लगे अरबों डॉलर के दंड को माफ करने की मांग की जिसे ट्रंप ने एक सिरे से खारिज कर दिया है।
 
तुर्की की वर्तमान स्थिति के बारे में पाठकों को अवगत करा दें कि तुर्की के राष्ट्रपति एर्डोगन सारे अधिकार अपने पास केंद्रित करके वे लगभग तानाशाह बन चुके हैं। एक प्रजातांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील राष्ट्र को वे इस्लामिक अतिवाद में धकेल चुके हैं। अमेरिका के चाहने के बाद भी तुर्की, ईरान के विरुद्ध खुलकर सामने नहीं आ रहा है और दूसरी तरफ खाड़ी के देशों विशेषकर सऊदी अरब के साथ संबधों में खटास बना रखी है।
 
आईएसआईएस में भर्ती होने के लिए जाने वाले युवक तुर्की के रास्ते ही जाते थे और इस आतंकी संगठन को हथियारों की आपूर्ति भी तुर्की के माध्यम से ही होती थी। यद्यपि तुर्की का सरकारी पक्ष इन आरोपों का खंडन करता रहा है। दूसरी तरफ यह जानना भी महत्वपूर्ण होगा कि तुर्की की सेना नाटो सदस्यों की सेना का प्रमुख अंग है और वह बहुत शक्तिशाली समझी जाती है। इसके बावजूद पश्चिमी देश तुर्की के साथ सहयोग करने के मूड में नहीं है। 
 
मूडी जैसी वित्तीय रेटिंग एजेंसियों ने तुर्की की आर्थिक स्थिरता के मूल्यांकन को निचले स्तर पर कर दिया है। उनके अनुसार तुर्की को दिए गए ऋण डूबत खाते की ओर जाते दिख रहे हैं। विशेषज्ञों ने 1 वर्ष के भीतर तुर्की में मंदी आने की भविष्यवाणी कर दी है। लीरा के इस तरह गिर जाने से वैश्विक शेयर बाजार भी सैकड़ों अंकों से निपट गए और कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शेयरों की बिकवाली शुरू हो चुकी है। 1 साल पहले 1 डॉलर से लगभग 3.5 लीरा खरीदा जाता था, वही लीरा अब यह 6 से अधिक देना पड़ता है 1 डॉलर को खरीदने के लिए।
 
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि आज की व्यापारिक दुनिया में विश्व की सारी मुद्राएं आपस में जुड़ी हुई हैं अत: चीन, भारत समेत यूरोप की मुद्राओं को थोड़ा झटका लगा। रुपया और चीनी मुद्रा 'युवान' दोनों लड़खड़ाकर संभलने की कोशिश कर रहे हैं किंतु भारत और चीन के विदेशी मुद्रा भंडार ने अभी तक उनके बाजारों को स्थिर कर रखा है। आज स्थिति यह है कि अमेरिका जिस देश के ऊपर सख्त कार्रवाई करता है, तुरंत ही उसे चीन और रूस का साथ मिल जाता है।
 
भारत ने तुर्की के साथ कई बार अच्छे संबंध बनाने की कोशिश की किंतु तुर्की, पाकिस्तान के अधिक करीब है। भारत के परमाणु आपूर्ति ग्रुप (एनएसजी) में शामिल होने के लिए रोड़ा अटकाने वाले इने-गिने देशों में से तुर्की एक है इसलिए इस लड़ाई में भारत शायद ही तुर्की से कोई सहानुभूति रखेगा।
 
तुर्की अभी तो अपना साहसी चेहरा सामने रखे हुए है और अमेरिका को जतलाना चाहता है कि उसके इन कदमों से तुर्की का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। किंतु यदि यह जोरा-जोरी लंबी चली तो तुर्की का संभलना मुश्किल होगा और विश्व की वर्तमान अस्थिर अर्थव्यवस्था में ये तनातनी एक और परेशानी का सबब बनेगा।
 
उक्त आलेख से निष्कर्ष निकालते हुए यह विचार आता है कि महाबली अमेरिका के सामने भारत ने अपनी विदेशी आर्थिक नीति में जो भी कदम उठाए हैं, वे सुरक्षित और समयानुकूल लगते हैं। पाकिस्तान जैसे दिवालिये देश जो चीन की गोद में बैठकर अमेरिका से पंगा मोल लेने की कोशिश करते हैं, उनके लिए भविष्य अधिक सुखद नहीं होगा, क्योंकि ईरान और तुर्की जैसे देश भी अमेरिका के सामने मुंह की खाए पड़े हैं।