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टॉयलेट एक प्रेम कथा जख्म ना हरे कर दे...

सिद्धार्थ झा| पुनः संशोधित शनिवार, 12 अगस्त 2017 (18:21 IST)

टॉयलेट एक प्रेमकथा अभी सुर्खियों में है, ऐसे में मैं भी अपना अनुभव साझा करना चाहूंगा। बात 1988 की है। शायद हम लोग दिल्ली में रहते थे। दादा-दादी इलाहाबाद में और हम लोगों का एक पुश्तैनी दो कमरों का मकान दरभंगा सकरी में था, जिसके बारे में इससे पहले मैंने कभी देखा सुना नहीं था। बुआ अक्सर ज़िक्र छेड़ती थी कि किसी ज़माने में वो उस गांव में अकेला पक्का मकान था, जो स्टेशन से दिखता था। दादा-दादी के साथ अचानक ही गांव जाने का मौका मिला। मेरी उम्र 8-9 बरस की रही होगी। गांव गया तो नज़ारा अभिभूत करने वाला था। खेत,  तालाब, मंदिर, बरगद और घर के ठीक सामने आधे किलोमीटर पर एक 30-40 फीट का वनस्पति से भरा बांध। संभवत: तालाब खोदने के क्रम में कभी मिट्टी निकली होगी और तालाब के चारों तरफ बांध की शक्ल में निकली होगी। 
 
घर में बड़े दो कमरे, बरामदे, आंगनबाड़ी सब था। नहीं था तो बस, मल-मूत्र विसर्जित करने का प्रबंध। उस समय गांव के ज्यादातर मकानों में गुसलखाने नहीं थे। जब मोशन कंट्रोल से बाहर हुआ तो दादाजी से प्रश्नवाचक दयनीय दृष्टि से देखा। उन्होंने फटाफट घर के बाहर कुएं से ठंडा-ठंडा पानी लोटे में डाला और बोले ये खेत और पगडंडी देख रहे हो, यहीं आसन जमा लो, लेकिन आसपास लोग थे, दिन का नज़ारा था और मैं इस अस्वाभाविक घटना के लिए तैयार नहीं था। 
 
फिर तालाब के पास बांध की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंचा। आसपास गंभीर निरीक्षण किया। जगह साफ सुथरी है, आसपास कोई है तो नहीं, झाड़ियां कहां है और महत्वपूर्ण बात उसमें कोई सांप तो नहीं है क्योंकि उससे बहुत डर लगता था। डरते-डरते कार्य सम्पन्न किया, लेकिन मज़ा बहुत आया था। उस रमणीय वातावरण में खुली खिली हवा, तालाब, पंछियों की चहचाहट और पेट की गरगारहट। सितारा होटल के टॉयलेट भी फेल हो जाते। इसके बाद ये जब तक रहा दिनचर्या बन गई। 
 
दांत में दातून चबाते हुए गांव के लौंडों के साथ सामूहिक रूप से बांध पर बैठक होती। शरारत में एक-दूसरे का लोटा गिरा देते। जिसका लोटा गिरता उसको अर्धनग्न हालात में तालाब तक जाकर धोना होता। तालाब की रेत से हाथ धोते साबुन की तरह, फिर लोटा मांजते। कुछ लोग उस रेत से दांत भी मांजते और नहाते, तैराकी करते, कुछ मछली पकड़ते या तालाब के कमल का फूल तोड़ते। सुबह के दो घण्टे यूं बिताकर सर पर चड्डी या तौलिया सुखाते और घर को आते। रात से पहले शाम को भी यही कार्यक्रम होता क्योंकि रात में पॉटी करना उस बियावान में बहुत डरावना होता। महिलाओं की टोलियां रात होने पर जाती। खाना खाने से एक घण्टा पहले।
 
20-25 किलोमीटर की दूरी पर तीन हमउम्र फुफेरे भाई, बुआ, फूफा एक दरभंगा के सरकारी कैम्पस में रहते थे। जो शायद आज भी श्रीनगर से कम नहीं। तीन तरफ से बागमती नदी और बांध से घिरे विशाल कबराघाट में नाम मात्र पांच-छ: घर। वहां घरों से अक्सर सांप निकलते इसलिए उनके टॉयलेट में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। जितने दिन भी रुकना होता, मैं और लंगोटिया फुफेरा भाई हम सब बागमती नदी के किनारे नरम-नरम घास पर हगने में अगाध शांति प्राप्त करते। 
 
कुछ घासें जो बड़ी थी वो कभी-कभी चुभती भी थी और नज़र कमांडो सरीखी कि आसपास से कहीं से कोई सांप-बिच्छू पिछवाड़े पर डंक ना मार दे। फिर बहती नदी की मंद धारा में अपनी तशरीफ़ को साफ करते। इस दौरान स्कूल, घर, परिवार की बहुत सारी गोष्ठियां भी निपटा लेते। ये क्रम कई साल चला। इस बीच अपने घर मे टॉयलेट बना भी, लेकिन वो घर की सीमा से आखिरी छोर पर था। रात बिरात वहां पहुंचने की बात से ही सब सटक जाता। शायद पॉटी भी पच जाती थी। सर्दियों के कोहरे में तो ज्यादा दूर भी नही जाना पड़ता था। 
 
एक मामाजी हैं। उनकी आदत भी लोटा लेकर जाने की थी, लेकिन हमारे स्वभाव के विपरीत। जहां हमें साफ-सुथरी आसानी से भाग निकलने की जगह पर जाने की आदत थी, वे मुँह में किसी भी पेड़ की टहनी ठूंसते, कभी तम्बाकू मुँह में डालते हुए सघन वनों के बीच या गन्ने के खेतों में घुस जाते थे। बोर ना हो जाए इसलिए हाथ में एक छोटा ट्रांजिस्टर होता था। वे थोड़े बहादुर टाइप के थे। मुझसे कुछ दूर बैठते, मैं डरा-डरा कब उनके नज़दीक खिसकते-खिसकते पहुंच जाता था पता भी नहीं चलता था  और वे खिसायते, दांत निपोरते, झाड़ियों के बीच छुप जाते। उनके घर मे टॉयलेट था, लेकिन घर के ज्यादातर मर्द सुबह 4 बजे से खेतों में खाद पानी देते। खेतों का निरीक्षण करते। चौक की चाय की दुकान पर स्पेशल चाय सुड़कते घर आते। 
 
आज इतने सालों बाद भी इन सबको सोचकर रोमांचित हो जाता हूं। घर के टॉयलेट्स में वो गांव वाला सुख कहां मिलता है। उफ्फ टॉयलेट एक प्रेमकथा देखुं भी या नहीं। कहीं पुराने ज़ख्म ना हरे हो जाए इस बात से डरता हूं। 
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