शहीदाना अंदाज में शरद यादव की बगावत के निहितार्थ

Author अनिल जैन| Last Updated: सोमवार, 14 अगस्त 2017 (21:19 IST)
लड-झगड़कर अलग होना, कुछ समय बाद फिर मिलना, एक होना और अंतत: फिर टूटकर बिखरना! यही नियति रही है भारतीय राजनीति में समाजवादियों की। किसी के लिए भी ठीक-ठीक बता पाना बहुत मुश्किल है कि शानदार वैचारिक विरासत वाली यह वाचाल राजनीतिक जमात कितनी बार टूटी और जुड़ी तथा आज इसके कितने टुकड़े भारतीय राजनीति में विद्यमान हैं।

बहरहाल, इतिहास फिर अपने को दोहरा रहा है। लगभग 2 दशक तक जनता दल (यू) की छतरी तले हमकदम रहे और की राहें अब पूरी तरह जुदा हो गई हैं। उनकी पार्टी के दोफाड़ होने और एक-दूसरे को निकालने की औपचारिकताएं ही अब शेष रह गई हैं।

नीतीश कुमार ने के (राजद) और कांग्रेस के साथ 20 महीने पुराने अपने महागठबंधन से नाता तोड़कर अपना सियासी मुस्तकबिल भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ नत्थी कर लिया है। उनके इस फैसले को उनकी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और संसदीय दल के नेता शरद यादव ने मानने से साफ इंकार कर दिया है।
हालांकि नीतीश कुमार और भाजपा की ओर से शरद यादव को मनाने की पूरी कोशिश की गई थी। उन्हें महत्वपूर्ण महकमे के साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल करने और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का संयोजक बनाने की पेशकश भी की गई थी। खुद नीतीश कुमार के अलावा केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली और आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चन्द्रबाबू नायडू ने शरद को मनाने की कोशिश की थी लेकिन उनकी कोशिश नाकाम रही।
शरद अब नीतीश के फैसले को बिहार की जनता से विश्वासघात और वादाखिलाफी करार देते हुए 'जनता से संवाद’ के नाम पर बिहार की सड़कों पर निकल पड़े हैं। शरद के इस कदम को नीतीश के नेतृत्व के खिलाफ उनकी बगावत माना जा रहा है। इसीलिए नीतीश की ओर पार्टी महासचिव केसी त्यागी के जरिए उन्हें अनुशासन में रहने की हिदायत दिलाकर और उनके समर्थक माने जाने वाले पार्टी महासचिव अरुण श्रीवास्तव को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाकर सख्त संदेश भी दिया गया है।

चूंकि इस हिदायत और संदेश को अनसुना कर शरद यादव बिहार में अपना दौरा और नीतीश के फैसले की मुखालिफत जारी रखे हुए हैं इसलिए जल्द ही उन पर भी अनुशासन का डंडा चल सकता है। संकेत हैं कि उन्हें संसदीय दल के नेता पद से हटाकर पार्टी से निलंबित किया जा सकता है।

अपने खिलाफ नीतीश की ओर से होने वाली इस संभावित कार्रवाई का अंदाजा शरद को भी है इसीलिए वे भी अपने दौरे में हर जगह कह रहे हैं कि कुछ लोग सत्ता की खातिर महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के साथ चले गए हैं लेकिन बिहार में जद (यू), राजद और कांग्रेस का महागठबंधन अभी भी कायम है और आगे भी कायम रहेगा। उनका दावा है कि नीतीश अब सरकारी जनता दल की अगुवाई कर रहे हैं, जबकि असली जनता दल हमारे साथ है। सरकार के कुछ मंत्री भी हमारे साथ हैं, जो उचित समय पर सामने आएंगे।जाहिर है कि शरद भी नीतीश के साथ दो-दो हाथ करने की तैयारी के साथ ही मैदान में उतरे हैं।
बताया जा रहा है कि जद (यू) की 16 राज्य इकाइयों ने नीतीश कुमार को पत्र लिखकर उनसे पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाने की मांग की है। यह मांग नीतीश के महागठबंधन से अलग होने के फैसले के परिप्रेक्ष्य में है, लेकिन नीतीश एक तरह से यह मांग खारिज कर चुके हैं। उनका कहना है कि जद (यू) व्यावहारिक तौर पर एक क्षेत्रीय पार्टी है और उसका जनाधार मुख्य रूप से उसका बिहार में ही है, इसलिए पार्टी की बिहार इकाई ने राज्य के हितों को ध्यान में रखकर जो फैसला लिया है उसे ही पूरी पार्टी को मानना होगा।

अलबत्ता नीतीश ने 19 अगस्त को पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक जरूर बुलाई है।
यह सच है कि जद (यू) का मुख्य जनाधार बिहार में ही है, लेकिन देश के अन्य राज्यों में भी पार्टी की इकाइयां कार्यरत हैं, जो कि शरद यादव के अध्यक्षीय कार्यकाल में ही गठित की गई थीं हालांकि उनमें से ज्यादातर का प्रभाव नगण्य हैं।

चूंकि शरद लंबे समय तक पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं, उससे पहले वे जनता पार्टी, लोकदल और अविभाजित जनता दल में भी राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं, जबकि नीतीश को पार्टी का नेतृत्व संभाले महज 1 साल ही हुआ है, लिहाजा बिहार के बाहर पार्टी से जुड़े कार्यकर्ताओं और नेताओं से शरद का संपर्क नीतीश की तुलना में कहीं ज्यादा है।
शरद यादव ने बिहार के दौरे पर निकलने से पहले विभिन्न राज्य इकाइयों से भी संपर्क साधकर उन्हें अपने समर्थन में गोलबंद किया है। पार्टी के 2 अन्य सांसदों एमपी वीरेंद्र कुमार केरल और अली अनवर अंसारी ने भी खुलकर शरद यादव के सुर में सुर मिलाते हुए नीतीश के फैसले से असहमति जताई है। अली अनवर के मुताबिक पार्टी के कुछ अन्य सांसद और 2 दर्जन से ज्यादा विधायक भी नीतीश के फैसले से असहमत हैं लेकिन वे फिलहाल दलबदल विरोधी कानून के चलते खुलकर सामने नहीं आ रहे हैं।

अब संभव है कि शरद यादव और उनके समर्थन में खुलकर आए नेताओं के खिलाफ नीतीश की ओर से अनुशासनात्मक कार्रवाई के बाद पार्टी के दोनों खेमे अपने को असली जद (यू) बताने का दावा करे। अगर ऐसा होता है तो विवाद चुनाव आयोग में और फिर अदालत में भी जा सकता है।

वैसे पार्टी के अध्यक्ष पद पर नीतीश की नियुक्ति की वैधता को भी चुनाव आयोग के समक्ष चुनौती पहले ही दी जा चुकी है, जिस पर आयोग ने वादियों को अदालत में जाने की सलाह दी है। पार्टी का औपचारिक तौर पर विभाजन होने की स्थिति में शरद यादव और उनके सहयोगियों की पूरी कोशिश होगी की कि वे जद (यू) के कुछ विधायकों को अपने पाले में लाकर नीतीश कुमार की सरकार को गिराकर महागठबंधन की वैकल्पिक सरकार बनाए या राज्य में नए चुनाव की स्थिति पैदा करें।
शरद यादव और नीतीश की राहें औपचारिक तौर पर भले ही अभी-अभी अलग हुई हों लेकिन अनौपचारिक तौर पर यह सिलसिला पिछले एक साल से जारी है। इसकी पहली झलक मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले के समय देखने को मिली थी जब नीतीश कुमार मोदी सरकार के इस फैसले के साथ खड़े दिखाई दिए थे, जबकि शरद यादव ने नोटबंदी का खुलकर विरोध किया था। ऐसा ही सर्जिकल स्ट्राइक के सरकार के दावे को लेकर भी हुआ। शरद ने जहां सरकार के दावे पर संसद में कई सवाल उठाए, वहीं नीतीश ने सरकार के दावे का समर्थन किया। राष्ट्रपति पद के चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार का समर्थन करने के सवाल पर भी दोनों नेताओं की राय एक-दूसरे से जुदा थी।

दरअसल, पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से ही शरद यादव मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने की मुहिम में जुटे हैं। मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण विधेयक के खिलाफ विपक्ष की कामयाब गोलबंदी उन्हीं की पहल का परिणाम थी जिसके चलते सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे। बिहार विधानसभा के चुनाव में नीतीश और लालू यादव को साथ लाने और महागठबंधन बनाने में भी उनकी अहम भूमिका रही।
हालांकि असम और उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन बनाने की उनकी कोशिशें परवान नहीं चढ़ सकीं, लेकिन इसके बावजूद वे विपक्ष की व्यापक एकता की कोशिशों में जुटे रहे। राष्ट्रपति चुनाव से पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के निमंत्रण पर हुई 17 विपक्षी दलों की बैठक भी शरद की ही कोशिशों का परिणाम थी। वे अपनी इन कोशिशों को और विस्तार देना चाहते थे लेकिन बिहार में महागठबंधन तोड़कर भाजपा के साथ जाने के नीतीश कुमार के फैसले ने उनकी कोशिशों को गहरा झटका पहुंचाया है।
यह सच है कि मौजूदा राजनीति में जिन अर्थों में किसी नेता को जनाधार वाला नेता माना जाता है, उन अर्थों में शरद यादव अपने चार दशक से भी लंबे संसदीय जीवन के बावजूद कभी भी जनाधार वाले नेता नहीं रहे। लेकिन चौधरी चरणसिंह, मधु लिमये, कर्पूरी ठाकुर, देवीलाल जैसे नेताओं के साथ लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति में रहने तथा बाद में मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू कराने में अहम भूमिका के चलते वे राष्ट्रीय स्तर के नेता के तौर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहे। वे इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के बाद तीसरे ऐसे राजनेता हैं, जो अलग-अलग समय में तीन अलग-अलग राज्यों से लोकसभा में पहुंचे हैं।
बहरहाल, बिहार की राजनीति और जद (यू) में छिड़े घमासान का नतीजा चाहे जो हो, शरद यादव मंत्री पद की पेशकश ठुकराकर शहीदाना अंदाज में यह संदेश देने में तो कामयाब हो ही गए हैं कि उनके लिए जन सरोकारों और सिद्धांतों के आगे सत्ता गौण है। उनका यह पैंतरा उन्हें आने वाले दिनों में विपक्षी एकता की धुरी भी बना सकता है।



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