असभ्य होने के लिए धर्म काफी है?

आप जानते हैं कि कोई देश कैसे इराक, अफगानिस्तान या सीरिया बनता है...? मनुष्य को गुफा और जंगल से निकलने में कई हजार वर्ष लगे। आधुनिक होने में सैकड़ों वर्ष लगे और अंतरिक्ष में पहुंचने में एक सदी लगी। यह सब संभव हुआ और विज्ञान से। लेकिन लगता है कि हम अब रिवर्स गियर लगा रहे हैं। जिसके कारण हम सभ्य बने और जिसके कारण हम आधुनिक बने, अब उन्हीं कारणों के कारण हम असभ्य होकर मध्य और बर्बर युग में धकेले जा रहे हैं।

आप सोच रहे होंगे कि वे क्या कारण हैं? दरअसल, एक समय था जबकि धर्म ने हमें जंगली से सभ्य बनाया, विज्ञान ने हमें सुविधासंपन्न और आधुनिक बनाया। क्या आप ऐसा नहीं सोचते? हो सकता है कि इसके पीछे आप अर्थ और श्रम का योगदान मानते हों। पूंजीवादी और साम्यवादी सोच में कोई खास फर्क होता है? हालांकि हम सभी तरह के ज्ञान को लेकर आगे बढ़े हैं और फिर वही ज्ञान अब हमें पीछे धकेल रहा है। यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि शिक्षा और ज्ञान में फर्क है। बहुत से शिक्षित मूर्ख और बहुत से अशिक्षित ज्ञानी सिद्ध हो चले हैं।

क्या आप जानते हैं कि हम एक ऐसी सदी में जी रहे हैं जिसमें सभी सदियों के लोग रहते हैं या घालमेल है? अफ्रीका के घने जंगलों में आज भी आदिमानव हैं, तो हिमालय की ऊंची और मैदानी पहाड़ियों पर रहने वाले लोग नहीं जानते हैं कि लोग 'मोबाइल' नामक एक यंत्र पर सीरिया और में लोगों को मरते हुए लाइव देख रहे हैं। क्यों मार या मर रहे हैं लोग?

'संवेदना' एक ऐसा शब्द है जिसका अब डिक्शनरी में रहने का कोई अर्थ नहीं रहा। वहां सीरिया में मनुष्य नहीं मर रहे हैं, मुसलमान मर रहे हैं, जैसे पहले कश्मीर में पंडित और नाइजीरिया में ईसाई मर रहे थे। दरअसल, इस धरती पर अब कोई मनुष्य नहीं मरता, जो कि हम मनुष्यता के मारे जाने का गम मनाएं। आप क्या समझते हैं? मासूम बच्चियों के साथ रेप नहीं हो रहा? बच्चों को कत्ल नहीं किया जा रहा? यजीदियों के साथ जो हुआ वह सिर्फ इसलिए, क्योंकि वे यजीदी थे। दुनियाभर के सभी देशों में यही हो रहा है। बस, नाम बदल गए हैं। कहीं पर खुलेआम हो रहा है, तो कहीं पर चुपचाप। पाकिस्तान में शिया, हिन्दू, अहमदिया, ईसाई और सिख इसलिए मारे जा रहे हैं, क्योंकि वे सुन्नी नहीं हैं।

दुनियाभर में कहीं-न-कहीं युद्ध किसी न किसी रूप में जारी है और इस युद्ध में सबसे ज्यादा कोई मर रहा है तो वह है मुसलमान। पूरा इराक और सीरिया लगभग बेघर हो गया है। गगनचुंबी इमारतें जमीदोज हो गई हैं। यमन, सूडान, सोमालिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, यूक्रेन, तुर्की, नाइजीरिया, उज्बेक, लीबिया, म्यांमार, बांग्लादेश, फिलिस्तीन, चेचन्या (रूस), शिनजियांग (चीन), थाईलैंड, माली, ट्यूनीशिया, मिस्र, चाड, कैमरून आदि कई जगहों पर जिंदगी जीना अब आसान नहीं रहा। ऐसा क्यूं? क्या इस जंग या संघर्ष का कोई अंत है? जवाब है शायद नहीं।

नहीं इसलिए कि पूरी दुनिया में अब मनुष्य को ढूंढना मुश्किल है। मनुष्य होगा तभी तो उसमें मनुष्यता होगी और तभी तो उसके भीतर संवेदना होगी। दुनिया में एक तरफ मुसलमान मर रहा है, तो मुसलमान रो रहा है और दूसरी तरफ ईसाई मर रहा है, तो ईसाई रो रहा है। ऐसा नहीं होता है कि कोई मुसलमान मरे और ईसाई रोए। कोई बौद्ध मरे और मुसलमान रोए।


'हम सभी ने मिलकर मनुष्यता को मार दिया', इस वाक्य को रहने ही दो। धरती और स्त्री के साथ क्या किया? नदियों को सुखा दिया, पहाड़ों को काट दिया, ग्लेशियरों को पिघला दिया और समुद्र एवं अंतरिक्ष में लाखों टन कचरा फैला दिया। अभी भी हमें इन सबकी चिंता ही नहीं है। इस पृथ्वी के जल, आकाश और भूमि के सभी प्राणियों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसने अन्य प्राणियों के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। लुप्त हो गए हैं कई पक्षी, पशु और जलचर जंतु।


'प्रकृति' ने ही मनुष्य को शारीरिक रूप से मजबूत बनाया था लेकिन मनुष्य ने जीवन के स्रोत को ही बर्बाद कर दिया। मनुष्य के कृत्यों ने उसका स्वरूप बदलकर रख दिया है। निश्चित ही प्रकृति बदलेगी तो मानव का जीवन भी बदलेगा, उसका व्यवहार भी बदलेगा। पानी के लिए जो लड़ाई आज से हजारों वर्ष पूर्व रोम, मिश्र, मेसोपोटामिया, एथेंस, मगध और लुम्बनी में लड़ी गई थी, वही लड़ाई अब शुरू हो गई है। हमें इंतजार है अपने पीछे लौटने का।

इस दौर में धर्म की राजनीति और राजनीति का धर्म जोरों पर है। पूंजीवाद, साम्यवाद और धार्मिक कट्टरता तीनों ही तरह की विचारधाराओं ने धर्म का भरपूर दोहन कर का साम्राज्य कायम कर रखा है। इस दौर में सभी मूक प्राणियों, पक्षियों, वृक्षों, नदियों, पहाड़ों, महिलाओं, बच्चों और मानवता के शोषक तथा व्यक्ति स्वतंत्रता के दुश्मन हैं। लेकिन ऐसा कहना या लिखना भी इस ओर इंगित करता है कि फिर आपकी कोई विचारधारा नहीं है और मनुष्यवादी होना कोई विचारधारा नहीं होती है।

'अहिंसा ही धर्म है', यह बात हजारों वर्षों में भी नहीं समझी गई। आगे भी कोई उम्मीद नहीं है। वेदों में अहिंसा के सूत्र मिलते हैं। कई अन्य अहिंसक लोग भी हुए हैं। अहिंसा पर प्रवचन देने वाले भी अनेक हैं, लेकिन महावीर सबसे अलग हैं और उनकी अहिंसा की धारणा भी कहीं ज्यादा संवेदनशील है। संसार के प्रथम और अंतिम व्यक्ति हैं भगवान महावीर, जिन्होंने अहिंसा को बहुत ही गहरे अर्थों में समझा और जिया।

क्या कोई यह कहेगा कि धर्म और अहिंसा में फर्क है? क्या यह कोई नहीं जानता कि धर्म मंगल है और मंगल ही करता है? वर्तमान में यह देखकर दु:ख होता है कि जिन्हें धर्म समझा जा रहा है, दरअसल वे सभी संप्रदाय हैं और सभी एक-दूसरे के खिलाफ होकर जीवनविरोधी बने हुए हैं। उनमें जरा भी 'जियो और जीने दो' की भावना नहीं है।

अंतत:...

भारत के महान दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति ने कहा था, 'अनेकानेक लोग सोचते हैं कि सारे मनुष्यों को पढ़ना-लिखना सिखा देने से मानव समस्याओं का निदान हो जाएगा', लेकिन यह विचार मिथ्या साबित हुआ है। तथाकथित पढ़े-लिखे लोग भी शांतिप्रिय एवं समय-भावशील नहीं हैं और वे भी संसार में व्याप्त दु:ख और भ्रम के लिए उत्तरदायी हैं।


'सिर्फ यह कि एक सरकार को बदलकर उसकी जगह दूसरी सरकार बिठाकर या एक पार्टी अथवा वर्ग की एवज में दूसरी को लाकर यानी एक शोषक के स्थान पर दूसरे को आसीन करके हम बुद्धिमय नहीं हो सकते। खूनी क्रांतियां कभी भी हमारी समस्याओं को हल नहीं कर सकतीं। सिर्फ एक सशक्त आत्ममुखी क्रांति ही है, जो कि हमारे सारे मूल्यों को बदल दे, वो ही किसी भिन्न किस्म के माहौल की और किसी समझदार सामाजिक संरचना की सृष्टि कर सकती है। लेकिन वह क्रांति सिर्फ तुम्हारे और मेरे द्वारा ही लाई जा सकती है। यदि हम हमारे अपने ही मानसिक प्रतिबंधों को तोड़कर मुक्त नहीं होंगे, तो किसी भी प्रकार की कोई भी नई प्रणाली का विकास नहीं होगा।'


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