नसीरुद्दीन शाह, देश को बदनाम न करिए

Naseeruddin Shah
Author अवधेश कुमार|
फिल्म अभिनेता के बयान पर मचा बावेला स्वाभाविक है। यह सोशल मीडिया के ज्वार का दौर है। पूरा फेसबुक, ट्विटर नसीरुद्दीन शाह से भरा हुआ है। नसीरुद्दीन ने भी अपनी बात कहने के लिए सोशल मीडिया का ही उपयोग किया और उसे कराने की कोशिश की। पर इसे सुनने वालों की संख्या उनके सारे वीडियो को पार कर गया है।

इस समय के माहौल में आपको चर्चा में आना है, तो कुछ ऐसी बातें बोल दीजिए, जो आग लगाने वाली हों, बड़े समूह को नागवार गुजरने वाला हो, उनके अंदर उत्तेजना पैदा कर सकता है, आप सीधे में आ जाएंगे। लोग गाली दें या प्रशंसा करें, लेकिन आप चर्चा में बने रहेंगे।

नसीरुद्दीन शाह भले गुमनाम न हों, लेकिन काफी समय से चर्चा में नहीं थे। अब की स्थिति देख लीजिए। तक नसीरुद्दीन शाह की बात पहुंच गई। उन्होंने बाजाब्ता अपने भाषण में इसकी चर्चा करते हुए मोहम्मद अली जिन्ना के विचारों से इसकी तुलना कर दी। वे कह रहे हैं कि जिन्ना साहब ने इसलिए पाकिस्तान की मांग की और लड़ाई लड़कर अलग देश बनाया, क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई के बाद मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक बनकर जीना होगा, जो उन्हें स्वीकार नहीं है और आज मोदी के शासनकाल में वही हो रहा है जिसकी आशंका जिन्ना साहब ने व्यक्त की थी।

इस तरह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की नजर में नसीरुद्दीन शाह की बात भारत में मुसलमानों के डर में जीने या दोयम दर्जे का जीवन की स्थिति का सबूत है। नसीरुद्दीन ने हालांकि इमरान की बातों का प्रतिवाद किया है, पर अगर वे ऐसा नहीं बोलते तो इमरान को भारत के बारे में का अवसर नहीं मिलता। कश्मीर केंद्रित आतंकवादियों और उनको प्रश्रय देने वालों के बीच नसीरुद्दीन के वीडियो सुनाने की खबरें हैं। इसे कुछ लोग मानवाधिकार संगठनों को भी भेज रहे हैं तथा इस्लामिक सम्मेलन संगठन या ओआईसी में भी इसे लाने की कोशिशें हो रही हैं।

पता नहीं इस बयान का कहां-कहां किस रूप में भारत के खिलाफ उपयोग होगा? यही पहलू चिंतित करता है कि जो देश के सेलिब्रिटीज हैं, उनको बयान देते समय कितना विचार करना चाहिए। किंतु भारत में ऐसे तथाकथित बड़े लोगों और सेलिब्रिटीज की संख्या बढ़ गई है जिनके लिए पता नहीं देश की इज्जत और छवि से बड़ा क्या है? सोशल मीडिया पर जो गालियां दे रहे हैं या 'उनको पाकिस्तान चले जाना चाहिए' जैसी बातें लिख बोल रहे हैं, उनसे सहमति नहीं। किंतु यह स्वीकारना होगा कि नसीरुद्दीन ने जो कहा, उससे भारी संख्या में भारतीयों की भावनाओं को धक्का लगा है। वे ऐसा नहीं बोलते, तो भारत विरोधियों को उसे जगह-जगह उपयोग करने का हथियार हाथ नहीं आता।

नसीरुद्दीन कह रहे हैं कि मुझे समझ में नहीं आता कि मैंने ऐसा क्या कह दिया जिससे कि इतना बावेला मचा है? वे कह रहे हैं कि जिस मुल्क से मैं प्यार करता हूं, जो मेरा मुल्क है उसके हालात पर चिंता प्रकट करना मेरा अधिकार है। यदि दूसरे मेरी आलोचना करते हैं, तो उनकी आलोचना करने का मेरा भी अधिकार है। निस्संदेह, आपको इसका अधिकार है किंतु सर्वसाधारण से आपकी जिम्मेवारी ज्यादा है। जब आप कहते हैं कि 'मुझे फिक्र होती है अपने बच्चों के बारे में कि यदि वे बाहर निकले और भीड़ ने उन्हें घेर लिया और उनसे पूछा कि तुम हिन्दू हो कि मुसलमान, तो वे क्या जवाब देंगे?' तो इसका संदेश यह निकलता है कि भारत में सड़क चलते लोगों से भीड़ धर्म पूछकर हिंसा करती है।

वे कह रहे हैं कि हालात सुधरने का तो मुझे कोई आसार नहीं दिखता। भारत में ऐसी स्थिति बिलकुल नहीं है। जाहिर है, उन्होंने किसी और इरादे से सोच-समझकर ऐसा सांप्रदायिक बयान दिया है जिसकी निंदा करनी ही होगी। उन्होंने अपने बयान के लिए बुलंदशहर की हिंसा को आधार बनाया है। बुलंदशहर की हिंसा उत्तरप्रदेश प्रशासन की शर्मनाक विफलता थी। हालांकि हिन्दू-मुसलमानों के बीच के एक बड़े सांप्रदायिक हिंसा की साजिश भी विफल हुई।

नसीरुद्दीन ने उनकी आलोचना नहीं की जिन्होंने गायों को काटकर उनके सिर और चमड़े आदि ठीक सड़क के किनारे ईख के खेतों में छोड़ दिए थे। लोगों में गुस्सा था और पुलिस इंस्पेक्टर जो थोड़े लोग आरंभ में विरोध करने आए थे, उनको ही धमका रहा था। इसका वीडियो भी सामने आ गया है कि उसने गोली चला दी जिससे एक नौजवान की मौत हो गई। एक ओर कटे गायों के अवशेष, दूसरी ओर नौजवान की मौत के बाद वहां क्या स्थिति पैदा हुई होगी, इसको समझे बगैर कोई बात करने का अर्थ ही है कि आप किसी दुराग्रह से भरे हैं। ऐसा दुराग्रह आग बुझाने की जगह उस पर पेट्रोल डालने का काम करता है। क्या हम भूल जाएं कि बुलंदशहर में चल रहे तब्लीगी इज्तिमा में लाखों मुसलमान एकत्रित थे? गोकशी के कारण गुस्सा अगर चारों ओर फैलता तो क्या रूप लेता, इसकी कल्पना से ही सिहरन पैदा हो जाती है। आरोपी पकड़े जा चुके हैं।

यह ठीक है कि हिन्दू भी अब आक्रोशित प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगे हैं किंतु यह अपने-आप नहीं हुआ है। इसका कारण लंबे समय तक जगह-जगह अल्पसंख्यकों द्वारा मजहबी अतिवादिता का व्यवहार तथा शासन द्वारा उनका संरक्षण और प्रोत्साहन रहा है। इस मूल पहलू की अनदेखी कर कोई भी एकपक्षीय प्रतिक्रिया दुराग्रहपूर्ण होगी। वैसे भी देश में कहीं ऐसी स्थिति नहीं है कि बहुसंख्यक समाज, अल्पसंख्यकों को डर में जीने को मजबूर कर रहा है। कुछ दु:खद घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर और सांप्रदायिक रंग देकर पेश किया गया लेकिन जब जांच हुई तो उसके कारण अलग निकले।

जिस तरह का भयावह चित्र नसीरुद्दीन प्रस्तुत कर रहे हैं, वैसी स्थिति भारत में न थी और न हो सकती है। हमारे यहां कानून का शासन है और इसको जो भी तोड़ने की कोशिश करेगा, तो उसे कानूनी प्रावधानों के अनुसार परिणाम भुगतना पड़ेगा।

इमरान खान अपने गिरेबान में झांकें। इसी वर्ष अप्रैल में मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में पाकिस्तान के बारे में जो कहा गया, उससे उनका सिर शर्म से झुक जाना चाहिए। इसमें कहा गया है कि विचार, विवेक और धर्म की आजादी को लगातार दबाया गया, नफरत और कट्टरता को बढ़ाया गया तथा सहनशीलता और भी कम हुई। सरकार अल्पसंख्यकों पर जुल्म के मुद्दे से निपटने में अप्रभावी रही और अपने कर्तव्यों को पूरा करने में नाकाम रही।

आयोग ने कहा कि ईसाई, अहमदिया, हजारा, हिन्दू और सिख जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा में कोई कमी नहीं आई और वे सभी हमलों की चपेट में आ रहे हैं। धार्मिक अल्पसंख्यकों की आबादी कम हो रही है। पाकिस्तान की स्वतंत्रता के वक्त अल्पसंख्यकों की आबादी 20 प्रतिशत से ज्यादा थी जबकि 1998 की जनगणना के मुताबिक यह संख्या घटकर अब 3 प्रतिशत से थोड़ी ही ज्यादा है।

1947 में पाकिस्तान की 15 प्रतिशत हिन्दू आबादी अब महज 1.5 प्रतिशत तक सिमट गई है। चरमपंथी पाकिस्तान के लिए विशिष्ट इस्लामिक पहचान बनाने पर आमादा हैं और ऐसा लगता है कि इसकी उन्हें पूरी छूट दी गई है। सिंध में हिन्दू असहज हालात में रहने को मजबूर हैं। समुदाय की सबसे बड़ी चिंता जबरन धर्मांतरण है। लड़कियों को अगवा कर लिया जाता है और उनमें से अधिकतर नाबालिग होती हैं। उनको जबरन इस्लाम में धर्मांतरित किया जाता है और फिर मुस्लिम व्यक्ति से शादी कर दी जाती है।

भारत में तो हम ऐसी स्थिति की दु:स्वप्नों में भी कल्पना नहीं कर सकते। यदि जिन्ना ने ऐसे पाकिस्तान की कल्पना की जिस पर इमरान को संतोष है, तो ऐसा देश और समाज उनको मुबारक हो। हमारे देश में तो जिन मुसलमानों की आबादी 1951 की जनगणना में 8 प्रतिशत से कम थी, वह अब 15 प्रतिशत के आसपास है। पाकिस्तान से अधिक मुसलमान भारत में हैं।

भारत में कोई नेता, मंत्री, बुद्धिजीवी कभी पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की स्थिति को मुद्दा नहीं बनाता। उनके बयान पर हमारे प्रधानमंत्री उस तरह नहीं बोलते जिस तरह इमरान ने नसीरुद्दीन के वक्तव्य पर बोला जबकि यह झूठ है और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दुर्दशा सच है। नसीरुद्दीन या उनके जैसे तथाकथित प्रगतिशील सेक्यूलर लोग पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों के पक्ष में कभी आवाज नहीं उठाते।

नसीरुद्दीन को इस देश ने सबकुछ दिया। उनकी फिल्म देखते समय हमने नहीं सोचा कि वे मुसलमान हैं। उन्हें पद्मभूषण तक से नवाजा गया। इसके बावजूद यदि उन्हें अपने बच्चों को लेकर इस देश में फिक्र है, तो यही कहना होगा कि आप इस महान देश के प्रति कृतघ्न हैं। क्या नसीरुद्दीन को अफसोस नहीं हुआ कि उनके बयान का किस तरह पाकिस्तान भारत को बदनाम करने में उपयोग कर रहा है? जेहादी आतंकवादी उपयोग कर रहे हैं?

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