उपराष्ट्रपति के रुप में वेंकैया की उम्मीदवारी के राजनीतिक मायने


भाजपा या राजग की ओर से उपराष्ट्रपति पद के लिए वेंकैया नायडू को उम्मीदवार बनाए जाने से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ है। उनका नाम कई दिनों से हवा में तैर रहा था। जिन अन्य लोगों का नाम आ रहा था, उनमें सबसे वजनदार नाम वेंकैया नायडू का ही था। यह तो साफ था कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह भाजपा से ही किसी को उम्मीदवार बनाएंगे। उसके साथ उत्तर और का समीकरण बनाने की कोशिश हुई। उत्तर से हैं तो दक्षिण से वेंकैया नायडू। वस्तुतः भाजपा यह तो चाहती थी कि उम्मदीवार दक्षिण का भाजपाई हो किंतु उसके पास कुछ और योग्यता भी चाहिए। मसलन, चेहरा जाना पहचाना हो, उसे संसदीय कार्य का पर्याप्त अनुभव हो, वरिष्ठता भी हो, पक्ष के साथ विपक्ष के नेताओं से भी जिसके संबंध हों तथा जिसके पास इतनी क्षमता हो कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी राज्य सभा का कुशलतापूर्वक संचालन कर सके। राज्य सभा में राजग को बहुमत नहीं है। ऐसे में अध्यक्ष की भूमिका पर बहुत कुछ निर्भर करता है। दक्षिण भारत के कई नेता भाजपा में हैं, जिनके नामों पर भी चर्चा हुई, लेकिन इन सारी कसौटियों पर वेंकैया ही खड़े उतरते हैं। इसलिए उनको उम्मीदवार बनाया गया।

68 वर्षीय वेंकैया नायडू चौथी बार राजस्थान से राज्यसभा के सदस्य हैं। वो पहली बार 1998 में राज्यसभा के लिए चुने गए थे। इसके बाद 2004, 2010 और फिर 2016 में भी यहां पहुंचे। यानी करीब 19 वर्षों से लगतार वे राज्य सभा में है। इस नाते राज्य सभा का उनका अनुभव काफी है। इसके पहले वे 1978 से 1985 तक आंध्रप्रदेश विधानसभा के सदस्य भी रहे हैं। अगर वे उपराष्ट्रपति के रुप में राज्य सभा की अध्यक्षता करते हैं तो यह सारे अनुभव उनके काम आएंगे। दूसरे, वे संसदीय कार्य मंत्री भी रहे हैं। यह भी उनके पक्ष में जाता है। संसदीय कार्य मंत्री रहते हुए सभी दलों के नेताओं से संपर्क करना होता है। वैसे उनका राजनीतिक जीवन 23 वर्ष की उम्र से ही आरंभ हो गया था जब वे जय आंध्र आंदोलन से जुड़े। इसके बाद छात्र नेता के रुप में वे आंध्रा विश्वविद्यालय छात्र संघ के नेता चुने गए। राजनीति में उनका उत्थान जयप्रकाश आंदोलन के साथ हुआ। जनता पार्टी के शासन में आने के बाद वे 1977 से 1980 तक जनता पार्टी की युवा ईकाई के प्रदेश अध्यक्ष रहे। जनता पार्टी से टूटकर भाजपा बनने के बाद वे स्वाभाविक ही भाजपा की ओर आए, प्रदेश के प्रमुख पदों पर रहते हुए केन्द्र में महासचिव से लेकर पार्टी अध्यक्ष तक की भूमिका निभाई। वे अटल बिहारी वायजेपी के सरकार में भी मंत्री रहे और अब मोदी सरकार में भी। इस तरह देखें तो एक साथ छात्र नेता, आंदोलन से लेकर संगठन चलाने एवं मंत्रालय संभालने का भरपूर अनुभव उनके साथ है। भाजपा में सक्रिय दक्षिण भारत के नेताओं में इतना व्यापक बहुआयामी अनुभव किसी के पास नहीं है। सबसे बढ़कर अपने लंबे राजनीतिक जीवन के बावजूद कभी उनका नाम किसी विवाद में नहीं आया। पार्टी की अंदरुनी राजनीति में भी कभी किसी गुटबाजी का आरोप उन पर नहीं लगा। यह सामान्य बात नहीं है।
इन सब कारकों को आधार बनाएं तो वेंकैया नायडू को उम्मीदवार बनाया जाना, भाजपा की दृष्टि से एकदम तार्किक लगेगा। वेंकैया का मुकाबला विपक्ष के 18 दलों के उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी से होना है। गोपाल गांधी भी देश के जाने माने शख्सियत हैं। वे भारतीय प्रशासनिक सेवा से लेकर राजनयिक एवं राज्यपाल तक रहे हैं। महात्मा गांधी का पोता होने के कारण उनकी प्रतिष्ठा देश में वैसे भी है। हालांकि याकूब मेमन की फांसी का विरोध करने के कारण इस समय वे विवादों में हैं और देश उनको लेकर दो भागों में बंटा हुआ है। किंतु उपराष्ट्रपति चुनाव में जनता को वोट नहीं देना है, केवल लोकसभा और राज्यसभा के सांसद के मतदान से इसमें हार जीत तय होती है। इस नाते अंकगणित लगभग स्पष्ट है। कुल वोट देने वाले सांसदों की संख्या है 790। यानी उप राष्ट्पति चुनाव में विजय के लिए 396 मत चाहिए। भाजपा सहित राजग के पास 412 सांसद हैं। इस नाते वेंकैया की जीत वैसे ही तय है। इसके साथ उन्हें अन्नाद्रमुक, वाईएसआर कांग्रेस, टीआरएस और बाकी दलों को समर्थन उन्हें प्राप्त है। हालांकि राष्ट्पति चुनाव में रमानाथ कोविंद को मत देनेवाले जद यू तथा बीजद ने इस बार गोपाल गांधी को मत देने का फैसला किया है। बावजूद इसके वेंकैया को 500 से ज्यादा मत मिलने की संभावना है।

तो वेंकैया नायडू देश के अगले उपराष्ट्रपति होंगे। उन्होंने कहा कि मैं संवैधानिक जिम्मेदारियों की रक्षा करूंगा। मैं अपनी जिम्मेदारी समझता हूं। डॉ. राधाकृष्णन, डॉ. जाकिर हुसैन, न्यायमूर्ति एम. हिदायतुल्ला, डॉ. शंकर दयाल शर्मा जैसे उपराष्ट्रपतियों की परंपरा में शामिल होकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। तो यह उम्मीद करनी चाहिए कि वेंकैया स्वयं को एक अच्छे उपराष्ट्रपति साबित करेंगे। अभी तक भारत में जितने राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति हुए हैं उनमें से किसी पर पक्षपात का आरोप नहीं लगा। पद संभालने के पहले उनका विचार जो भी रहा हो उसका असर उनके निर्णयों पर नहीं दिखा। वेंकैया इस पंरपरा में ही आएंगे ऐसी उम्मीद की जा सकती है। ध्यान रखिए, वेंकैया ने जिन उपराष्ट्रपतियों का नाम लिया उनमें एम. हिदायतुल्ला को छोड़कर सभी राष्ट्रपति हुए। लंबे समय से यह परंपरा टूटी हुई है। हो सकता है उपराष्ट्रपति के कार्यकाल के बाद भाजपा उन्हें राष्ट्रपति का उम्मीदवार भी बनाए। भविष्य की इस संभावना का भी उनको ध्यान होगा।

किंतु तत्काल भाजपा के लिए इसके दो अर्थ हैं। एक, पहली बार राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति दोनों उसके होंगे। दोनों खांटी विचारधारा की पृष्ठभूमि से आने वाले हैं। तो भाजपा पर विचारधारा को लेकर कई प्रकार के जो आरोप लगते हैं उनका भी परीक्षण इनके कार्यकाल के दौरान हो जाएगा। सत्ताशीर्ष पर प्रधानमंत्री खांटी संघी विचारधारा का और फिर राष्ट्रपति एवं उप राष्ट्रपति भी। यह इनके लिए विरोधियों को गलत साबित करने तो मौका होगा ही, अपनी सोच को देश के सामने लाने और उसे क्रियान्वित करने का भी। यह बहुत बड़ी बात होगी। तो पूरे देश की नजर इस ओर रहेगी। हो सकता है इनकी निष्पक्ष भूमिका से आरोपों का दम निकल जाए। सामान्य राजनीति की दृष्टि से विचार करें, तो भाजपा ने रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाकर यदि दलितों को साधने की कोशिश की तो वेंकैया को उम्मीदवार बनाकर दक्षिण भारत में अपना समर्थन आधार बनाने का सपना संजोया है। दक्षिण में कर्नाटक को छोड़कर उसका ठोस आधार कहीं नहीं है। पार्टी ने कमजोर आधार होते हुए भी जिन राज्यों को अपने लिए संभावनाओं वाला माना है उसमें आंध्रप्रदेश, केरल, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल शामिल है। पश्चिम बंगाल को छोड़कर शेष तीनों राज्य दक्षिण के हैं। भाजपा तमलिनाडु में भी अपना विस्तार करना चाहती है। खासकर अन्नाद्रमुक में जयललिता के देहावसान के बाद जो रिक्तता आई है उसके बाद भाजपा अपने लिए यहां संभावना देख रही है। तो उसे लगता है कि वेंकैया के माध्यम से वे दक्षिण भारत के इन सारे राज्यों में पार्टी के लिए अनुकूल संदेश दे सकेंगे। देखना होगा उसके राजनीतिक सपनों पर वेंकैया की उम्मीदवारी का कितना असर होता है। किंतु जनता के बीच वह यह संदेश जरुर देगी कि उसने किस तरह दो सर्वोच्च पदों पर उत्तर और दक्षिण का संतुलन बनाया है। यानी दक्षिण को वह पर्याप्त महत्व देता है।

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