एक युगांतरकारी महापुरुष की दोसौवीं जयंती

शरद सिंगी|
5 मई को विश्व ने मार्क्सवाद के प्रणेता की दोसौवीं जयंती मनाई। उनका जन्म 5 मई 1818 में हुआ था। मार्क्स एक जर्मन दार्शनिक, पत्रकार, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, इतिहासकार और क्रांतिकारी समाजवादी थे। उन्हें मानव इतिहास के सबसे प्रभावशाली विचारकों में से एक के रूप में वर्णित किया गया है।
मार्क्स के लेखन की कहीं तो अतिशय प्रशंसा हुई और कहीं घोर आलोचना। उनकी प्रसिद्ध पुस्तिका सन् 1848 यानी 19वीं सदी में प्रकाशित हुई थी जिसे आमतौर पर 'कम्युनिस्ट घोषणापत्र' के रूप में जाना जाता है। 'दास कैपिटल' उनकी दूसरी महत्वपूर्ण पुस्तक थी। ये दोनों पुस्तक और उनके द्वारा लिखे गए अन्य लेख मार्क्सवाद के विचार और विश्वास का आधार हैं।

आश्चर्य की बात यह रही कि 19वीं सदी में रचित ये पुस्तकें और लेख उनके मृत्योपरांत 20वीं सदी में अनेक राजनीतिक एवं खूनी क्रांतियों के जनक बने। 20वीं शताब्दी में रूस, चीन, क्यूबा और अन्य देशों में श्रमिकों और कृषकों ने शोषक शासकों को उखाड़ फेंका तथा साहूकारों की निजी संपत्ति और उत्पादन के साधनों पर कब्जा कर लिया।
शिक्षा समाप्त कर कार्ल मार्क्स पत्रकार बन गए थे किंतु अपने लेखन की कट्टरपंथी प्रकृति की वजह से वे जर्मनी, फ्रांस और बेल्जियम की सरकारों द्वारा एक के बाद एक उन देशों से निष्कासित कर दिए गए। अंत में वे इंग्लैंड आकर बसे और जीवनपर्यंत यहीं रहे।

आश्चर्य की बात यह रही कि उनके जीते-जी साम्यवाद का कोई अस्तित्व नहीं था किंतु अगली शताब्दी में साम्यवाद ने लगभग एक तिहाई पृथ्वी पर अपने पैर पसार लिए थे- मुख्यत: चीन, रूस और क्यूबा में। उनका मानना था कि श्रमिकों और कृषकों को उनकी मेहनत का पैसा तो मिलता है किंतु मुनाफे में से कोई हिस्सा नहीं मिलता। पूरा मुनाफा मालिक बनाता है इसलिए वे पूंजीवाद के घोर आलोचक थे।
'कम्युनिस्ट घोषणा पत्र' में मार्क्स ने चेतावनी दी थी कि पूंजीवाद का वैश्वीकरण ही अंतरराष्ट्रीय अस्थिरता का मुख्य कारण बनेगा। मार्क्स के जीवनी लेखक फ्रांसिस व्हीन लिखते हैं कि मार्क्स के अनुसार पूंजीवाद अपनी कब्र खुद ही खोदता है। हालांकि मार्क्स की यह भविष्यवाणी मिथ्या ही साबित नहीं हुई बल्कि इसके विपरीत ही हुआ है कि साम्यवाद तो खत्म हुआ, वहीं दूसरी तरफ पूंजीवाद सर्वव्यापी हुआ।
यद्यपि मार्क्स अपनी भविष्यवाणी में असफल हुए किंतु 20वीं तथा 21वीं शताब्दी के हाल ही के वित्तीय संकटों के समय मार्क्स की भविष्यवाणी में आंशिक सत्य भी दिखाई दिया। यही कारण है कि भूमंडलीकरण की समस्याओं की मौजूदा बहस में मार्क्सवाद का संदर्भ बार-बार आता है।

भारत की बात करें तो यहां साम्यवाद मुख्यत: पश्चिमी बंगाल, केरल और त्रिपुरा तक ही सीमित रहा। शनै:-शनै: वह वहां भी प्रासंगिकता खो रहा है। चीन बस नाम को साम्यवादी बचा है, काम से तो वह पूरे का पूरा पूंजीवादी हो चुका है। यही हालत रूस की भी है।
इसके बावजूद कार्ल मार्क्स के सम्मान में कोई कमी नहीं आई है। कारण वही एक महापुरुष था जिसकी कलम ने शताब्दियों से शोषित सर्वहारा वर्ग को एकजुट किया जिसने शोषक शासकों को उखाड़कर साम्यवाद को स्थापित किया। इसमें संदेह नहीं कि मार्क्स कृषकों और श्रमिकों के मसीहा बनकर धरती पर आए थे और इन वर्गों को उन्होंने समाज में यथोचित सम्मान दिलाया।

मार्क्स उन महापुरुषों में से हैं, जो सदी में एक बार आते हैं और आने वाली कई सदियों पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं। इस लेखक का मानना है कि विचार अपने आप में कभी प्रासंगिक अथवा अप्रासंगिक नहीं होते। समवर्ती परिवेश उसे प्रासंगिक या गैरप्रासंगिक बनाता है। विचार तो अमर होते हैं अत: विचार देने वाले भी अमर हो जाते हैं।
उन्हीं के कुछ अमर कथन यहां प्रस्तुत हैं-

'सामाजिक प्रगति को समाज में महिलाओं की स्थिति से आंका जा सकता है। महिलाओं की उन्नति के बिना सामाजिक परिवर्तन असंभव है।'

'क्रांतियां इतिहास के इंजन हैं जिनसे सभ्यताएं आगे बढ़ती हैं।'

धर्म के बारे में वे कहते हैं कि 'धर्म उत्पीड़ित प्राणियों की आह है। वह निर्दयी दुनिया में दिल का काम करता है और आत्माविहीन स्थिति में आत्मा का काम करता है। धर्म, आम जनता के लिए अफीम का नशा है जिसका दोहन पूंजीपति करता है।'
उनके ऐसे अनेक कथन हैं, जो अमर हो गए और निरंतर उद्धृत किए जाते रहेंगे। इन शब्दों के साथ उस युगांतरकारी महापुरुष को शतश: प्रणाम!

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