Widgets Magazine

सांझी होती थीं बेटियां...

Author अमर खनूजा चड्ढा|

 
आज हम उम्र की उस दहलीज पर हैं, जहां हमारे रोल और जिम्मेदारियां बदल रही हैं। कोई परदादी, नानी, सास, मां, मामा, मौसी के नए रिश्तों में आ रहा है तो कहीं बहुएं द्वार पर नए पदचिह्न लिए आ रही हैं। बेटियां मां-बाप की झोली में सौगातें, आशीषें भरकर जा रही हैं। कहीं नन्हे फरिश्ते नए रूप और शुभ बंधन लेकर आ रहे हैं। इस पूरे जीवनक्रम और सामाजिकता की बात करें तो पहले आंगन, तंदूर, कुएं सांझे होते थे और सांझी होती थीं बेटियां। 
 
हर मोहल्ले में ऐसी प्यारी, नटखटी, चंचल, समझदार, सिरचढ़ी बेटियां होती थीं जिनकी आवभगत की जाती थी, इनसे रिश्तों का सम्मान होता था। कंजकों से लेकर इनके खुद के मातृत्व सफर में सारे नाज-नखरे उठाए जाते थे। और वार-त्योहार, गर्मी की छुट्टियों में तो जैसे मांओं का उत्साह और ममत्व उढाहें मारता है, वहीं बेटियों की बेसब्री और खुशी छलकती दिखती है। 
 
बदलते वक्त में कामकाजी जिम्मेदारियों, पढ़ाई-लिखाई, एक्जाम के प्रेशर में, यात्रा सुविधाओं के विकल्पों आदि के कारण इन छुट्टियों में कटौतियां हो रही हैं। कहीं संकुचित व्यवहार, संयुक्त परिवार में कुछ सदस्यों की व्यक्तिवादी सोच, आपसी समझ व सहनशीलता की कमी, तल्खियां या कभी परिस्थितियां भी कारण बन जाती हैं।
 
अपनी डायरी में मैं यह विचार लिख ही रही थी, कि कुसुम का फोन आया जिसकी आवाज में झुंझलाहट और रोष था। हुआ यह कि उसकी बेटी सुबह आने वाली थी और काम वाली बाई ने ऐनवक्त पर उसे छुट्टी की सूचना दी, क्योंकि उसकी बेटी भी अपने मायके पहुंच गई थी। दो-तीन दिन की छुट्टी। इस अघोषित छुट्टी से कुसुम व्यथित थी और वही आम से जुमले कहती जा रही थी - कितना भी कर लो (लोन, खाना-पीना वस्तुएं आदि) कोई बात नहीं रखते ये लोग। इतनी रिक्वेस्ट की, पर पहले क्यों नहीं बताया? जवाब देती है- छोटी मायके आई है, उसके साथ रहूंगी। बिना बताए अचानक आई है, पता नहीं उसे मेरी याद आ रही थी या कच्चे मन से आई है। 
 
कुसुम की व्यस्तता और बेटी की पसंद के पकवान की तैयारियों के लिए मैंने अपनी मदद का ऑफर दिया। हमारी बात खत्म हो गई किंतु मैं सोच में पड़ गई। सामान्य शिष्टाचार की गुंजाइश हम दूसरों के लिए क्यों छोड़ देते हैं? समय की पाबंदी, जिम्मेदारी, सफाई प्लानिंग क्या सब एकतरफा होना चाहिए? दूसरों पर इल्जाम लगाना सरल है। 
 
क्यों यहां फर्क है? यहां पूंजीवादी अस्तित्ववादी व्यवस्था है। मालिक-नौकर का है। किंतु कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिनकी कोई कीमत नहीं। ममत्व का कोई मोल नहीं? वह तो अमीरी-गरीबी में एक समान है। यहां हमारी सोच संकुचित हो गई है, संवेदनाएं खत्म हो गई हैं, क्योंकि हमने सब्र जब से छोड़ा है, पेशेंस त्यागा है, पेशेंट हो गए हैं। इगोस्टिक झुनझुना थामा हुआ है, क्रोध का कोयला दिमाग में धधकाया है, जो पहले स्वयं को ही जला रहा है। व्यक्तिवाद में भावनाएं, मूल्य सेवाएं व सहानुभूति सब जमींदोज हो रही हैं। क्या ही अच्छा होता कि कुसुम उसकी बेटी को भी घर पर आमंत्रित करती, उसकी पसंद का खाना बनाती या अपने साथ रख कुकिंग या कोई आर्ट सिखाने का प्रस्ताव रखती, जो सद्भावना के साथ कुछ नया करने की प्रेरणा देता। 
 
मुद्दा गंभीर है लेकिन समाधान मुश्किल नहीं। हमें अपनी सामंती सोच बदलनी है। आपका खून, खून और किसी गरीब का? आपका प्यार, प्यार...आपकी सेवा, ममता खरी, लेकिन दूसरों की सहूलियत के हिसाब से बांटी गई व्यवस्था है। 
 
रिश्ते और संबंध अपनों से हों या पराए से, डिमांड करते हैं। उन्हें चाहिए थोड़ा-सा प्यार, देखभाल, उत्साह, सब्र, अटेंशन या एक थपकी शाबाशी की और एक लफ्ज तारीफ का। एक-दूसरे के प्रति कच्चा मन तभी बदल पाएगा, जब हम समता और ममता के प्लेटफॉर्म पर खड़े रहकर सामाजिक रिश्तों व संबंधों को निभाएंगे और सिखाएंगे। फायदा यह होगा कि रोजमर्रा के आड़े काम, वक्त और सिचुएशन पर हम स्वयं तो व्यवस्थित रहेंगे और एक नया परिवर्तन समाज में ला सकेंगे। 
 
तो देखिए, इस बार छुट्टियों में पिंकी की बुआ, स्वीटी की मौसी, गुड्डू की भाभी, सीतादेवी की नातिन, कुलजीतजी का पोता, डॉ. साहब के दामाद और कमलाबाई की बेटी आपके घर-द्वार से कच्चे मन से वापस न जाए। 
Widgets Magazine
वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।
Widgets Magazine