मूर्ख परंपरा और समर्पित मूर्ख

मैं बचपन से रहा हूं, पर कभी इस पर गर्व नहीं किया। करता भी क्यों आखिर, गर्व मनुष्य द्वारा स्वअर्जित चीजों पर किया जाना चाहिए, प्रकृति प्रदत्त वस्तुओं पर कैसा गुमान, वो तो आपके पूर्व जन्म में किए गए कर्मो का ही फल होता है, जो कभी बासी नहीं होता है। प्रकृति के इस “फल” को सहेज कर ग्लोबल वार्मिंग के युग में बिना किसी बल के “सेव-नेचर” अभियान में आप अपना योगदान दे सकते हैं।

मूर्ख होने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि विद्वता की तरह, अपनी मूर्खता मनवाने के लिए आपको ज्यादा प्रयास नहीं करने पड़ते हैं। लोग खुद ही आकर आपको बता देते हैं। विद्वता साबित करने के लिए आपको बार-बार मेहनत करनी पड़ती है, फिर भी शक्कीनुमा लोग संतुष्ट नहीं होते हैं और आपकी विद्वता को संदेह की दृष्टि से देखते रहते हैं। मूर्खता को ऐसे किसी भी खतरे से जेड श्रेणी की सुरक्षा प्राप्त होती है। बस एक बार आप मूर्ख साबित हो जाएं, तो लोग खुद ही बिना किसी कमीशन के, सामाजिक मिशन के तहत, इसके प्रचार की एजेंसी ले लेते है और जीवन भर कभी आपके मूर्खतारूपी धन पर संदेह का छापा नहीं डालते है। कहने का तात्पर्य है कि मूर्खता की ब्रांडिंग सरल है।
 
विद्वता का निवास केवल दिमाग में होता है जबकि मूर्खता के साथ ऐसा कोई संकट नहीं है। उसका स्वभाव लचीला होता है, वह कहीं भी गुजर-बसर कर लेती है, दिल में, दिमाग में और जब मूर्खताओं का सीजन आता है तो चेहरे से भी टपकने लगती है जिसका सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि लोग आपके संपर्क आए बिना, आपका फोटो देखकर ही आपका परिचय जान लेते हैं। मूर्खता की एक विशेषता होती है कि इसे सीमाओ में नहीं बांधा जा सकता है, मूर्खता अपने प्रवाह में सारी इंसानी अनुमानों को बहा ले जा सकती है जबकि बुद्धिमता इस मामले में पंगु ही साबित होती है,उ सका कार्यक्षेत्र सीमित होता है।
 
इंसान कितना भी प्रतिभावान क्यों ना हो, अपने जन्म जात गुणों को लेकर थोड़ा “पजेसिव” और “इनसिक्योर” हो ही जाता है। इसलिए मुझे लगता था कि अगर किसी को मुझसे मिलकर, बात करके और मुझे देखकर भी अगर मेरी मूर्खता का भान न हुआ, तो मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहूंगा। इसलिए मैं इस लेख के जरिए अपनी मूर्खता की सार्वजनिक मुनादी कर रहा हूं, क्योंकि आज के प्रतियोगी युग में मूर्ख होने के साथ-साथ मूर्ख लगना भी आवश्यक है।
 
मूर्खता के बाकी फायदों के इतर सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप मूर्ख होने की वजह से “अपेक्षाओं” को जन्म नहीं देते है और इस तरह से आप प्रसव पीड़ा से तो बचते ही हैं, साथ ही अपेक्षाएं पूरी ना कर पाने की ग्लानि से भी पार पा लेते हैं। मूर्खता की चादर ओढ़ कर आप अपने आपको मेहनत की सर्द ठंडी हवाओ से बचा सकते हैं और समाज से नजरें चुराकर ,आराम से “येड़ा बनकर पेड़ा” खा सकते हैं।
 
दुनिया में दो तरह के मूर्ख होते हैं। एक होते हैं, मेरी तरह जन्म-जात मूर्ख और दूसरे जो बनाए जाते हैं। जन्म-जात मूर्ख होने के नाते, मैं दूसरे प्रकार के मूर्खो को कमतर आंकता हूं क्योंकि ये मूर्ख अस्थायी प्रकृति के होते हैं। इनकी मूर्ख बने रहने की अवधि बहुत कम होती है। जन्म-जात मूर्खो की तुलना में इनमें “मैन्यूफैक्टरिंग डिफेक्ट” ज्यादा  होते हैं और तो और मूर्ख बनने के बाद भी ये अपनी मूर्खता को “own” करने में शर्मिंदगी महसूस करते हैं। ऐसे ही धूर्त और चालक मूर्खो की वजह से ही, मूर्खता की महान परंपरा कलंकित होती है, उस पर लांछन लगता है। बस इन्ही नकली मूर्खो की वजह से मैं भयभीत हो जाता हूं, असुरक्षा की भावना “यू आर अंडर अरेस्ट” कहके मुझे घेर लेती है, मुझे कभी-कभी लगता है कि मैं अपने सर पर एक तख्ती टाक कर, उस पर “नक्कालों से सावधान, हमारी कोई शाखा नहीं है” लिखवा कर अपनी मूर्खता का जीवन बीमा करवा लूं।
 
लेकिन मेरे जैसे पहले प्रकार के जन्म-जात मूर्ख इतने बड़े देश के लिए मूर्खता का कोटा पूरा नहीं कर सकते हैं, इसलिए दूसरे प्रकार के मूर्खो का भी अपना व्यापक महत्व है। अपने देश में हर पांच साल बाद बड़े तौर पर “मूर्खिकरण अभियान” चलाया जाता है जिसे चुनाव की संज्ञा दी जाती है। जनता चुनाव के समय वोट डालते वक्त अपने आप को बहुत समझदार मानकर वोट डालती है लेकिन उसे पता ही नहीं चलता कि वोट डालकर उसने अगले पांच साल के लिए अपनी मूर्खता का नवीनीकरण कर लिया है।
 
मूर्खता की भूख, पेट की भूख से भी बड़ी होती है। इसलिए मूर्खता अपनी क्षुधा मिटाने के लिए नए नए साधन तलाशती है। कभी वो टीवी विज्ञापनों की तरफ आशाभरी नजरों से देखती है, कभी बाबाओं की शरण में जाती है तो कभी “चेहरा देखो-इनाम जीतो” का नंबर मिलाती है।
 
हमारे देश में मूर्खता का व्यवहार और व्यापार, बहुत व्यापक है। नोटबंदी या और किसी भी प्रकार की बंदी, इसमें मंदी नहीं ला सकती है। मूर्खता के लिए केवल एक दिन समर्पित करना, हम जैसे समर्पित मूर्खो के साथ बड़ा अन्याय होगा जो सतत और नित्य मूर्खता का उत्पादन कर “मूर्ख परंपरा” को “धरोहर” के रूप में जीवित रखे हुए है।

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