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मौलिक अधिकार और कानून का इंसाफ
संविधान के अनुच्छेद 21 में 'जीवन' की व्यापक व्याख्या की गई है। अदालत ने कहा है कि अनुच्छेद 21 में 'जीवन' से तात्पर्य मात्र भौतिक अस्तित्व नहीं है बल्कि इससे कहीं अधिक है। 'हम सोचते हैं कि जीवन के अधिकार में मानवीय गरिमा और उसके लिए जरूरी चीजों के साथ जीने का अधिकार शामिल है, जैसे उचित पोषण, कपड़े और आश्रय।' पश्चिम बंग खेत मजदूर समिति के मामले में अदालत ने मानवाधिकारों के मामले में अपने उदारवादी रवैये को और आगे बढ़ाते हुए सामाजिक एवं आर्थिक पहलुओं को भी इसमें शामिल किया। उसने ठहराया कि लोगों को चिकित्सा सेवाएँ मुहैया कराना राज्य का एक अनिवार्य दायित्व है और इसे आर्थिक दिक्कतों का हवाला देकर टाला नहीं जा सकता। इस व्याख्या के माध्यम से अदालत ने वास्तव में कुछ निदेशक सिद्धांतों को कुछ मौलिक अधिकारों में समाहित कर दिया है और उन्हें प्रवर्तनीय बना दिया है।

वीरेन्द्र गौर मामले में अदालत ने ठहराया कि मानवीय गरिमा के साथ जीने के अधिकार में पर्यावरण की सुरक्षा तथा संरक्षण, जल एवं वायु प्रदूषण से मुक्त पारिस्थितिकी शामिल है और स्वास्थ्यकर पर्यावरण स्वस्थ जीवन के अधिकार का अनिवार्य हिस्सा है। इस व्याख्या के माध्यम से सुप्रीमकोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान किया है।

एक और उल्लेखनीय बात यह है कि अदालत ने कुछ ऐसे मौलिक अधिकारों को भी रेखांकित किया है जिनका मौलिक अधिकारों के अध्याय में स्पष्ट उल्लेख नहीं है। उदाहरण के लिए, संविधान में प्रेस की स्वतंत्रता की गारंटी स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार के रूप में नहीं दी गईहै। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने अपने अनेक फैसलों में ठहराया है कि प्रेस की स्वतंत्रता भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में अंतर्निहित है। इस प्रकार प्रेस की स्वतंत्रता को भी न्यायिक व्याख्या के कारण मौलिक अधिकार का दर्जा मिल गया है

इसी प्रकार अदालत ने निजता के अधिकार, विदेश यात्रा करने के अधिकार, शिक्षा के अधिकार, अमानवीय सजा अथवा व्यवहार से मुक्ति को भी मौलिक अधिकार का दर्जा दिया है। ऐसी सृजनात्मक व्याख्याओं के चलते अदालत ने मौलिक अधिकारों के क्षेत्र का खासा विस्तार कर दिया है। मौलिक अधिकारों की विवेचना के अलावा अदालतों ने न्यायिक विधान में भी दखल रखा है। इसके दो प्रमुख उदाहरण हैं। पहला है विशाखा मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला।

मामला था कार्यस्थल पर यौन प्रताड़ना की दीर्घ स्थायी एवं व्यापक समस्या का। इससे निपटने के लिए कोई कानून नहीं था। इसे देखते हुए कोर्ट ने मानवाधिकारों संबंधी विविध अंतरराष्ट्रीय विधानों का संदर्भ लेते हुए कई निर्देश जारी किए। इनमें यौन प्रताड़ना की परिभाषा, संभावित प्रतिरोधक उपाय, यौन प्रताड़ना के खिलाफ की जा सकने वाली अनुशासनात्मक कार्रवाई और उसकी प्रक्रिया आदि शामिल हैं। कोर्ट ने शिकायतें प्राप्त करने के लिए तंत्र तथा शिकायत समिति का भी गठन किया। बेशक इसके पीछे कोर्ट का इरादा प्रशंसनीय तथा यौनप्रताड़ना की शिकार महिलाओं के लिए लाभप्रद था लेकिन यह अस्थायी एवं तदर्थ न्यायिक विधान का उत्कृष्ट उदाहरण है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि उसके द्वारा दिए गए निर्देश तब तक बंधनकारक एवं कानूनन प्रवर्तनीय होंगे जब तक इस विषय में कोई कानून नहीं बना लिया जाता।
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