इस दौरान शहरों में औसतन 8.1 करोड़ लोग प्रति वर्ष बढ़े। शहरी जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के चलन और उससे जन्म लेती जटिल समस्याओं से भारत भी अछूता नहीं रहा है। हालाँकि कुल जनसंख्या में शहरी जनसंख्या का प्रतिशत तो अधिक नहीं बढ़ा है (यह 1951 में 14 प्रतिशत से बढ़कर वर्तमान में 28 प्रतिशत हुआ है), लेकिन संख्या के हिसाब से देखें तो बहुत अधिक वृद्धि हुई है। आज भारत की शहरी आबादी लगभग 30 करोड़ है, जो कि स्वतंत्रता के समय भारत की कुल आबादी से अधिक है। गत 50 वर्षों में भारत प्रति वर्ष औसतन 50 से 60 लाखलोग अपने शहरों में जोड़ता जा रहा है। आज हमारे यहाँ चार 'मेगा सिटी' (50 लाख से अधिक जनसंख्या), 19 'मेट्रो सिटी' (10 लाख से अधिक जनसंख्या) और 300 बड़े शहर हैं। इसके अलावा छोटे व मध्यम आकार की 3396 शहरी बसाहटें हैं। हमारे चार शहर (मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नाई) विश्व के 30 सबसे बड़े शहरों में से हैं।
भारत की परिस्थितियों को देखते हुए उसे शहरों को लेकर एक स्पष्ट दृष्टि विकसित करना चाहिए थी। साथ ही इस दृष्टि को वास्तविकता में परिवर्तित करने के लिए एक तगड़ी इच्छाशक्ति भी उसमें होना चाहिए थी। दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं सका। नतीजा यह है कि हमारे शहरोंकी हालत खस्ता है। आज हमारी 52 प्रतिशत शहरी आबादी के लिए सफाई व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है। जल-मल निकासी व्यवस्था का लाभ वर्ग-4 शहरों में 35 प्रतिशत और वर्ग-1 शहरों में 75 प्रतिशत लोगों तक ही पहुँच पाया है। लगभग 34 प्रतिशत शहरी आबादी के पास तो वर्षा जलकी निकासी की भी सुविधा नहीं है। हमारे 60 प्रतिशत शहरी निकाय प्रतिदिन निकलने वाले ठोस अपशिष्ट के 40 प्रतिशत से भी कम का निपटारा कर पाते हैं। कम से कम 28 प्रतिशत शहरी अपशिष्ट सड़क किनारे, घरों व फैक्टरियों के आसपास पड़ा सड़ता रहता है। इसका काफी बड़ाहिस्सा नालियों में जाकर उन्हें अवरुद्ध कर देता है और चारों ओर कीचड़ व बदबू फैलाता है, साथ ही मच्छर, मक्खियों, कॉकरोचों आदि के फलने-फूलने के लिए आदर्श वातावरण निर्मित करता है।
हमारी सघनता दर विश्व में सर्वाधिक है। कोई 19 प्रतिशत भारतीय परिवार 10 वर्ग मीटर से भी कम जगह में रहते हैं। शहरी क्षेत्रों में 44 प्रतिशत परिवार एक ही कमरे के घरों में गुजारा करते हैं। शहरों की जनसंख्या जिस रफ्तार से बढ़ रही है, झोपड़पट्टियों व अतिक्रमणों की संख्या उससे दोगुनी से भी ज्यादा रफ्तार से बढ़ रही है। शहरों की कम से कम 35 प्रतिशत आबादी झोपड़पट्टियों में ही रह रही है। गरीबों के लिए शहर व गाँव दोनों जगह जीवन-स्तर एक जैसा ही होता है। ये महज गाँव की नर्क समान जिंदगी छोड़कर शहर की नर्क समान जिंदगी जीने चले आते हैं।
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