इन हालातों के लिए कुछ बुनियादी कमियाँ जिम्मेदार हैं। पहली है बचपन समर्थक और बाल अधिकार का सम्मान करने वाली मानसिकता की कमी। दूसरा सामाजिक चेतना और सरोकार का अभाव। तीसरा राजनीतिक इच्छाशक्ति और ईमानदारी की कमी। चौथा बच्चों के अधिकारों और संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए आर्थिक संसाधन मुहैया कराने में कोताही और पाँचवाँ बच्चों के मामले में एक स्पष्ट नैतिकता का अभाव।
बच्चों के मामले में हमारी मानसिकता दो प्रकार की है, यदि आप कथित तौर पर भले और संवेदनशील हैं तो अभाव ग्रस्त बच्चों के ऊपर दया दिखाने या उपकार करने की मानसिकता। दूसरी ओर जो लोग व्यावहारिक हैं और सबसे कमजोर तबकों का उपयोग अपनी संपन्नाता बढ़ाने और मौज-मस्ती के लिए करने में यकीन रखते हैं। ऐसे लोग मजदूर के रूप में बच्चों के श्रम का शोषण, अपनी हवस मिटाने के लिए उनका यौन शोषण अथवा कुत्सित रौब-रुतबे के लिए बच्चों पर हिंसा आदि का सहारा लेते हैं। समाज में ऐसे कितने लोग हैं, जिन्हें बच्चों के अधिकारों की कोई चेतना या समझ है। हर बच्चा नैसर्गिक, संवैधानिक और कानूनी अधिकारों के साथ जन्मता है। किंतु इन अधिकारों का सम्मान और बच्चों के प्रति संवेदनात्मक व मित्रतापूर्ण रिश्ता कितने लोग कायम रखते हैं ?
बाल अधिकार भी बुद्धि-विलास, चर्चा-परिचर्चा या एनजीओ अथवा सरकारी महकमों की परियोजना भर बन कर रह गए हैं, जबकि बाल अधिकारों का सम्मान और बाल मित्र समाज बनाने के प्रयत्न सबसे पहले एक जीवन जीने का तरीका बनने चाहिए। बच्चों के प्रति हम कैसा सोचते हैं,उनके साथ कैसे समानता और इज्जत का व्यवहार करते हैं, उनका विकास, संरक्षण और उनका सम्मान हमारी निजी सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक प्राथमिकताओं में कैसे ढल जाता है। इस पर गहरे मंथन और अमल की जरूरत है।
बाल श्रम के अभिशाप को ही लें। 6 करोड़ बच्चों को सस्ते श्रम के लालच में अशिक्षा, बीमारियों, दासता की गहरी खाई में धकेलकर जो समाज समृद्धि और विकास के सपने संजो रहा है, उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि इतनी बड़ी संख्या में मानवीय गरिमा से वंचित रहकर पनपनेवाले नागरिक समृद्धि के टापुओं पर बैठे लोगों को क्या कभी चैन की साँस लेने देंगे। ये बच्चे गरीब माता-पिता के बच्चे हैं, यह तय है, किंतु ये माता-पिता इसलिए गरीब हैं कि क्योंकि या तो वे बेरोजगार हैं या उन्हें साल भर में 50-60 दिन से ज्यादा रोजगार नहीं मिलता। साथ ही यह भी तय है कि इन लोगों को सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम मजदूरी तक नहीं मिलती। दूसरी तरफ बच्चों को काम पर लगाया जाता है कि वे सबसे सस्ते या मुफ्त के श्रमिक हैं तथा वे मालिकों के लिए किसी प्रकार की चुनौती भी नहीं होते।
गैर-सरकारी आँकड़ों पर गौर करें तो एक ओर जहाँ 6 करोड़ के लगभग बच्चे काम करते हैं, वहीं साढ़े 6 करोड़ वयस्क लोग बेरोजगार हैं, जिनमें ज्यादातर बाल मजदूरों के अभिभावक हैं। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जहाँ भी बच्चे बाल मजदूरी करते हैं, वहाँ वयस्क मजदूरों का मेहनताना बहुत कम हो जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जब किसी मालिक को, चाय के ढाबे, छोटी-मोटी दुकानों, सड़क किनारे के होटलों, रेस्टॉरेंटों आदि पर काम करने के लिए नाम मात्र की मजदूरी पर या मुफ्त में बच्चे मिल जाते हैं तो फिर वह ज्यादा पैसे देकर बड़ों को काम पर क्यों लगाएगा? इससे माँ-बाप गरीब बने रहते हैं और बच्चे बाल मजदूरी की चक्की में पिसते जा रहे हैं। इसलिए यह मानना भूल होगी कि बाल मजदूर अपने परिवार के लिए अतिरिक्त आमदनी का जरिया है।
गरीबी के कारण बाल मजदूरी और अशिक्षा चलती है, यह एक ऐसा भ्रम है, जो अब तक टूट जाना चाहिए था। उदाहरण के लिए उत्तरप्रदेश और केरल ऐसे दो राज्य हैं, जहाँ गरीबी का स्तर लगभग बराबर है। फिर भी केरल में शत-प्रतिशत साक्षरता है और उत्तरप्रदेश लगातार इस क्षेत्रमें पिछड़ रहा है। आज देश में 6 करोड़ बच्चे मजदूरी कर रहे हैं। एक बार मजदूर को दिन में 10 रुपए से कम मजदूरी मिलती है तो सभी बच्चे मिलकर 60 करोड़ रुपए प्रतिदिन कमा पाते हैं। यदि बच्चों की जगह वयस्कों को काम मिले, तो उनकी आदमनी 8 से 10 गुना ज्यादाहोगी, इससे पूरे परिवार की गरीबी दूर हो सकती है और बच्चों को शिक्षा का अधिकार हासिल भी हो सकता है।
यदि हम बाल व्यापार की बात करें तो लोग सामान्यतः इसे वेश्यावृत्ति के साथ ही जोड़कर देखते हैं। असलियत में 90-95 प्रतिशत बाल व्यापार गुलामी, बंधुआ या जबरिया मजदूरी, भिक्षावृत्ति, आपराधिक कृत्यों, सर्कस आदि मनोरंजन उद्योगों तथा घरेलू बाल मजदूरी आदि के लिएहोता है। हमारे देश में क्रूरता का यह कलंक बहुत तेजी से पनप रहा है। लाखों बच्चे इसके शिकार हैं। अफसोसजनक बात यह है कि हमारे देश में इस तरह का बाल व्यापार रोकने अथवा इस घोर मानवीय अपराध में संलग्न लोगों को सजा देने के लिए कोई कानून नहीं है।
हम सब जानते हैं कि भारत के 10-15 फीसदी अच्छी और ऊँची पढ़ाई कर पाने वाले युवक-युवतियों ने दुनिया में तहलका मचा दिया है। सूचना तकनीक, कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर, इंजीनियरिंग और चिकित्सा आदि के क्षेत्र में अद्भुत प्रतिभा का परिचय देकर इस पीढ़ी ने विश्वमें भारत की छवि ही बदल डाली है। |