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~ हिन्दी “मौसी” नहीं “माँ” है ~
- पंकज जोशी

Hindi
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ओह! हाय मॉम आई एम बैक फ़्राम द स्कूल। हाऊ शुड आई टेल यू, इट वॉस ए लॉन्ग टायरिंग डे मॉम। एंड यू नो आई हेव वन टुडेज़ ‘हिन्दी डे' डिबेट कॉम्पिटिशन। ये बर्गरयुगी भाषा है दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश के युवा की। हमारी राष्ट्रभाषा होने का गौरव पाने वाली हिन्दी भाषा की असली तस्वीर यह है कि उस भाषा में मिले सम्मान का बखान भी दूसरी भाषा की बैसाखी के सहारे किया जा रहा है

हिन्दी दिवस मनाने का ख़ुमार फिर चढ़ रहा होगा। विद्यालय, कॉलेज, और संगठनों में फिर से हिन्दी के समर्थन में बैनर और पोस्टर तैयार होंगे। हिन्दी चुटकुला प्रतियोगिता और हिन्दी कविता, कहानी और वाद-विवाद के आयोजन भी भरपूर उत्साह से किए जाएँगे। राष्‍ट्रीय-अंतरराष्‍ट्रीय मंचों पर भी हिन्दी का गौरवगान इन्‍हीं शब्दों से किया जाएगा और वक्ता भी हिन्दी प्रेम से फूल जाएँगे, लेकिन फिर से हिन्दी के नाम अपने सम्मान के लिए अगला हिन्दी दिवस आने तक की प्रतीक्षा भर रह जाएगी

इतिहास के अध्यायों में तो हिन्दी का जन्म 5000 ई.पू. बताया गया है। अँग्रेज़ी और हिन्दी दोनों भाषाओं को इंडो-यूरोपियन पैरेंट लैंग्वेज का हिस्सा माना जाता है। अँग्रेजों ने भी भारत में लगभग 200 सालों तक सियासत की और ज़ाहिर तौर पर अँग्रेज़ियत की छाप भी भारत पर पड़ी, किंतु ये हिन्दी भाषा की समृद्धता ही थी जो इन सबके बावजूद उसका मूल स्वरूप बरकरार रह सका

हिन्दी यूँ तो भारत की ही भाषा है किंतु फिर भी यहाँ उससे सौतेला व्यवहार करना ही सफलता का सूत्र बन गया है। अब यह भाषा ‘मा’ की गद्दी से उठाकर ‘मौसी' की गद्दी पर विराजित कर दी गई है। अँग्रेज़ी के बाद दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा को विश्वभर में क़रीब 50 करोड़ लोग बोलते हैं। हिन्दी को समझने वालों की संख्या भी 80 करोड़ के लगभग है। इन आँकड़ों के होने पर भी यह हिन्दी की अनदेखी का ही परिणाम है कि इसे अब तक संयुक्त राष्‍ट्र की आधिकारिक भाषा होने का गौरव नहीं मिल सका है।
हिन्दी डे
ओह! हाय मॉम आई एम बैक फ़्राम द स्कूल। हाऊ शुड आई टेल यू, इट वॉस ए लॉन्ग टायरिंग डे मॉम। एंड यू नो आई हेव वन टुडेज़ ‘हिन्दी डे' डिबेट कॉम्पिटिशन। ये बर्गरयुगी भाषा है दुनिया के दूसरे सबसे अधिक आबादी वाले देश के युवा की।


26 जनवरी 1965 को हिन्दी भारत की आधिकारिक भाषा तो बन गई, लेकिन फिर भी यह ससम्मान आमजन की भाषा नहीं बन पाई। आलम यह है कि आज हमें हिन्दी ठीक से आए न आए, अँग्रेज़ी में ''हाय, हैलो! आई एम फ़ाइन'' कहते ज़रूर आना चाहिए। यह हिन्दी दिवस का उत्सव अँग्रेज़ी या किसी अन्य भाषा के अपमान के लिए बिलकुल नहीं है। इसे तो एक प्रयास माना जाए हिन्दी को उसके उचित शीर्ष स्थान पर सर्वसम्मति से काबिज़ करने का।
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