मुख्य पृष्ठ > विविध > रोमांस > इजहार-ए-इश्क
सुझाव/प्रतिक्रियामित्र को भेजियेयह पेज प्रिंट करें
 
क्‍या आप मेरे साथ बूढ़ी होंगी...
वैसे अभी विनोद भाई का बैंड बजने की बारी थी। स्‍कूल में शुभांगचाहनवालोउनकभाईगिरखाअसनहीडारहथीउनकइजहाबानहीपहुँपाती, लेकिन आँखों कइशाररहथेइधशुभांगमैडसबकुअच्‍रहथा्‍यासाभी बड़निरालहोतहैइजहाकरबेशर्म, लुच्चा, लफंगनहीकरभोंदूउसकनाजो-अदपूरकैंपमिटनतैयाथा, लेकिविनोभा्‍याआत्‍यानिकादेताविनोभाशुभांगअपनप्रति सॉफ्कॉर्नबारमेसबकबतरखथाइसे बताने कपीछकारथे - पहला, चाहनवालअपनशुभांग्‍यानिकादूसरा, ‘शुभांगी कभाप्रति सॉफ्कॉर्न’, इसलिि कहीइजहानकामिलइज्‍फालूदा न बने

इधर वक्‍त गुजर रहा था और सबकुछ विनोद भाई के हाथ से फिसल रहा था। साथ के लड़कों से इजहार करने के कई तरीके पूछे। तरीके भी तमाम मिले- किसी ने फूल के साथ गुलाबी रंग के लेटर पैड पर सेंट छिड़कर प्रेम-पत्र लिखने की सलाह दी तो किसी ने ‘बोल दे खुल्‍लम खुल्‍ल’ स्‍टाइल अपनाने को कहा। किसी ने सड़क पर मोटे-मोटे अक्षरों में बड़े से तीर वाले दिल के बीच अपना और उसका नाम लिखने की सलाह दी।

  इजहार करो तो बेशर्म, लुच्चा, लफंगा और नहीं करो तो भोंदू। उसकी हर नाजो-अदा पर पूरा कैंपस मिटने को तैयार था, लेकिन विनोद भाई का ध्‍यान आते ही ख्‍याल मन से निकाल देता। विनोद भाई ने भी शुभांगी के अपने प्रति सॉफ्ट कॉर्नर के बारे में सबको बता रखा था।      
बहरहाल, चूँकि ‘भा’ उम्र में भी बड़े थे, तो उन्‍होंने बिना कुछ कहे बस मन में ठान लिया किया कि अगले दिन इजहार-ए-मोहब्‍बत करेंगे। फुटपाथ से तमाम सजने-सँवरने के सामान और एसेसरीज खरीदी, साथ ही शेरो-ओ-शायरी वाली किताब भी। ताकि इजहार में वजन आ सके और बात गहरा असर भी करे।

रात करवट बदलते हुए बीती। शुभांगी से बात करने का होमवर्क भी इस बीच कर लिया। कपड़े वगैरह की सारी तैयारी रात में कर ली। घबराहट के मारे सुबह नींद भी जल्‍दी खुल गई। अब करने के लिए भी कुछ नहीं बचा था। घबराहट ऐसी की सारे ‘जरूर’ काम दो-दो बार कर लिए

सुबह हुई। कॉलेज पहुँचे। शुभांगी दिखी। इधर धुकधुकी भी बढ़ी। भारी कदम और रात के होमवर्क को याद करते हुए ‘भा’ पास पहुँचे। उनकी दी हिदायत के मुताबिक उस वक्‍त वहाँ कोई नहीं था। भाई और शुभांगी के बीच क्‍या-क्‍या बातें हुईं, बता नहीं सकता, लेकिन इसके बाद विनोद भाई काफी गंभीर हो गए। शुभांगी के हाव-भाव में काफी बदलाव आ गया और हमारी बैचेनी भी बढ़ने लगी। क्‍या शुभांगी भाई से डर गई, क्‍या भाई को उसने दुत्‍कार दिया ?...

इधर भाई से इस सिलसिले में पूछने की किसी में हिम्‍मत नहीं हुई, उधर शुभांगी से बाकी लोगों ने भाई को मिले संभावित जवाब की आशंका में दूरी बना ली। भाई बड़े होने के बाद भी हम लोगों से काफी हिले मिले थे। काफी दिनों बाद एक दिन उनका मिजाज देखकर उनके इस गंभीर रवैए के बारे में जानने के लिए उन्‍हें कुरेदना शुरू किया। पहले तो भाई ने टाल दिया और उनकी मुस्‍कुराहट देखकर बात बढ़ाने का साहस भी होता गया।

काफी कुरेदने के बाद उन्‍होंने बताया कि उस दिन शुभांगी से उन्‍होंने कहा था कि ‘क्‍या आप मेरे साथ बूढ़ा होना पसंद करेंगइस पर शुभांगी ने उनके इजहार करने के तरीके की सराहना की और आँखों से हामी का संकेत देकर चली गई।
<< 1 | 2 
और भी
प्रेम की भाषा हर कोई जाने !
थोड़ा इंतजार का मजा लीजिए
सचमुच एक नशा है चुंबन
'जो जाके मन में बसै...'
प्यार की उम्र नहीं होती
धीरे-धीरे प्यार को बढ़ाना है