जीतना चाहते हैं लोकसभा चुनाव तो अपनाएं श्रीकृष्ण की ये 10 कारगर नीतियां

krishna niti
वर्तमान में लोकसभा चुनाव और भारत की राजनीति में झूठ, फरेब, हिंसा, भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, धरना, आंदोलन और तमाम तरह के वे आपराधिक नुस्खे, जिससे धन और सत्ता पर काबिज हुआ जा सके, प्रचलित हैं। धर्म, जाति, राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच सत्ता का संघर्ष जारी है। ऐसे में सही क्या है और गलत क्या है, यह तय करना जरूरी है। दरअसल वह व्यक्ति ही सही है, जो धर्म, सत्य और न्याय के साथ है।

के में श्रीकृष्ण ने धर्म का साथ दिया था। धर्म अर्थात सत्य, न्याय और ईश्‍वर। सत्य किधर है? यह सोचना जरूरी है। भारत के अधिकतर मतदाता यह नहीं समझ पाते हैं। हमने देखा है कि वे अ‍पराधिक रिकॉर्ड रखने वालों को भी वोट देते हैं और जिसने उन्हें लूटा है, उसे वह फिर से सत्ता में बैठा देते हैं। ऐसे में जो सही नेता, राजनीतिज्ञ या दल है, वह ठगा-सा खड़ा रह जाता है। भारत की जनता अपना मत किसे व कब दे दे, कुछ समझ में नहीं आता। खैर...

महात्मा गांधी की नीति के अनुसार साध्य और साधन दोनों ही शुद्ध होना चाहिए अर्थात यह कि आपका उद्देश्य सही है तो उसकी पूर्ति करने के लिए भी सही मार्ग या विधि का उपयोग ही करना चाहिए। चाणक्य की नीति के अनुसार यदि उद्देश्य सही है, सत्य और न्याय के लिए है तो साधन कुछ भी हो, इससे फर्क नहीं पड़ता। चाणक्य ने यह नीति संभवत: महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण से ही सीखी होगी। हालांकि श्रीकृष्ण की नीति को कोई नहीं समझ पाया है।

भगवान श्रीकृष्ण पांडवों के साथ क्यों थे? क्योंकि पांडव अपनी जगह सही थे। पांडवों के साथ वे इसलिए नहीं थे कि वे उनकी बुआ कुंती के पुत्र थे। दरअसल, दुर्योधन भी श्रीकृष्ण का रिश्तेदार ही था। श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने दुर्योधन की पुत्री से प्रेम विवाह किया था और बलराम का दुर्योधन के परिवार से गहरा संबंध था। लेकिन श्रीकृष्‍ण पांडवों के साथ ही थे। पांडवों की सेना से कई गुना शक्तिशाली थी दुर्योधन की सेना। उस सेना में खुद श्रीकृष्ण की नारायणी सेना भी शामिल थी। इसके अलावा कौरवों की सेना में कई वीर योद्धा, जैसे भीष्म, द्रोण, कर्ण और अश्वत्थामा शामिल थे। यह जानकर भी कि पांडवों की सेना बहुत कमजोर है, फिर भी कृष्ण ने पांडवों का साथ दिया।

भीष्म ने युद्ध के कुछ नियम बनाए थे। श्रीकृष्ण ने युद्ध के नियमों का तब तक पालन किया, जब तक कि अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसाकर उसे युद्ध के नियमों के विरुद्ध निर्ममता से मार नहीं दिया गया। अभिमन्यू श्रीकृष्ण का भांजा था। श्रीकृष्ण ने तब ही तय कर लिया था कि अब युद्ध में किसी भी प्रकार के नियमों को नहीं मानना है। तब शुरू हुआ श्रीकृष्ण का कूटनीतिक खेल... और वे इसी समय का इंतजार कर भी रहे थे।

उन्होंने भीष्म के आगे शिखंडी को खड़ा करके उन्हें मृत्युशैया पर लेटा दिया। भीष्म ने कसम खाई थी कि मैं किसी स्त्री या स्त्रीस्वरूपा से युद्ध नहीं लड़ूंगा। शिखंडी के पीछे से अर्जुन ने तीर चलाए और भीष्म का शरीर छलनी कर दिया। कौरवों का एक सबसे बड़ा योद्धा भूमि पर गिर पड़ा था। फिर उन्होंने युद्ध में यह अफवाह फैला दी की अश्वत्थामा मारा गया। द्रोण ने श्रीकृष्ण से कहा कि मैं नहीं मानता कि मेरा पुत्र अश्वत्थामा मारा जा सकता है? यदि युधिष्ठिर कहेंगे तो मैं मान लूंगा। तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि तुम कह तो कि अश्‍वत्थामा मारा गया।

चूंकि युधिष्ठिर सत्यवादी व्यक्ति थे तो उन्होंने इससे इंकार कर दिया। ऐसे में श्रीकृष्ण ने भीम से कहा कि तुम उस हाथी को मार दो जिसका नाम अश्‍वत्‍थामा है। भीम ने ऐसा ही किया। तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि अब तुम जोर से कहो कि अश्‍वत्‍थामा मारा गया और धीरे से कहना कि वह गज है। युधिष्ठिर ने ऐसा ही कहा।


जब युधिष्ठिर ने गज कहा तभी श्रीकृष्ण ने अपना शंख बजाकर विजयी हर्ष किया। शंख की इस ध्वनि में द्रोणाचार्य गज नहीं सुन पाए और वे निराश होकर युद्धभूमि पर अस्त्र और शस्त्र त्यागकर बैठ गए। बस इसी मौके का लाभ उठाकर द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्न ने खड्ग से द्रोणाचार्य का सिर काट दिया।

जब कर्ण और अर्जुन का युद्ध चल रहा था तब श्रीकृष्ण रथ को भगाकर ऐसी जगह ले गए, जहां कीचड़भरा एक गड्ढा था। कर्ण का रथी भी उनके पीछे रथ लेकर भागा और वह देख नहीं पाया कि एक गड्ढा है। बस उसी में कर्ण के रथ का पहिया धंस गया। वह पहिया निकालने के लिए अस्त्र शस्त्र त्यागकर नीचे उतरा और पहिया निकालने लगा। कृष्‍ण ने अर्जुन से कहा कि यही उचित मौका है।


अर्जुन ने कहा कि यह तो नियम विरुद्ध है। तब कृष्‍ण ने कहा कि सत्य के लिए नियमों की परवाह नहीं करते। यदि तुम हार गए तो सत्य भी हार जाएगा। अर्जुन ने तब तीर चलाकर कर्ण का सिर धड़ से अलग कर दिया। इसी तरह श्रीकृष्‍ण ने युद्ध से पहले और युद्ध में ऐसे कई कार्य किए जिसके चलते पांडव महाभारत का युद्ध जीत गए थे।

श्रीकृष्ण ने वचन दिया था कि मैं युद्ध में किसी भी प्रकार का अस्त्र या शस्त्र नहीं उठाऊंगा। उन्होंने यह भी वचन दिया था कि मैं पांडवों को जीत दिलाऊंगा। लेकिन जब उन्होंने देखा कि भीष्म युद्ध में कोहराम मचा रहे हैं और पांडव सेना का संहार कर रहे हैं, अर्जुन उनका सामना करने में अक्षम था तब श्रीकृष्ण ने भीष्म को शांत करने के लिए रथ का पहिया उठा लिया और वे भीष्म पर फेंकने लगे। तभी भीष्म ने अपने धनुष और बाण एक ओर रखकर हाथ जोड़कर कहा, आपने तो वचन दिया था कि युद्ध में कोई शस्त्र नहीं उठाऊंगा और आप तो भगवान हैं और आप अपना वचन कैसे तोड़ सकते हैं?

तब श्रीकृष्ण ने कहा, हे भीष्म आप तो स्वयं ज्ञानी हैं। आप कभी अपना वचन या प्रतिज्ञा नहीं तोड़ते तभी तो आपका नाम भीष्म है। लेकिन शायद आप नहीं जानते हैं कि मेरे लिए धर्म और सत्य की रक्षा करना अपनी प्रतिज्ञा से भी ज्यादा बढ़कर है। आप अपनी प्रतिज्ञा और वचन पर अटल हैं लेकिन आप अपनी प्रतिज्ञा निभाने के चक्कर में अधर्म का साथ दे रहे हैं।


अब सवाल यह उठता है कि कृष्ण की नीति को हम वर्तमान संदर्भ में कैसे राजनीति और लोकसभा चुनाव के मद्देनजर रखकर देखें? यहां यह कहना जरूरी होगा कि महाभारत काल से आज तक युद्ध के मैदान और खेल बदलते रहे लेकिन युद्ध में जिस तरह से छल-कपट का खेल चलता आया है, उसी तरह का खेल आज भी जारी है। ऐसे में सत्य को हर मोर्चों कर कई बार हार का सामना करना पड़ता है, क्योंकि हर बार सत्य के साथ कोई कृष्‍ण साथ देने के लिए नहीं होते हैं। ऐसे में कृष्ण की नीति को समझना जरूरी है।

1. जब दुश्मन शक्तिशाली हो तो उससे सीधे लड़ाई लड़ने की बजाय कूटनीति से लड़ना चाहिए। भगवान कृष्ण ने कालयवन और जरासंध के साथ यही किया था। उन्होंने कालयवन को मु‍चुकुंद के हाथों मरवा दिया था, तो जरासंध को भीम के हाथों। ये दोनों ही योद्धा सबसे शक्तिशाली थे लेकिन कृष्ण ने इन्हें युद्ध के पूर्व ही निपटा दिया था। दरअसल, सीधे रास्‍ते से सब पाना आसान नहीं होता। खासतौर पर तब जब आपको विरोधि‍यों का पलड़ा भारी हो। ऐसे में कूटनीति का रास्‍ता अपनाएं।

2. युद्ध में संख्या बल महत्व नहीं रखता, बल्कि साहस, नीति और सही समय पर सही अस्त्र एवं व्यक्ति का उपयोग करना ही महत्वपूर्ण कार्य होता है। पांडवों की संख्या कम थी लेकिन कृष्ण की नीति के चलते वे जीत गए। उन्होंने घटोत्कच को युद्ध में तभी उतारा, जब उसकी जरूरत थी। उसका बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उसके कारण ही कर्ण को अपना अचूक अस्त्र अमोघास्त्र चलाना पड़ा जिसे वह अर्जुन पर चलाना चाहता था।

3. जो राजा या सेनापति अपने एक-एक सैनिक को भी राजा समझकर उसकी जान की रक्षा करता है, जीत उसकी सुनिश्‍चित होती है। एक-एक सैनिक की जिंदगी अमूल्य है। अर्जुन सहित पांचों पांडवों ने अपने साथ लड़ रहे सभी योद्धाओं को समय-समय पर बचाया है। जब वे देखते थे कि हमारे किसी योद्धा या सैनिक पर विरोधी पक्ष का कोई योद्धा या सैनिक भारी पड़ रहा है तो वे उसके पास उसकी सहायता के लिए पहुंच जाते थे।

4. जब आपको दुश्मन को मारने का मौका मिल रहा है, तो उसे तुरंत ही मार दो। यदि वह बच गया तो निश्चित ही आपके लिए सिरदर्द बन जाएगा या हो सकता है कि वह आपकी हार का कारण भी बन जाए। अत: कोई भी दुश्मन किसी भी हालत में बचकर न जाने पाए। कृष्ण ने द्रोण और कर्ण के साथ यही किया था।


5. कोई भी वचन, संधि या समझौता अटल नहीं होता। यदि उससे राष्ट्र का, धर्म का, सत्य का अहित हो रहा हो तो उसे तोड़ देना ही चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने अस्त्र न उठाने की अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर धर्म की ही रक्षा की थी।

6. युद्ध प्रारंभ होने से यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि कौन किसकी ओर है? कौन शत्रु और कौन मित्र है? इससे युद्ध में किसी भी प्रकार की गफलत नहीं होती है। लेकिन फिर भी यह देखा गया था कि ऐसे कई योद्धा थे, जो विरोधी खेमे में होकर भीतरघात का काम करते थे। ऐसे लोगों की पहचान करना जरूरी होता है।


7. युद्ध में मृत सैनिकों का दाह-संस्कार, घायलों का इलाज, लाखों सैनिकों की भोजन व्यवस्था और सभी सैनिकों के हथियारों की आपूर्ति का इंतजाम बड़ी ही कुशलता से किया गया था। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह सभी कार्य श्रीकृष्ण की देखरेख और उनकी नीति के तहत ही होता था।

8. इस भयंकर युद्ध के बीच भी श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया। यह सबसे अद्भुत था। कहने का तात्पर्य यह कि भले ही जीवन के किसी भी मोर्चे पर व्यक्ति युद्ध लड़ रहा हो लेकिन उसे ज्ञान, सत्संग और प्रवचन को सुनते रहना चाहिए। यह मोटिवेशन के लिए जरूरी है। इससे व्यक्ति को अपने मूल लक्ष्य का ध्यान रहता है।


9. भगवान श्रीकृष्ण ने जिस तरह युद्ध को अच्छे से मैनेज किया था, उसी तरह उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को भी मैनेज किया था। उन्होंने हर एक प्लान मैनेज किया था। यह संभव हुआ अनुशासन में जीने, व्यर्थ चिंता न करने और भविष्य की बजाय वर्तमान पर ध्यान केंद्रित करने से। मतलब यह कि यदि आपके पास 5, 10 या 15 साल का कोई प्लान नहीं है, तो आपकी सफलता की गारंटी नहीं हो सकती।

10. कृष्‍ण सिखाते हैं कि संकट के समय या सफलता न मिलने पर साहस नहीं खोना चाहिए। इसकी बजाय असफलता या हार के कारणों को जानकर आगे बढ़ना चाहिए। समस्याओं का सामना करें। एक बार भय को जीत लिया तो फि‍र जीत आपके कदमों में होगी।


भारत में धर्म, राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच जनता खुद को एक चौराहे पर खड़ी पाती है। ऐसे में भारत में वैचारिक संघर्ष के साथ ही राजनीतिक संघर्ष जारी है। कई ऐसे लोग, दल और संगठन हैं, जो कि भारत को पुन: स्थापित करने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

भारत को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं या कि जो भारत को शक्तिशाली बनाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में कुछ नेता और दल ऐसे भी हैं, जो भारत को नीचे गिराकर उसके टुकड़े करने के सपने भी देख रहे हैं, क्योंकि उनकी राजनीति धर्म और जातियों के विभाजन करने पर ही टिकी हुई है। इस बार का लोकसभा चुनाव धर्म, सत्य और न्याय की रक्षा का चुनाव है। जनता को चुनना है कि सत्य क्या है?



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