गांडीव धनुष और अक्षय तरकश का रहस्य जानकर चौंक जाएंगे

के युद्ध में पांडव पुत्र के पास गांडीव नाम का एक दिव्य था और एक ऐसा तरकश था जिसके कभी खत्म नहीं होते थे। इसे कहते थे। अब सवाल यह उठता है कि कुरुक्षेत्र के युद्ध के पहले अर्जुन के पास कैसे आया ये चमत्कारिक ? इस संबंध में हमें दो पौराणिक कथाएं मिलती हैं। पढ़िए दोनों कथाएं।

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पहली कथा :
कौरव और पांडवों के बीच जब राज्य बंटवारे को लेकर कलह चली, तो मामा शकुनि की अनुशंसा पर धृतराष्ट्र ने खांडवप्रस्थ नामक एक जंगल को देकर पांडवों को कुछ समय तक के लिए शांत कर दिया। पांडवों के समक्ष अब उस जंगल को एक नगर बनाने की चुनौती थी। यमुना नदी के किनारे एक बीहड़ वन था जिसका नाम था। पहले इस जंगल में एक नगर हुआ करता था, फिर वह नगर नष्ट हो गया और उसके खंडहर ही बचे थे। खंडहरों के आसपास वहां जंगल निर्मित हो गया था।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को खांडव वन ले जाते हैं और वहां वे उस वन खंडहरों को दिखाते हैं। अर्जुन ने पूछा कि हम इसे कैसे अपनी राजधानी बनाएंगे? तब श्रीकृष्ण विश्वकर्मा का आह्‍वान करते हैं। विश्‍वकर्मा प्रकट होकर कहते हैं कि हे प्रभु, इस खांडवप्रस्थ में ने नगर बसाया था, जो आज खंडहर हो चुका है। मयासुर यहां के चप्पे-चप्पे को जानता है, तो क्यों नहीं आप उसी से राजधानी बनाने का कहते हैं?

तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस वक्त मयासुर कहां मिलेंगे? फिर विश्‍वकर्मा मयासुर का स्मरण करते हैं, तो वे प्रकट होकर पूछते हैं कि हे प्रभु, आपने मुझे क्यों याद किया? तब विश्वकर्मा कहते हैं कि ये श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं और ये यहां एक नगर का निर्माण करना चाहते हैं। यह सुनकर मयासुर अतिप्रसन्न होता है और वह श्रीकृष्ण, अर्जुन एवं विश्वकर्मा को एक खंडहर में ले जाता है। खंडहर में एक रथ रखा होता।

मयासुर कहता है कि हे श्रीकृष्ण, यह सोने का रथ पूर्वकाल के महाराजा सोम का रथ है। यह आपको आपकी मनचाही जगह पर ले जाने के लिए समर्थ है...। उस रथ में एक गदा रखी होती है जिसे दिखाते हुए मयासुर कहता है कि ये कौमुद की गदा है जिसे पांडव पुत्र भीम के अलावा और कोई उठा नहीं सकता है। इसके प्रहार की शक्ति अद्भुत है। गदा दिखाने के बाद मयासुर कहता है कि यह है। यह अद्भुत और दिव्य धनुष है। इसे दैत्यराज वृषपर्वा ने भगवान शंकर की आराधना से प्राप्त किया था।

भगवान श्रीकृष्ण उस धनुष को उठाकर अर्जुन को देते हुए कहते हैं कि इस दिव्य धनुष पर तुम दिव्य बाणों का संधान कर सकोगे। इसके बाद मयासुर अर्जुन को अक्षय तरकश देते हुए कहता है कि इसके बाण कभी समाप्त नहीं होते हैं। इसे स्वयं अग्निदेव ने दैत्यराज को दिया था। इस बीच विश्‍वकर्मा कहते हैं कि आज से इस समस्त संपत्ति के आप अधिकारी हो गए हैं पांडुपुत्र। अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मयासुर, तुम्हारी इस कृपा का हम प्रतिदान तो नहीं दे सकते लेकिन हम वचन देते हैं कि जब भी तुम हमें संकट काल में स्मरण करोगे, तो मैं और अर्जुन तुरंत ही वहां पहुंच जाएंगे। मयासुर यह सुनकर प्रसन्न हो जाता है। बाद में विश्‍वकर्मा और मयासुर मिलकर इन्द्रप्रस्थ नगर को बनाने का कार्य करते हैं।

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दूसरी कथा :
पौराणिक कथाओं के अनुसार एक ऐसा धनुष, तीर और तरकश है जिसका कभी नाश नहीं हो सकता। यह तीर चलाने के बाद पुन: व्यक्ति के पास लौट आता है और तरकश में कभी तीर या बाण समाप्त नहीं होते। सबसे पहले ऐसा ही एक तीर राजा बलि के पास था।


भृगुवंशियों ने राजा बलि से विश्‍वजीत के लिए एक यज्ञ करवाया। उस यज्ञ से अग्निदेव प्रकट हुए और उन्होंने राजा बलि को सोने का दिव्य रथ, घोड़े एवं दिव्य धनुष तथा दो अक्षय तीर दिए। प्रहलाद ने कभी न मुरझाने वाली दिव्य माला दी और शुक्राचार्य ने दिव्य शंख दिया। इस प्रकार दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर राजा बलि ने इन्द्र को पराजित कर दिया था। राजा बलि इन दिव्य धनुष और बाण की बदौलत तीनों लोकों पर राज करने लगा था।

उसी तरह की एक कथा है कि श्वैतकि के यज्ञ में निरंतर 12 वर्षों तक घृतपान करने के बाद अग्निदेव को तृप्ति के साथ-साथ अपच भी हो गया। तब वे ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने कहा की यदि वे खांडव वन को जला देंगे, तो वहां रहने वाले विभिन्न जंतुओं से तृप्त होने पर उनकी अरुचि भी समाप्त हो जाएगी। अग्निदेव ने कई बार प्रयत्न किया किंतु इन्द्र ने तक्षक नाग तथा जानवरों की रक्षा हेतु खांडव वन नहीं जलाने दिया। अग्नि पुन: ब्रह्मा के पास पहुंचे।

ब्रह्मा से कहा कि अर्जुन तथा कृष्ण खांडव वन के निकट बैठे हैं, उनसे प्रार्थना करें। तब अग्निदेव ने दोनों से भोजन के रूप में खांडव वन की याचना की। अर्जुन के यह कहने पर भी कि उसके पास वेग वहन करने वाला कोई धनुष, अमित बाणों से युक्त तरकश तथा वेगवान रथ नहीं है। अग्निदेव ने वरुणदेव का आवाहन करके गांडीव धनुष, अक्षय तरकश, दिव्य घोड़ों से जुता हुआ एक रथ (जिस पर कपि ध्वज लगी थी) लेकर अर्जुन को समर्पित किया। बाद में अग्निदेव ने कृष्ण को एक चक्र समर्पित किया।

तदनंतर अग्निदेव ने खांडव वन को सब ओर से प्रज्वलित कर दिया। इन्द्र सहित सभी देवता खांडव वन को बचाने के लिए आए लेकिन उनका सामना कृष्ण और अर्जुन से हुआ। अंततोगत्वा सभी हार गए। खांडव वनदाह से तक्षक नाग, अश्वसेन, मयासुर तथा चार शांगर्क नामक पक्षी बच गए थे। इस वनदाह से अग्निदेव तृप्त हो गए तथा उनका रोग भी नष्ट हो गया।


किसने, किससे और क्यों बनाया था यह धनुष और तरकश?
वत्तासुर नाम का एक दैत्य था जिसका संपूर्ण धरती पर आतंक था। उसके आतंक का सामना करने के लिए दधीचि ऋषि ने देशहित में अपनी हड्डियों का दान कर दिया था। उनकी हड्डियों से 3 धनुष बने- 1. गांडीव, 2. पिनाक और 3. सारंग। इसके अलावा उनकी छाती की हड्डियों से इन्द्र का वज्र बनाया गया। इसी सभी दिव्यास्त्रों को लेकर वत्तासुर के साथ युद्ध किया और उसका वध कर दिया गया था।

कहते हैं कि इन्द्र ने यह वज्र कर्ण को दे दिया था। पिनाक शिव के पास था जिसे रावण ने ले लिया था। रावण से यह परशुराम के पास चला गया। परशुराम ने इसे राजा जनक को दे दिया था। राजा जनक की सभा में श्रीराम ने इसे तोड़ दिया था। सारंग विष्णु के पास था। विष्णु से यह राम के पास गया और बाद में श्रीकृष्ण के पास आ गया था। कहते हैं कि गांडीव अग्निदेव के पास था जिसे अर्जुन ने ले लिया था। हालांकि उपरोक्त कथा अनुसार गांडीव धनुष मयासुर के द्वारा मिला था। इस तरह हमें दो तरह की कथाएं प्राप्त हुईं।

एक अन्य कथा : कहते हैं कि कण्व ऋषि कठोर तप कर रहे थे। तपस्या के दौरान उनका शरीर दीमक द्वारा बांबी बना दिया गया था। बांबी और उसके आसपास की मिट्टी के ढेर पर सुंदर गठीले बांस उग आए थे। जब कण्व ऋषि की तपस्या पूर्ण हुई, तब तब ब्रह्माजी प्रकट हुए। उन्होंने उन्हें अनेक वरदान दिए और जब जाने लगे तो ध्यान आया कि कण्व की मूर्धा पर उगे हुए बांस कोई सामान्य नहीं हो सकते तथा इसका सदुपयोग करना चाहिए।

तब ब्रह्माजी ने उसे काटकर विश्वकर्मा को दे दिया और विश्वकर्मा ने उससे 3 धनुष बनाए- 1. पिनाक, शार्ङग और गाण्डीव। इन तीनों धनुषों को ब्रह्माजी ने भगवान शंकर को समर्पित कर दिया। इसे भगवान शंकर ने इन्द्र को दे दिया। इस तरह इंद्र के पास पिनाक धनुष फिर परशुराम और फिर बाद में राजा जनक के पास पहुंच गया। जनक की सभा में इसे श्रीराम ने तोड़ दिया था। दूसरी ओर गा‍ण्डीव धनुष वरुणदेव के पास पहुंच गया। वरुणदेव से यह धनुष अग्निदेव के पास और अग्निदेव से यह धनुष अर्जुन ने ले लिया था। शारंग या शार्ङग धनुष विष्णु के पास था जो कालांतर में चलते हुए श्रीकृष्ण के पास पहुंच गया।
गांडीव धनुष : कहते हैं कि गांडीव धनुष अलौकिक था। यह धनुष वरुण के पास था। वरुण ने इसे अग्निदेव को दे दिया था और अग्निदेव से अर्जुन को प्राप्त हुआ था। यह धनुष देव, दानव तथा गंधर्वों से अनंत वर्षों तक पूजित रहा था। वह किसी शस्त्र से नष्ट नहीं हो सकता था तथा अन्य लाख धनुषों का सामना कर सकता था।
जो भी इसे धारण करता था उसमें शक्ति का संचार हो जाता था।


अक्षय तरकश : अर्जुन के अक्षय तरकश के बाण कभी समाप्त नहीं होते थे। गति को तीव्रता प्रदान करने के लिए जो रथ अर्जुन को मिला, उसमें अलौकिक घोड़े जुते हुए थे जिसके शिखर के अग्र भाग पर हनुमानजी बैठे थे और शिखर पर कपि ध्वज लहराता था। इसी के साथ उस रथ में अन्य जानवर विद्यमान थे, जो भयानक गर्जना करते थे।


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