प्रेम के अतिरिक्त अमृत नहीं

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प्यारी दुलारी,

प्रेम। तेरा पत्र।
इतनी से भरी बातें तूने लिखी है कि एक-एक शब्द मीठा हो गया है। क्या तुझे पता है कि जीवन में प्रेम के अतिरिक्त न कोई मिठास है, न कोई सुवास है? शायद प्रेम के अतिरिक्त और कोई अमृत नहीं है! काँटों में भी जो फूल खिलते हैं- वे शायद प्रेम से ही खिलते हैं।

और मृत्यु से घिरे जगत में जो जीवन का संगीत जन्मता है- वह शायद प्रेम से ही जन्मता है। लेकिन, आश्चर्य है तो यही कि अधिकतम लोग बिना प्रेम के ही जिए चले जाते हैं। निश्चित ही उनका जीवन जीवित-मृत्यु ही हो सकता है।
मैं यह जानकर आनंदित हूँ कि तू प्रेम के मंदिर के निकट पहुँच रही है। प्रेम की गहराइयों में उतर जाना ही प्रार्थना है। और प्रेम में पूर्णतया खो जाना ही प्रभु को पा लेना है।

रजनीश के प्रणाम
30/06/1968

साभार : ढाई आखर प्रेम का
जीवन जागृति केंद्र प्रकाशन

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