उजले दाँतों वाली हँसी

डायरी

WD|
सत्यनारायण

06.04.1996
आज इतने सालों बाद भी तुम्हारे साथ की गई बातें ज्यों की त्यों याद हैं। ऐसे लगता है जैसे वह एक कालखंड ईश्वर के साथ की गई बातों का था। क्योंकि ईश्वर से भी तो हम यही चाहते हैं कि उसका स्मरण हमें सुख दे। फिर ईश्वर तो कल्पना मात्र है उसे किसी ने देखा नहीं होता।

जबकि मैंने तुम्हें सिर्फ देखा ही नहीं खूब बातें की हैं, साथ घूमा भी हूँ। उन बातों को याद करके, उन जगहों पर जाकर जहाँ हम घूमे थे, मुझे आज भी उतना ही सुख मिलता है। इसीलिए जयपुर मुझे तुम्हारी तरह खूब याद आता है तो सिर्फ इसलिए कि उन जगहों को मैं आज भी छू सकता हूँ, देख सकता हूँ, जो हमारे उस छोटे से सांझा सुख की साक्षी हैं।

21.10.1996 समूची देह और मन प्रेम से लबरेज। सजीद। पारदर्शी। एक ऐसी खिलखिलाहट जिसके लिए मैं तरसता रहा हूँ। अपनी ही वेदना से लिथड़ा। कथा का आदी मैं जब-जब वह आती है एकटक देखता रहता हूँ। उसकी अनुपस्थिति में भी। जैसे वह अभी आएगी... वही खिलखिलाहट। वही उल्लास। जो मेरे आसपास छोड़ गई है। जीवंत हो उठेंगे फिर। किसी भी धूप से परे।
08.11.1996
तुम मेरे लिए एक ऐसी हरी लतर, एक ऐसी बावली चिड़िया जो मेरे भीतर के तमाम अँधेरे सूखे कोनों को हरा करती हुए इस तरह चहचहायी कि मैं खुद बावला हो उठा। तुम्हारे इस जंगल में भटकने के लिए।

11.12.1996
प्रेम मेरे लिए कभी खत्म न होने वाली एक लंबी प्रार्थना की तरह है।
11.03.1998
मैं चाहता था वह मेरी सब सुने। कुछ ऐसी जो मैं अब तक नहीं कह पाया। मैं चाहता था उसके पास बैठकर रोऊँ जो अब तक नहीं रो पाया। मैं चाहता था यहाँ से इस तरह जाऊँ कि कभी लौटकर नहीं आना पड़े। मैं चाहता था उसके सामने इस तरह चिल्लाऊँ जो जंगल में भी कभी अकेले नहीं चिल्ला सका। मैं चाहता था उसके पास एक बच्चे की तरह बिलखूँ। मैं चाहता था... मैं चाहता था... पर मैं ही चाहता ही रह गया।
21.03.1998
उसकी हँसी की खिलखिल पर मैं देर तक तैरता रहा। उसका हाथ पकड़े देर तक हवा में टहलता रहा। उसके संग बादलों तक गया जो आकाश में धीमे-धीमे टहल रहे थे। उसके साथ बचपन की एक टेकड़ी थी। मेरे पास बचपन की बरसात में बहती एक छोटी-सी नदी। हमने दोनों पार कीं। अब हम सबसे परे थे। जंगल, नदी, टेकड़ी, पहाड़। चाँद के अगल बगल। उसने धीरे से कुछ कहा। मैंने घूमकर देखा। मैंने कुछ कहा, उसने मुड़कर मेरी तरफ देखा। उसने कहा, 'मैं जानती थी तुम यह कहोगे। 'मैंने कहा, 'मैं जानता था, तुम यह कहोगी।'
11.04.1998
समूचे चाँद की रात में बिखरी हैं उजली स्मृतियाँ। क्या इस रात उसे याद होगी नीम से झरती चाँदनी और उसमें अटकी स्मृतियों की किरचें। मुझे नहीं मालूम आज की रात ये किरचें उतनी क्यों नहीं गड़ रही जितनी पिछले पूरे चाँद की रात गड़ रही थी। शायद वह जल्दी सो गई होगी। उसे पता भी नहीं होगा कि हर पूरे चाँद की रात मैं उसे कितना याद करता हूँ।
12.04.1998
आँख खुलते ही सुबह सोचा कि उसी के सुख के लिए अब उसे याद नहीं करूँगा और उसकी याद चली आई। आँख बंद करता रहा और वह आती रही। वह पहला दिन जब वह मिली थी और आज का यह दिन आँख क्या सचमुच कभी खुली भी थी।

04.09.1998
मुझे नहीं पता तुम अब कभी आओगी या नहीं पर तुम्हारे स्पर्श की अनुभू‍ति को संजोकर रख लिया है। तुमसे जुड़ी तमाम चीजें भी। रात को जब-जब नींद टूटती है, लगता है कि तुम हो। नींद में लगता है कि घंटी बज रही है। दरवाजा खोलकर देखता हूँ, शायद तुम हो। पड़ोसी चौंकता है - क्या हुआ? कुछ नहीं, लगा घंटी जी।' और मैं फिर सो जाता हूँ।
16.09.1998
उसकी खिलखिलाहट। अरसे बाद। फोन पर थरथराती मेरी आवाज। 'मैं आऊँगी' उसने फोन पर कहा। मैं लटूम लिया इस वाक्य पर। धुर रेगिस्तान में रेत के धोरों पर उगने की आस में डाले रोहिड़े के बीजों की तरह। यह जानते हुए भी कि वह कभी नहीं उगेगा। पर मैं हरिया गया। शाम सब कुछ हरा हरा था।

15.12.1998
'प्रेम में अ‍पवित्र और मैला-कुचैला होना पड़ता है। प्रेम में अपने व्यक्तित्व को झुकाना और छोटा करना पड़ता है, भूलना पड़ता है - इज्जत आबरू, घर-द्वार, कविता-कला, खानपान, जीवन-मरण, ध्येय, उच्चताएँ-महानताएँ सब धूल में मिल जाती हैं। तब मिलता है प्रेम। और आश्चर्यजनक यह कि मिलते ही उसका खोना शुरू हो जाता है। प्रेम क्षणों में ही नवजात, सुंदर और अप्रतिम रहता है। फिर भी उस प्रेम को पाने के लिए होल टाइमर होना पड़ता है।' दूधनाथ सिंह
21.02.1999
प्रेम से डर लगता रहा बराबर। इसलिए नहीं कि मिला नहीं। बल्कि मिला तो इस तरह कि बाथ में भी नहीं भर सका। और मैं खड़ा रहा यों का यों। खाली। तमाम उम्र।

22.02.1999
प्रेम आएगा एक दिन। हमारे तमाम दुख हरता हुआ/रोम-रोम में फैल जाएगी उसकी सुवास। कभी सपने में दिखाई देती उसकी छवि को/बाथ में भर लेंगे सचमुच। पेड़ हवा दरख्त पशु-पक्षियों के संग गुनगुनाते/हम सब पहले जैसे हो जाएँगे/तब कितनी अच्छी होगी यह धरती/अभी-अभी जन्मे बच्चे की तरह/तब बार-बार चूमने की इच्छा होगी/इस धरती को।
26.08.2000
चौतरफा पवित्र और अपनाये से भरी सुबह है। खिल खिल करती उजले दाँतों वाली हँसी है। बिखरे बालों की लट है। इधर-उधर डोलती काया है। तस्वीरों से, किताबों से निकलकर मेरे इस सूने और उजाड़ घर को आबाद करती/और मैं ही नहीं मेरा घर, घर की तमाम चीजें उसकी छुअन से थिरक रही हैं। और मैं मैं उसका हाथ थामकर बार-बार पूछ रहा हूँ कि तुम सचमुच तुम हो या सपना।
और वह रह रहकर खिलखिला उठती है और मैं रह रहकर फिर पूछता हूँ।

12.05.2001
जाने कहाँ से? कितने योजन दूर से आती आवाज। खिलखिलाहट वैसी ही। मैं देर तक तैरता रहा। 'कहाँ हो'? उसने पूछा। 'क्या?' मैं चौंका कि आवाज भी किस तरह बदल जाती है एक घर बदलते ही। जो कल तक सिर्फ मेरे लिए थी। कुँवारी। और आज? मैंने तुरंत पूछा, 'ठीक हो न? अभी रखूँ?' वह जोर से हँसी, यह तो मुझे पूछना चाहिए था क्योंकि मैंने फोन किया और डर मुझे होना चाहिए जबकि डर तुम रहे हो' फिर वही एक खिलखिल। पर जाने मैं क्यों उस पर तैर नहीं सका। न बाथ में भर सका। क्योंकि उसकी हँसी अब पहले की तरह नहीं थी रूई के फाहे सी।
26.05.2001
कभी उसकी हँसी। कभी कोई बाँकपन। कोई एक लट। एक खम्भ। नीला परिधान जिसके बीच वह उस दिन खूबसूरत लग रही थी। कोई बात जिस पर दोनों एक साथ खिलखिलाकर हँसे थे। मन के कैमरे में कैद इस तरह की कई-कई तस्वीरें जो अक्सर दिख जाती हैं रात को मन के डार्क रूम में, जिनका अब कोई प्रिंट नहीं निकाला जा सकता। क्या यह दुखांत नहीं है कि हम देखकर भी देख नहीं पाते, छूकर भी छू। उसे जो कहीं हमारे ही अगल बगल टहल रही होती है।
18.06.2001
एक हँसी, कैसी तो झर-झर झरती। फोन के तारों पर तैरती। मैं देर तक सोचता रहा कि इस तरह कितनी कितनी तो हँसी होगी जो इन तारों परत तैरती जाने कितने कानों को झनझनाती रही होगी। बस थोड़ी-सी देर। फिर कोई कबूतर, कोई चिड़ी, बैठती होगी। तब भी क्या ये ऐसे ही थरथराते होंगे? कैसा तो होता होगा कम्पन उस समय जब कोई हँसी झरती हुई उन कानों तक पहुँचती है जो उसकी बाट देखते जागते रहते हैं। रात-रातभर, पर न बथ में भर पाते हैं और न दोबारा सुन जो अभी-अभी झर रही थी ऐन कानों में।
04.07.2001
इतनी पवित्र और प्रेम पगी हँसी। लौटने के बाद मैं देर तक सोचता रहा। इस खोखली होती दु‍निया को क्या ऐसी ही हँसी नहीं बचाए हुए है। मैंने उससे कहना चाहा कि बरसों बरस हो गए मेरी हँसी तो जाने कब लोप हो गई। बस सिर्फ एक बार हल्की-सी गूँज थी बरसों बरस पहले और मैं लटूम गया। अब तो शायद यह बरसों नहीं जनमों पुरानबात है।

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