मालवी लोकजीवन की दो प्रेम कथाएं

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देवव्रत जोशी
फ़कीर का हुस्न
एक सूफी संत अपने शिष्यों के साथ दुग्ध-धवल चांदनी रात में अपने घर की छत पर ईश्वर आराधना में मग्न थे। कौतुकवश एक नवयुवक भी वहां आया और चुपचाप सत्संग में शामिल हो गया, उसे बड़ा आनंद आया। इतना सुकून, इतनी शांति तो उसे कभी नहीं मिली थी। संत ने भी उसे अपना आशीर्वाद दिया और कहा ‍कि बराबर आया करो।

कुछ दिन बाद अचानक युवक अनुपस्थित रहने लगा। कई सप्ताह, महीने गुजर गए। एक दिन वह आया और उदास मुख, जर्जर शरीर, उखड़े मन से सत्संग में बैठ गया, सबसे पीछे।

गुरु ने देखा और सब कुछ समझ लिया। उसे पास बुलाया। बेटे इतने दिन क्यों नहीं आए। मैंने तो तुम्हारा काफी इंतजार किया... ये दुनिया बड़ी मायावी और दिलकश है। मेरी तरफ देखो' संत ने अपनी दाढ़ी पर हाथ‍ फिराते हुए कहा,' क्या इससे ज्यादा खूबसूरती है कहीं दुनिया में।' युवक संत की भुवन मोहिनी मुस्कान के आगे नत था।

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अगले पन्ने पर, पढ़ें कथा सिंदूर की शुरुआत...

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