बीथोविन के प्रेमपत्र

नग़मा जो साज़ पर गाया न गया

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संगीत के रसिकों में कोई व्यक्ति शायद अपवाद ही होगा जिसने बीथोवन की सिम्फनी सुनी न हो या जिसके दिल के तार ऐसी अलौकिक, अप्रतिम धुन सझनझनाए न हों। बॉन, जर्मनी में 16 सितंबर 1770 को जन्मे लुडविग वेन बीथोवन का बचपन गरीबी, घुमक्कड़ी और संगीत की संगत में बीता। उनके पिता जॉन बीथोवन कोर्ट में प्यानोवादक थे। गरीब, आलसी, लालची, शराबी और झगड़ालू, बात-बेबात बेटे की पिटाई कर देने पर आमादा। हालाँकि उन्होंने संगीत सीखने के मामले में हमेशा बेटे को प्रेरित किया, लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा बहुत सीमित थी। वे चाहते थे, बेटा थोड़ा-बहुत संगीत सीख जाए और कोर्ट में संगीत बजाने का काम शुरू कर दे। उस जमाने में संगीत एक सम्मानजनक पेशा नहीं माना जाता था। लोग या तो कोर्ट में बाजा बजाते थे या चर्च में। मगर बीथोवन के दिल में कुछ और था।

बाइस साल की उम्र में वे वियना चले गए और जल्द ही खुद को एक कुशल संगीतकार के रूप में स्थापित कर लिया। लेकिन 1796 में छब्बीस साल की उम्र होते-होते उन्हें लगने लगा ‍कि उनके सुनने की ताकत अब कम होती जा रही है, इसलिए वे एकाकी हो गए। हाँ, उनके संगीत का सफर बदस्तूर जारी रहा। बल्कि इसके बाद तो उनकी प्रतिभा और मुखरित हो गई।

1805 से 1812 का दौर उनके जीवन में दस्सी का अंक लेकर आया। दस्सी के अंक से मतलब उस पीरियड से है, जब किसी कलाकार का सृजन उत्कर्ष पर रहता है और वह दोनों हाथ से सफलता और कीर्ति बटोरता है। इस अवधि के दौरान बीथोवन ने कई सिम्फनियों की रचना की और सात कन्सर्ट पेश किए। उनके स्ट्रिंग क्वार्टेट्‍स और प्यानो सोनेट्‍स ने भी सफलता के झंडे गाड़े। लेकिन यह सफलता उनका स्वभाव न बदल सकी।

वे लोगों से झगड़ते रहते थे। मैले-कुचैले और चीथड़े किस्म के कपड़े पहनना उनका शगल था। भले ही उनकी सिम्फनी बेच-बेचकर रेकॉर्ड कंपनियों ने करोड़ों कमाए हों, लेकिन वे हमेशा मुफलिसी में ही रहे। गली-मुहल्लों की खाक छानना और आए दिन घर बदलना उनकी नियति में लिखा था। बीथोवन ने कभी शादी नहीं की। हाँ, प्यार किया। मगर यह प्यार भी एकतरफा था। वे अक्सर बीमार रहते थे। कम सुनाई देने के जिस रोग ने उनकी जवानी में दस्तक दी थी, प्रौढ़ उम्र तक पहुँचते-पहुँचते उसने उन पर कब्जा जमा लिया। अड़तालीस साल की उम्र तक वे पूरी तरह से बहरे हो चुके थे। एक कलाकार के लिए इससे बड़ी त्रासदी क्या होगी कि वह खुद के द्वारा बनाई गई धुनें न सुन सके। जिंदगी की साँझ उन्होंने अकेलेपन के अंधकार में काटी। 1827 में सत्तावन बरस की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी प्रेमिका कौन थी, क्या थी, यह रहस्य ताउम्र बना रहा। 1827 में उनके मरने के डेढ़-सौ साल बाद 1977 में प्रेमिका के रहस्य पर से पर्दा गिरा।

एंथनी ब्रेंतानो नामक यह युव‍ती बीथोवन से 10 साल छोटी थी। 18 वर्ष की उम्र में उसका ब्याह फ्रैंकफर्ट के व्यापारी फ्रेंज ब्रेंतानो से हुआ और वह उन्हीं के साथ फ्रेंकफर्ट में रहने लगी। उसका वैवाहकि जीवन कुछ खास सफल नहीं था। उनके चार बच्चे थे। जब 1810 में एंथनी के पिता बीमार हुए तो वह उन्हीं के साथ रह ने के लिए अपने बच्चों समेत वियना चली आई। वहीं उनकी ननद ने बीथोवन से एंथनी का परिचय कराया। जल्द ही दोनों की दोस्ती हो गई। ब्रेंतानो अक्सर बीमार रहा करती थी।

जब भी वह बीमार होती, बीथोवन उसके पास बैठकर प्यानो बजाता था। 1812 में जब ब्रेंतानो लौटकर वियना जाने लगी और बीथोवन को लगा कि अब उनकी मुलाकात फिर हो न हो, तब बिछोह की धुन को उन्होंने प्यानो पर नहीं बजाया, कागज पर उतारा। पढ़िए प्रेम के ज्वार और सफ़र के भाटे से गुजरे इन चौबीस घंटों के दौरान लिखे गए तीन प्रेम पत्रों का अनूदित भावांश।

पहला पत्र
6 जुलाई 1812 की सुबह

मेरी परी, मेरी सब कुछ, सिर्फ मेरी। आज सिर्फ कुछ शब्द कहूँगा, वह भी पेंसिल से। वैसे यह पेंसिल भी तुम्हारी ही दी हुई है। कल मेरा डेरा बदल जाएगा, लेकिन यह सवाल फिर भी कायम रहेगा कि क्या हमारा प्यार एक दूसरे से माँगे बगैर, एक दूजे से कहे बगैर चलता रहेगा? क्या तुम इस कड़वी सच्चाई को झुठला सकोगी कि तुम सिर्फ मेरी नहीं और मैं सिर्फ तुम्हारा नहीं? कभी अपने दिल पर हाथ रखकर इसकी आवाज सुनो। वह भी यही कहेगा कि प्यार में अभी बहुत सी हसरतें बाकी हैं। यदि तुम मेरे साथ रहती, तो हमारा दर्द कम हो जाता। कल का मेरा सफर बड़ा भयानक रहा। सबेरे चार बजे पहुँच पाया। घोड़े कम थे। इसलिए कोच ने दूसरा रास्ता चुना। हालाँकि लोगों ने मुझे कहा था कि तुम रात का सफर मत करना, मगर लोगों की नसीहत ने मेरी उत्सुकता को बढ़ा दिया। लेकिन मैं गलत साबित हुआ। इस रास्ते पर बग्घी में चार की बजाय आठ घोड़े भी बँधे होते, तो भी काम न चलता। मगर फिर भी मुझे मजा आया। क्योंकि संकट से खेलना मुझे अच्छा ल गता है और हर मुसीबत से गुजरने के बाद उससे बच निकलने का मजा ही कुछ और है।

जल्द ही हम एक-दूसरे से मिलेंगे। पिछले कुछ दिनों से मैं विचारों की किस आँधी से गुजरा हूँ, इस बारे में मैं आज नहीं बताऊँगा। मेरा दिल तुमसे बहुत कुछ कहना चाहता है। मुझे लगता है, तुम्हारे लिए मेरे पास शब्द कम पड़ रहे हैं। चीअर अप। बस, हमेशा मेरी और सिर्फ मेरी बनी रहो, मेरी दौलत, मेरा खजाना, मेरी सब कुछ।

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शशांक दुबे
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