प्रेम क्या होता है?

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खिड़की के बाहर गर्मी की रात बिखरी हुई है, गर्मी की गुनगुनी-सी रात। खिड़की से सटकर लगी हुई रातरानी की झाड़ी के फूलों की मादक गंध खिड़की के परदे से अठखेलियाँ कर रही हवा के साथ कमरे में आ रही है। खिड़की के छज्जे पर लदी हुई रंगून क्रीपर की तलर भी लाल, सफेद और गुलाबी गुच्छों के कारण झुकी जा रही है।

खिड़की के पार दूर आसमान में आधा अधूरा चाँद टंका हुआ है। ग्रीष्म की धूप को दिन भर सहन करने के बाद झुलसे पेड़ों की पत्तियों और शाखाओं को रात की ठंडी हवा सहला रही है। हवा का स्पर्श पाकर पत्तियाँ कृतज्ञतावश झुकी जा रही हैं। गर्मी के मौसम की सबसे बड़ी विशेषता उसकी रात होती है। जितना तपता हुआ, जलता हुआ दिन उतनी ही सुहानी रात।

खिड़की से हटकर सोनू अंदर आ गया और अपनी कविता की डायरी लेकर कुर्सी पर बैठ गया। लड़का अभी भी उसी प्रकार सो रहा है। सोनू गौर से उस लड़के के चेहरे को देखने लगा। चौदह-पंद्रह वर्ष की मासूमियत से भरा हुआ चेहरा, जिस पर जवानी ने होठों के ऊपर कल्ले की तरह फूट रहे मूँछों के बारीक़-बारीक़ रोम के रूप में अभी दस्तक देना प्रारंभ ही किया है। गुलाबी होंठ जिनको बीमारी ने भले ही सुखा दिया है मगर अभी भी उनमें ताजगी है। बीमारी के बाद भी चेहरे पर किशोरावस्था की चमक और स्निग्धता बिखरी है।

सोनू को यहाँ लड़के की देखभाल के लिए रखा गया है। वैसे वो एक निजी अस्पताल का कर्मचारी है जिसके मालिक लड़के के पिता के करीबी दोस्त हैं उनके ही कारण सोनू को यहाँ भेजा गया है। लड़के को दवा देना उसे पलंग से उठाकर टहलाना, खाना खिलाना सबकी व्यवस्था सोनू को करनी होती है। लड़के की माँ नहीं है केवल पिता ही हैं, जिनको कारोबार के सिलसिले में घर से बाहर रहना पड़ता है। इससे ज्यादा न सोनू को पता है, न ही उसको पूछने की इजाजत है। उसे बस ये पता है कि यहाँ से उसे अच्छा पैसा मिलेगा जो कॉलेज की परीक्षा फीस भरने में काम आ जाएगा। यहाँ पर जब तक है तब तक कविता लिखने का भी समय है उसके पास।

अस्पताल की नौकरी वह केवल अपनी कॉलेज की पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए ही कर रहा है, मगर अस्पताल में काम करते समय कविता? सोचा ही नहीं जा सकता।

सोनू भैय्या! लड़के की आवाज सुनकर सोनू की तंद्रा टूटी।
'हाँ बोलो।' सोनू ने कुर्सी से उठकर पलंग की तरफ जाते हुए कहा। 'पानी चाहिए सोनू भैया।'
लड़के ने उत्तर दिया। 'देता हूँ तुम लेटे रहो।' फिर घड़ी देखते हुए कहा, 'दवा लेने का टाइम भी तो हो गया है।' कहते हुए सोनू दवा निकालने लगा।
चलो उठकर बैठ जाओ दवा लेना है।' सोनू के कहते ही लड़का धीरे-धीरे उठा और तकिये से टिककर बैठ गया। दवा देने के बाद जब सोनू वापस कुर्सी पर बैठने लगा तो लड़के ने कहा, सोनू भैया यहीं बैठ जाओ न पलंग पर, आपसे बातें करूँगा, अब नींद तो आएगी नहीं।'

लड़के के अनुरोध पर सोनू वहीं बैठ गया। पलंग के पास रखी टेबल पर से कंघी उठा कर लड़के के बाल ठीक करने लगा। गर्मी की मस्त हवा के कारण लड़के के बाल बिखर-बिखर जा रहे हैं। शाम को नहाते समय लड़के ने जिद करके शैम्पू लगाया था और देर तक नहाता रहा था।

'सोनू भैया।' लड़के के सिर पर गिर रही एक लट को जब वो पीछे कर रहा था तब लड़के ने कहा, 'हूँ... कंघी को टेबल पर रखते हुए कहा सोनू ने। कुछ देर तक लड़का चुप रहा फिर बोला, 'ये प्रेम क्या होता है..?' लड़के के प्रश्न से सोनू कुछ चौंका फिर मुस्कराता हुआ बोला, 'प्रेम...? अभी तीन चार साल रुक जाओ, सब पता चल जाएगा।'
कहते हुए उसने लड़के के बालों को हल्के से बिखरा दिया।
तीन चार साल रुक पाऊँगा मैं...?'
लड़के ने उदासी से पूछा। लड़के के पूछते ही कमरे की हवा रुक गई।
क्या होता है प्रेम सोनू भैय्या...!?' सोनू को चुप देखकर लड़के ने फिर पूछा।
'प्रेम वह होता है जो हमें किसी दूसरे से जोड़ता है।' सोनू ने कुछ टालने वाले अंदाज में कहा।
'किससे?' लड़के ने फिर पूछा।
किसी से भी, उन सबसे जो हमें अच्छे लगते हैं, हमारे माँ-बाप, हमारे भाई-बहन, हमारे दोस्त।' सोनू ने जवाब दिया।
माँ तो मेरे पास नहीं है पापा हैं पर वो भी... भाई बहन भी नहीं हैं।'
कहते-कहते लड़का फिर चुप हो गया। लड़के की आँखें अचानक नम हो गई थीं। सोनू को लगा उसकी पलकों के किनारे झिलमिला भी रहे हैं।
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पंकज सुबीर
उसने लड़के को सहज करने के लिए कहा, 'और सबसे खास प्रेम हमें किसी एखासे भी होता है।' सोनू के इतना कहते ही लड़के के चेहरे के भाव अचानक बदल गए, मानो सोनू ने उसके मन की बाहो।

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