नहीं तो, मतलब, लेकिन हाँ!

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मैं यकीन नहीं कर सकती।
क्या?
यही कि तुमने जिंदगी में पच्चीस-छब्बीस बसंत देखे लेकिन उसमें बहार कभी नहीं आई।
इसमें यकीन न करने जैसी तो कोई बात नहीं है।
नहीं, क्योंकि शक्ल-ओ-सूरत उतनी बुरी भी नहीं है।
मतलब बुरी तो है।
नहीं, मेरा मतलब ऐसी नहीं है कि निगाह टिक सके।
और उसके लिए शक्ल निगाहों के लिए पड़ाव साबित हो।
नहीं, मेरा मतलब लुक सामने वाले को इम्प्रेस करने का एक बड़ा जरिया होता है।
तब तो तुम्हें मान लीजिए कि मैं अब तक अकेला हूँ।
नहीं
क्यों?
दूसरी कई बातें हैं?
जैसे?
जैसे कि तुम्हारा बातों में चीत करने का अंदाज। जैसे कि तुम्हारी निगाह, इसकी जद में आने वाला इसका इसका विक्टीम हुए बिना नहीं रह सकता।
लेकिन मैं तो जानता था कि वह चितवन और कछु जिहिं बस होत सुजान।
कस्तूरी कुंडली बसे मृग खोजे बन माँहि।
तुम तो कत्ल-ए-आम पर उतर आई हो।
नहीं, तुम्हें निष्कवच करने आई हूँ।
क्यों?
ताकि खुद निढाल हो सकूँ।
क्यों?
बस ऐसे ही।
कोई वजह तो होगी।
नहीं, बेवजह ही समझो।
बेवजह कुछ नहीं होता।
कुछ नहीं होता लेकिन कुछ कुछ होता है।
मतलब?
अब इतने इनोसेंट भी न बनो।
मैं सच में कुछ समझना चाहता हूँ।
अब समझीं।
क्या?
तुम्हारी नासमझी।
मतलब?
मतलब यह कि मैंने दिमाग की जगह दिल और दिल की जगह दिमाग लगाया। यहाँ तक तो ठीक है। लेकिन सोचता हूँ कि अगर
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राहुल सिंह
हैरानी में तो फिर भी एक सूरत है, नाराजगी तो साफ वीराना कर देती है। लेकिन इस खूबसूरती को तो यह वीरानापन ही यहाँ खींच लाई है। अगर यह नेकनीयती बेजा साबित हुई तो...?' तो तुम्हार कुछ नुकसान नहीं होने वाला।
दिल की जगह दिमाग और दिमाग की जगह दिल लगाया होता तो क्या जिंदगी इससे अलग होती?
शायद। तो क्या होता?तब कम से कम इतना होता कि मैं यहाँ न होती। तब तो बुरा हुआ। क्यों मेरा यहाँ आना तुम्हें रास नहीं आया?नहीं, देख रहा हूँ दुखी होकर जाओगी?वह तुम मुझ पर छोड़ दो।मुझसे किसी सहयोग की बिल्कुल उम्मीद मत करना। तुम्हारे असहयोग पर मेरा सत्याग्रह भारी पड़ेगा।हद होती है किसी भी बात की। नाराज हो गए?नहीं, हैरान हूँ।चलो ठीक है, हैरानी नाराजगी से कहीं बेहतर है।क्यों?हैरानी में तो फिर भी एक सूरत है, नाराजगी तो साफ वीराना कर देती है।लेकिन इस खूबसूरती को तो यह वीरानापन ही यहाँ खींच लाई है। अगर यह नेकनीयती बेजा साबित हुई तो...?'तो तुम्हार कुछ नुकसान नहीं होने वाला। लेकिन तुम्हारा जो नुकसान होगा। मुझे नहीं लगता कि तुम मेरा नुकसान होने दोगे? किस भरोसे यह कह रही हो?तुम्हारे, मेरे रामभरोसे।फिर भी अगर भरोसा गलत साबित हुआ तो?तो क्या तुम ही किसी पर भरोसा कर पाओगे?क्यों?'क्योंकि किसी का भरोसा इतनी आसानी से नहीं तोड़ा जा सकता। उससे पहले अपने भीतर कई चीजों को तोड़ना-फोड़ना पड़ता है जिसकी मरम्मत कई दफे संभव नहीं होती। अगर वह आदमी है तो...। तुम तो पूरी फिदाईन निकली।क्यों तुम नहीं जानते क्या कि इस रास्ते पर चलने के लिए सिर काटकर टोल टैक्स चुकाना पड़ता है। नहीं तो?इस हाइवे की पहली कदम पर स्पीड ब्रेकर, दूसरे पर रेड लाइट, तीसरे पर गड्‍ढा और चौथे कदम पर कोई ट्रैफिक पुलिस वाला तुम्हारा लाइसेंस देखकर चालान काट रहा होगा। तो मैडम बेखौफ घूमना चाहती हैं।नहीं, तुम्हारे दिल से खौफ खत्म करना चाहती हूँ।किस बात का? उसी बात का, जिसने तुम्हें एक खोल में बंद कर रखा है। क्यों खोलना चाहती हो?अपने लिए। मुझसे ज्यादा बेहतर लोग हैं तुम्हारे आसपास।ऊधौ मन नाहिं दस-बीस! यह तो पागलपन है। ऊँ हूँ दीवानापन है।दोनों में कोई फर्क नहीं है।फर्क है, नजर का। सब तो नजर का ही फेर है। हाँ, पर मैं नजर नहीं फेर सकती। तो मैं ही ओझल हो जाता हूँ।क्यों भाग रहे हो मुझसे?तुमसे नहीं खुद से भाग रहा हूँ।क्यों?तुम मेरी जमा पूँजी जो लूटने पहुँच गई हो।मैं लूटने नहीं, तुम्हारी रजामंदी से अपना हिस्सा लेने आई हूँ।तुम्हें कुछ दे नहीं सकता।मैं खुद ले लूँगी। बहुत ढीठ हो। ढीठ नहीं दृढ़ कहो।

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