बर्ट्रेंड रसेल

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अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ब्रिटिश दार्शनिक, गणितज्ञ, वैज्ञानिक, शिक्षाशास्त्री, राजनीतिज्ञ तथा लेखक बर्ट्रेंड रसेल का जन्म 18 मई, 1872 को हुआ था। उनका परिवार ब्रिटेन के उन ऐतिहासिक परिवारों में रहा, जिन्होंने ब्रिट्रेन की राजनीति में सदैव महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन उस युग में स्त्री मताधिकार तथा जनसंख्या नियंत्रण जैसे वर्जित मुद्दों की वकालत के लिए यह परिवार विवादास्पद भी रहा।

अर्ल रसेल ने ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज से गणित और नैतिक विज्ञान की शिक्षा पाई। छत्तीस वर्ष की छोटी उम्र में ही उन्हें रॉयल सोसायटी का फेलो बना दिया गया। वे फेबियन सोसायटी, मुक्त व्यापार आंदोलन, स्त्री, मताधिकार, विश्व शांति तथा परमाणु अस्त्रों के निषेध के पूर्ण समर्थक थे। उन्होंने कई विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें प्रमुख हैं- हिस्ट्री ऑव वेस्टर्न फिलासॉफी, द प्रिंसिपल्स ऑव मेथेमेटिक्स, मैरिज एंड मॉरल्स, द प्राब्लम ऑव चायना, अनऑर्म्ड विक्ट्री तथा प्रिंसिपल्स ऑव सोशल रिकंस्ट्रक्शन आदि।
रसेल को कई पुरस्कार व सम्मान प्राप्त हुए, जिनमें ऑर्डर ऑव मेरिट (1949), साहित्य नोबल पुरस्कार (1950), कलिंग पुरस्कार (1957) तथा डेनिश सोनिंग पुरस्कार (1960) प्रमुख हैं। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति अपनी सहानुभूति के कारण उन्हें ब्रिटेन में बनी इंडिया लीग का अध्यक्ष भी बनाया गया। प्रेम पाने की उत्कंठा, ज्ञान की खोज तथा मानव की पीड़ाओं के प्रति असीम सहानुभूति इन तीन भावावेगों ने उनके 97 वर्ष लंबे जीवन को संचालित किया। प्रस्तुत अंश उनकी आत्मकथा 'द ऑटोबायोग्राफी ऑव बर्ट्रेंड रसेल' से उद्धृत है। इस अंश में उनके बचपन का रोचक वर्णन है, जिसने उनके भविष्य की दिशा निर्धारित की।
पेमब्रोक लॉज के गुनगुनी धूप भरे दिन

मेरी सर्वप्रथम स्मृति है, फरवरी, 1876 में पेमब्रोक लॉज में अपने आगमन की। इस घर में अपने आगमन का मैं सही-सही वर्णन तो नहीं कर सकता, मगर मुझे याद है कि रास्ते में मैंने लंदन टर्मिनस या संभवतः पैडिंगटन की बड़ी सी कांच की छत देखी थी। मैंने सोचा था कि यह छत कल्पनातीत रूप से खूबसूरत है। पेमब्रोक लॉज में अपने पहले दिन की याद मुझे बस इतनी ही है कि मैंने सर्वेन्ट्स हॉल में चाय पी थी। यह एक बड़ा सा खाली कमरा था, जिसमें कुर्सियों व ऊंची स्टूलों के साथ एक भारी मेज रखी हुई थी। इस कमरे में घर के सभी नौकर अपनी चाय पीते थे, सिवाय हाउसकीपर, रसोइए, महिलाओं की परिचारिका और बटलर के। ये लोग अन्य नौकरों में 'ऊंचे' थे, अतः हाउसकीपर के कमरे में शाही ढंग से चाय पीते थे।
मुझे एक ऊंचे स्टूल पर बैठा दिया गया तब मुझे सबसे आश्चर्यजनक बात यह लगी थी कि आखिर नौकर मुझमें इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं। उस समय मुझे पता नहीं था कि मैं लॉर्ड चांसलर, महारानी के विभिन्न प्रमुख सलाहकारों और कई ख्यात व्यक्तियों के बीच गंभीर विचार-विमर्श का विषय बन चुका हूं और बड़े होने तक मुझे यह भी नहीं मालूम हुआ कि पेमब्रोक लॉज में मेरे आगमन से पूर्व कौन सी विभिन्न घटनाएं हुईं।
मेरे पिता, लॉर्ड एंबरले हाल ही में दीर्घकालिक दुर्बलता की वजह से स्वर्ग सिधार गए थे। उनकी मृत्यु के एक-डेढ़ साल पहले मेरी मां और बहन भी डिप्थीरिया से मर गई थीं। बाद में अपनी मां की डायरी और पन्नों से मैंने जाना कि वे एक जीवंत, कर्मठ, गंभीर, हाजिर जवाब, वास्तविक और निडर महिला थीं। उनके चित्रों से यह भी लगता था कि वे खूबसूरत थीं। मेरे पिता दार्शनिक, पढ़ाकू, गैर दुनियावी, रूखे और आत्मसंतुष्ट व्यक्ति थे। वे दोनों सुधारवादी सिद्धांतों के पक्के समर्थक थे और अपने विश्वास को वास्तविकता में बदलने को तत्पर रहते थे।
मेरे पिता जॉन स्टुअर्ट मिल के शिष्य और मित्र थे। उन्हीं से मेरे माता-पिता ने जनसंख्या नियंत्रण और स्त्री मताधिकार में विश्वास करना सीखा। जनसंख्या नियंत्रण की वकालत के कारण मेरे पिता को संसद में अपनी सीट गंवानी पड़ी। मेरी मां भी अपने सुधारवादी विचारों के कारण कभी-कभी मुसीबत में पड़ जाती थीं। एक बार महारानी मैरी के माता-पिता द्वारा दी गई गार्डन पार्टी में डचेज ऍव कैम्ब्रिज ने मां से तेज आवाज में कहा था- 'हां, मैं जानती हूं तुम कौन हो, तुम एक बहू हो। मगर अब मैं सुनती हूं कि तुम सिर्फ गंदे सुधारवादियों और गंदे अमेरिकियों को पसंद करती हो। सारा लंदन इससे भरा हुआ है, सारे क्लबों में इसी की चर्चा है। मुझे तुम्हारे पेटीकोट भी देखने ही पड़ेंगे कि कहीं वे गंदे तो नहीं हैं।'
फ्लोरेंस (इटली) स्थित ब्रिटिश उच्चायोग का यह पत्र तो मां की स्थिति अपने आप स्पष्ट कर देता है-

'प्रिय लेडी एम्बरले,
22 सितंबर, 1870
मैं एम. मॅजिनी का प्रशंसक नहीं हूं, मगर उसके चरित्र और सिद्धांतों से बेहद घृणा करता हूं। जिस सार्वजनिक पद पर मैं हूं,
वहां से मैं उसके विचारों के प्रचार का माध्यम भी नहीं बन सकता। आपका निवेदन ठुकराने की मेरी इच्छा तो नहीं है, मगर फिर भी मेरे पास एक ही रास्ता था कि मॅजिनी को भेजा गया आपका पत्र प्रॉक्यूरेटोर डेल रे, गेटा (राज्यपाल) के पास भिजवा दूं।मैं आपका विश्वसनीय रहूंगा।
- ए. पेजेट'

मॅजिनी ने मेरी मां को अपना वॉच केस दिया था, जो अब मेरे पास है। मेरी मां स्त्री मताधिकार के पक्ष में बैठकों को संबोधित किया करती थीं। उनकी डायरी में मैंने एक उद्धरण प़ढ़ा है, जिसमें उन्होंने सामाजिक तितलियों को मक्खी मारने वाले बहनसंघ की संज्ञा दी थी। इसमें श्रीमती सिडनी वेब और लेडी कर्टनी का नाम भी शामिल था। बाद के वर्षों में मैंने श्रीमती सिडनी वेब को अच्छी तरह से जाना-समझा और मेरी मां की गंभीरता के प्रति मेरे मन में काफी सम्मान पैदा हुआ, जब मुझे याद आया कि वे श्रीमती वेब को छिछोरी समझती थीं, लेकिन सकारात्मकवादी हेनरी क्रॉम्पटन को लिखे गए मां के पत्र से मैंने जाना कि वे कभी-कभी चोंचलेबाज और जिन्दादिल भी हो जाती थीं। शायद इस तरह वे डायरी वाले अपने गंभीर व्यक्तित्व को दुनिया के समक्ष कम भयप्रद रूप में प्रस्तुत करना चाहती थीं।
मेरे पिता एक मुक्त विचारक थे। उन्होंने एक बड़ी सी किताब लिखी थी- 'एनालिसिस ऑव रिलीजियस बिलीफ' जो उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुई। उनका पुस्तकालय विशाल था, जिसमें बौद्धधर्म, कन्फ्यूशियसवाद आदि पर पुस्तकें रखी हुई थीं।पुस्तक लिखने के लिए वे अपना अधिकांश समय गांव में गुजारते थे। हालांकि शादी के पहले कुछ वर्षों में मेरे माता-पिता प्रतिवर्ष कुछ माह लंदन स्थित अपने डीन्सयार्ड के निवास में रहते थे। मेरी मां और उनकी बहन श्रीमती जॉर्ज हॉवर्ड (बाद में लेडी कार्लिस्ले) के बैठक गृह आपस में प्रतिद्वंद्वी थे। श्रीमती जॉर्ज की बैठक में रॅफेल युग से पहले के चित्र लगे हुए थे और मेरी मां की बैठक में मिल सहित सभी ब्रिटिश दार्शनिक रहते थे।
सन्‌ 1876 में मेरे माता-पिता अमेरिका गए। वहां उन्होंने बॉस्टन के सभी सुधारवादियों से मित्रता की। वे यह अनुमान नहीं लगा पाए थे कि जिन स्त्री-पुरुषों के लोकतांत्रिक उत्साह पर वे उन्हें वाहवाही दे रहे हैं और गुलामी के विरुद्ध जिनके विजयी अभियान की उन्होंने तारीफ की, वे सॅको और वॉन्जेटी के हत्यारों के पूर्वज हैं। मेरे माता-पिता का विवाह 1864 में हुआ था, तब दोनों को ही उम्र 22 वर्ष थी। मेरा भाई, जैसा कि वह अपनी आत्मकथा में शेखी मारता है, उनकी शादी के ठीक नौ माह चार दिन बाद पैदा हुआ था।
मेरे जन्म के कुछ समय पूर्व ही मेरे माता-पिता रॅवनस्क्रॉफ्ट (अब ग्लेडन हॉल) नामक बेहद एकांत मकान में रहने चले गए थे। यह मकान वॉय नदी के ढलवां तट के ठीक ऊपर स्थित जंगल में बना हुआ था। इसी मकान में मेरे जन्म के ठीक तीन दिन बाद मां ने मेरी नानी को मेरा वर्णन लिख भेजा था- 'बच्चे का वजन पौने नौ पौंड है, लंबाई 21 इंच है। वह बेहद मोटा और बदसूरत है। उसकी नीली आंखें बहुत दूर-दूर हैं और ठुड्डी तो मानो है ही नहीं। वह बहुत कुछ फ्रेंक की तरह दिखता है। मेरे पास ढेर सारा दूध है, लेकिन उसे तत्काल यह न मिले तो वह इतना क्रोधित हो जाता है कि चीखता है और लात मारता है। वह तब तक कांपता रहता है जब तक कि उसे शांत न कराया जाए... वह अपना सिर उठाकर बेहद ऊर्जावान तरीके से देखता है।'
विलियम जेम्स की 'सायकोलॉजी' में मेरे भाई के काम का जिक्र है। इसी से मुझे मालूम हुआ कि उसे पढ़ाने के लिए एक विज्ञान का ट्यूटर रखा गया था। मेरा भाई डॉर्विनवादी था और चूजों की मूल प्रवृत्ति का अध्ययन कर रहा था। उसके अध्ययन को आसान बनाने के लिए बैठक सहित घर के हर कमरे में चूजे उत्पात मचाते रहते थे। वह यक्ष्मा (टीबी) की गंभीर अवस्था में था और पिता की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद ही चल बसा। मां की मौत के बाद भी पिताजी ने ट्यूटर की सेवाएं निरस्त नहीं कीं।
जब पिताजी की मृत्यु हुई तो यह पता लगा कि उन्होंने हम दोनों भाइयों के ट्यूटर और कॉबडेन सेंडरसन को हमारा अभिभावक नियुक्त किया है। ट्यूटर और कॉबडेन नास्तिक थे और पिताजी हमें धार्मिक लालन-पालन के दुष्प्रभावों से बचाना चाहते थे। बाद में पिता के कागजातों के जरिये यह तथ्य जानकर मेरे दादा-दादी एक दकियानूसी भय से भर गए। उन्हें बड़ा आघात लगा और उन्होंने निर्णय लिया कि जरूरी हुआ तो मासूम बच्चों को षड्यंत्रकारी नास्तिकों से बचाने के लिए वे अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे। षड्यंत्रकारी नास्तिकों ने सर हॉरेश डेवी (बाद में लॉर्ड डेवी) से सलाह ली।

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