तंगहाल समाज में कलाकार होने का मतलब

इस्‍तांबुल और ओरहान पामुक की यादें

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लंबे समय तक अब्‍बू की राह तकती अम्‍मी ने अपनी शामें बैठक में अकेले काटीं। अब्‍बू अपनी शामें ब्रिज क्‍लब पर बिताते। वहाँ से कहीं और निकल जाते, फिर इतनी देर से लौटते कि तब तक इंतज़ार करती अम्‍मी थककर सोने जा चुकी होतीं। रात के खाने को मेरे और अम्‍मी के आमने-सामने बैठ चुकने के बाद (तब तक अब्‍बू का फोन आ चुका होता। ‘मैं कहीं फँसा हुआ हूँ,’ उनका जवाब होता, ‘लौटने में देरी होगी, तुम लोग खाना-वाना कर लो’) अम्‍मी टेबल पर अपने पत्‍ते सजातीं और अपना भविष्‍य पढतीं। एक वक्‍त में एक, महत्‍व के अनुरुप आजू-बाजू लगाते हुए उन बावन पत्‍तों के हर पत्‍ते को जिस तरह वह फेरतीं, उसमें पत्‍तों के पीछे छिपे राज़ को खोलने की उसकी कोई भारी इच्‍छा न दिखती और न ही पत्‍तों के एक खास संयोजन के उस खेल में उसे कोई मज़ा मिलता, जिसमें लोग भविष्‍य की अपनी लुभावनी तस्‍वीरें निकाला करते थे। उसके लिये तो यह बस एक खेल था। बैठक में पहुँचने के बाद जब मैं उससे सवाल करता कि आज अपनी किस्‍मत पढ ली या नहीं तो उसका हमेशा यही जवाब होता:

‘मैं यह अपनी किस्‍मत पढने के लिये नहीं कर रही हूँ डार्लिंग। ये सब वक्‍त काटने के लिये है। क्‍या टाइम हुआ..... एक बार और आजमाती हूँ, फिर सोने जाऊँगी।’

इतना कहकर वह हमारे काले-सफेद टेलीविजन (तुर्की में उन दिनों वह एक नई चीज़ था) पर चल रही पुरानी फिल्‍म या गुजरे ज़माने में रमजान कैसे मनता था, का कोई चैट शो (तब सरकारी नज़रिया बताने वाला बस एक चैनल हुआ करता था) पर एक नज़र मारतीं और कहतीं, ‘मैं ये सब नहीं देख रही, चाहो तो बंद कर दो।’ पर्दे पर जो कुछ भी चल रहा होता - कोई फुटबॉल मैच, या अपने बचपन की गलियों की काली-सफेद तस्‍वीरें - उसे देखता मैं कुछ वक्‍त गुजारता। शो से ज्‍यादा मेरी अपने कमरे और अपनी अंदरूनी उथल-पुथल से छुटकारा पाने में दिलचस्‍पी होती और बैठक में बने रहने के दरमियान वही करता, जो रोज़ रात का नियम था, अम्‍मी से बातें करता कुछ समय बिताता।

ऐसी कुछ बतकहियाँ कड़वी बहसों में बदल जातीं। मैं भागा-भागा अपने कमरे में लौटता और दरवाज़ा बंद करके किताबों और अपराध-बोध में सुबह तक डूबा रहता। कई दफा अम्‍मी से जिरह के बाद मैं इस्‍तांबुल की ठंडी रातों में बाहर निकल जाता और तकसिम और बेयोलू के गिर्द, भीतर की अँधेरी और झमेलों से भरी गलियों में सिगरेट-पर-सिगरेट धूँकता तब तक भटकता रहता, जब तक कि सर्द हवायें मेरी हड्डियाँ न कँपाने लगतीं, और फिर अम्‍मी समेत शहर के हर शख्‍स के सोने जा चुकने के बाद ही मैं घर लौटता। सुबह के चार बजे सोने को जाना और दोपहर तक सोये रहने की मेरी कुछ आदत-सी बन गई। आगे के बीस वर्षों तक मैं यही आदत जीता रहा।

उन दिनों कभी खुलकर तो कभी बिना नाम लिये अम्‍मी और मेरे बीच जिस चीज़ पर अक्‍सरहाँ जिरह हुआ करती- वह था मेरा अनिश्चित भविष्‍य, क्‍योंकि 1972 की सर्दियों में, आर्किटेक्‍चर फैकल्‍टी के अपने दूसरे साल के दरमियान मैंने अपनी क्‍लासें अटेंड करना लगभग पूरी तरह से बंद कर दिया था। क्‍लास रजिस्‍टर में मेरी अनुपस्थिति मेरे कॉलेज से निष्‍कासन का सबब न बने, से ज्‍यादा मैं शायद ही कभी तसकिसला आर्किटेक्‍चर फैकल्‍टी में कदम रखता।

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कभी घबराहट में मैं खुद को तसल्‍ली देता कि, ‘आर्किटेक्‍ट न भी बना, तो कम-से-कम यूनिवर्सिटी का एक डिप्‍लोमा तो मेरे पास होगा।’ जिन चंद लोगों का मुझ पर थोड़ा असर था, उनमें मेरे अब्‍बू और उनके कुछ दोस्‍त भी यह बात काफी दुहराते। यह सब सुनकर अम्‍मी की नज़रों में मेरी कहानी और संदेहास्‍पद होती। मैंने पेंटिंग से अपनी मुहब्‍बत को मरते देखा था। उससे जन्‍मे तक़लीफदेह खालीपन को जिया था। इसलिये भी मन के गहरे इस बात को बखूबी जान रहा था कि आर्किटेक्‍ट होना मेरे बूते की बात नहीं। साथ ही यह भी समझता था कि सुबह तक किताबें और उपन्‍यास पढते हुए और तकसिम, बेयोलू और बेसितास की गलियों में रात-रात भर भटकता मैं पूरी जिंदगी नहीं गुजार सकता। कभी मैं दहशतज़दा एकदम से टेबल से उठ खडा होता कि अम्‍मी को अपनी हकीक़त से रु-ब-रु करवा दूँ। चूँकि मुझे इसका अंदाज़ न लगता कि मैं यह क्‍यों कर रहा था और इसका तो और भी कम कि मैं उसके आगे क्‍या कबुलवाना चाहता था, कई मर्तबा लगता जैसे आँखों पर पट्टी चढाये हम एक-दूसरे से भिड़े हुए हैं।

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